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अमरावती विश्वविद्यालय ने उर्दू-फारसी शोध को दी नई रफ्तार, पांच प्रोफेसर बने पीएचडी गाइड

मुस्लिम नाउ ब्यूरो | अमरावती (महाराष्ट्र)

महाराष्ट्र के अमरावती स्थित संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय ने उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में एक अहम कदम उठाते हुए उर्दू और फारसी विषयों से जुड़े पांच वरिष्ठ शिक्षकों को पीएचडी शोध-निर्देशक (रिसर्च गाइड) के रूप में मान्यता प्रदान की है। विश्वविद्यालय के इस फैसले को अकादमिक जगत में एक सकारात्मक और दूरगामी पहल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे न केवल शोध गतिविधियों को गति मिलेगी, बल्कि भाषा और साहित्य के क्षेत्र में गुणवत्ता भी मजबूत होगी।

विश्वविद्यालय द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, जिन शिक्षकों को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है, उनमें डॉ. मोहम्मद अजीमुद्दीन, प्रोफेसर डॉ. अंजुम नाहिद अब्दुल कलीम, डॉ. फरहाना आज़मी, डॉ. नुज़हत परवीन मोहम्मद गौस और डॉ. सैयद रमीज़ सैयद वसीम शामिल हैं। ये सभी शिक्षक अपने-अपने संस्थानों में लंबे समय से शिक्षण और शोध कार्य में सक्रिय रहे हैं और अब इन्हें शोधार्थियों के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

डॉ. मोहम्मद अजीमुद्दीन, जो आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज, बियुदा (अमरावती) में उर्दू विभाग के प्रमुख हैं, अपने शोध और अकादमिक योगदान के लिए जाने जाते हैं। वहीं प्रोफेसर डॉ. अंजुम नाहिद अब्दुल कलीम और डॉ. सैयद रमीज़ सैयद वसीम यशवंतराव चव्हाण महाविद्यालय, मंगरुल पीर (जिला वाशिम) से जुड़े हुए हैं और क्रमशः उर्दू और फारसी विभाग का नेतृत्व कर रहे हैं।

इसी क्रम में डॉ. फरहाना आज़मी, जो मंगसाजी महाराज महाविद्यालय, दारवा (जिला वाशिम) में उर्दू विभाग की अध्यक्ष हैं, और डॉ. नुज़हत परवीन मोहम्मद गौस, जो गवर्नमेंट विदर्भ इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड ह्यूमैनिटीज, अमरावती में कार्यरत हैं, को भी यह जिम्मेदारी दी गई है।

इन शिक्षकों की नियुक्ति को उर्दू और फारसी भाषा एवं साहित्य के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे शोध के नए आयाम खुलेंगे और विद्यार्थियों को अनुभवी मार्गदर्शकों का लाभ मिलेगा। खास तौर पर उन छात्रों के लिए यह अवसर बेहद महत्वपूर्ण है जो इन भाषाओं में पीएचडी करना चाहते हैं।

इस घोषणा के बाद शैक्षणिक, साहित्यिक और पत्रकारिता जगत में खुशी की लहर देखी जा रही है। संबंधित महाविद्यालयों के प्राचार्यों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने इन सभी प्रोफेसरों को बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है। कई शिक्षाविदों ने इसे क्षेत्रीय भाषाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक ठोस कदम बताया है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इन शिक्षकों के मार्गदर्शन में तैयार होने वाले शोध कार्य न केवल अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होंगे, बल्कि समाज और संस्कृति की समझ को भी गहराई प्रदान करेंगे। इससे उर्दू और फारसी जैसी समृद्ध भाषाओं को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाने में भी मदद मिलेगी।

कुल मिलाकर, संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय का यह निर्णय न केवल उच्च शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है, बल्कि यह भाषा, साहित्य और शोध की दुनिया में एक नई ऊर्जा का संचार करने वाला भी साबित हो सकता है।