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Abraham Accords: इजराइल समझौते पर ट्रंप के बयान से बढ़ी हलचल

मुस्लिम नाउ ब्यूरो | नई दिल्ली

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने दावा किया है कि उन्होंने कई देशों से कहा है कि वे इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ (Abraham Accords) में शामिल हों। हालांकि, उनके इस बयान के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि जिन देशों के नाम ट्रंप ने लिए, उनमें से कुछ पहले से ही इजराइल के साथ राजनयिक संबंध रखते हैं, जबकि कुछ देशों ने फिलिस्तीन मुद्दे पर स्पष्ट शर्तें तय कर रखी हैं।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा कि यदि ईरान उनके साथ प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर करता है, तो वे चाहते हैं कि कई मुस्लिम और अरब देश भी इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ें। उन्होंने जिन देशों का जिक्र किया उनमें सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन और तुर्किये शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के नेताओं से भी बातचीत का उल्लेख किया, जो पहले ही अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बन चुके हैं।

ट्रंप ने अपनी पोस्ट में लिखा कि अमेरिका लंबे समय से इस “जटिल पहेली” को सुलझाने की कोशिश कर रहा है और अब समय आ गया है कि अधिक से अधिक देश इस कूटनीतिक पहल में शामिल हों। उनके अनुसार, यदि ईरान अमेरिका के साथ समझौता करता है तो यह एक “अद्वितीय वैश्विक गठबंधन” का रूप ले सकता है।

हालांकि, ट्रंप के बयान ने कई विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मिस्र और जॉर्डन पहले ही दशकों पहले इजराइल के साथ शांति समझौते कर चुके हैं। मिस्र ने 1979 में और जॉर्डन ने 1994 में इजराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित कर लिए थे। इसी तरह तुर्किये और इजराइल के बीच भी लंबे समय से राजनयिक संबंध मौजूद हैं, भले ही दोनों देशों के रिश्तों में समय-समय पर तनाव आता रहा हो।

मध्य पूर्व मामलों के जानकारों का कहना है कि ट्रंप का बयान राजनीतिक संदेश ज्यादा और व्यावहारिक कूटनीति कम नजर आता है। उनका मानना है कि इजराइल-सऊदी संबंधों का सवाल सबसे संवेदनशील बना हुआ है, क्योंकि सऊदी अरब लगातार फिलिस्तीन मुद्दे को प्राथमिकता देता आया है।

इसी बीच, एक सऊदी सूत्र ने अमेरिकी मीडिया को बताया कि सऊदी अरब की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। सूत्र के अनुसार, जब तक फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की दिशा में “अपरिवर्तनीय और स्पष्ट रास्ता” तय नहीं होता, तब तक रियाद इजराइल के साथ संबंध सामान्य नहीं करेगा।

सऊदी अरब पहले भी कई बार अपना रुख साफ कर चुका है। पिछले वर्ष वॉशिंगटन दौरे के दौरान सऊदी क्राउन प्रिंस Mohammed bin Salman ने भी स्पष्ट संकेत दिया था कि उनका देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने के खिलाफ नहीं है, लेकिन फिलिस्तीन के लिए दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) की दिशा में ठोस प्रगति जरूरी है।

उन्होंने कहा था कि सऊदी अरब शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि फिलिस्तीनियों के अधिकार सुरक्षित हों और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की दिशा स्पष्ट दिखाई दे।

उधर पाकिस्तान की स्थिति भी लंबे समय से स्पष्ट रही है। इस्लामाबाद बार-बार कहता आया है कि वह फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान के बिना इजराइल को मान्यता देने पर विचार नहीं करेगा। कतर ने भी क्षेत्रीय शांति और फिलिस्तीन के अधिकारों को प्राथमिकता देने की बात कही है।

ट्रंप के इस बयान ने ऐसे समय में हलचल पैदा की है जब ईरान-अमेरिका परमाणु समझौते और मध्य पूर्व में बदलते गठबंधनों को लेकर नई चर्चाएं चल रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि ट्रंप का प्रस्ताव महज एक राजनीतिक संदेश है या वास्तव में कोई बड़ा कूटनीतिक प्रयास आकार ले रहा है।

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