जिन्ना शिया थे या सुन्नी? पाक सेना प्रमुख की चेतावनी से छिड़ी बहस
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## कायदे-आजम की पहचान पर बंटा पाकिस्तान: ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच नया मजहबी विवाद
इस्लामाबाद
जहाँ एक ओर ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच युद्ध की लपटें वैश्विक संकट पैदा कर रही हैं, वहीं पाकिस्तान एक अजीबोगरीब आंतरिक वैचारिक युद्ध में उलझ गया है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर द्वारा ईरान समर्थकों को दी गई कड़ी चेतावनी—“यदि ईरान का समर्थन करना है, तो ईरान चले जाएं”—ने देश में एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। यह बहस पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना (कायदे-आजम) की व्यक्तिगत धार्मिक पहचान को लेकर है: क्या जिन्ना शिया थे या सुन्नी?
यह विवाद ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के शीर्ष इस्लामी नेतृत्व शिया-सुन्नी मतभेदों को भुलाकर एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि इजरायल और अमेरिका के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाया जा सके।
सोशल मीडिया बना जंग का मैदान: ऐतिहासिक सबूतों की बौछार
ट्विटर (X) और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दो गुट आमने-सामने हैं। दोनों पक्ष अपने दावों की पुष्टि के लिए ऐतिहासिक दस्तावेज, वसीयतनामा और निजी जीवन की घटनाओं का हवाला दे रहे हैं।
IMPORTANT CORRECTION.
— Adnan Rashid (@MrAdnanRashid) March 22, 2026
Shia preachers have been claiming Jinnah (RA) was a 12ver Shia, therefore 12vers made Pakistan.
Jinnah (RA) DIED a Sunni Muslim.
Evidence:
He prayed publicly ONLY with Sunnis.
His ONLY OFFICIAL Janaza prayers were led by Mufti Shabbir Ahmad Usmani. pic.twitter.com/KAZz0j4Y5L
पक्ष 1: “जिन्ना सुन्नी मुसलमान के रूप में मरे”
इतिहासकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता अदनान राशिद जैसे विचारकों का तर्क है कि जिन्ना ने अपना सार्वजनिक जीवन एक सुन्नी मुसलमान के तौर पर जिया। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:
- सार्वजनिक प्रार्थना: जिन्ना सार्वजनिक रूप से केवल सुन्नियों के साथ नमाज अदा करते थे।
- आधिकारिक जनाजा: उनकी आधिकारिक अंत्येष्टि (नमाज-ए-जनाजा) प्रसिद्ध सुन्नी विद्वान मुफ्ती शब्बीर अहमद उस्मानी ने करवाई थी।
- अदनान राशिद का दावा है कि शिया उपदेशक केवल राजनीतिक लाभ के लिए जिन्ना को ‘ट्वेल्वर शिया’ (12 इमामों को मानने वाले) बताते हैं।
पक्ष 2: “जिन्ना के संस्कार और कानून शिया थे”
दूसरी ओर, शोधकर्ता असद और अन्य विश्लेषकों ने जिन्ना के शिया होने के पक्ष में सबूतों की एक लंबी सूची पेश की है:
- धर्मांतरण: जिन्ना का जन्म खोजा शिया इस्माइली परिवार में हुआ था, लेकिन 1910 के आसपास उन्होंने ट्वेल्वर शिया (Ithna Ashari) मत अपना लिया था।
- पारिवारिक साक्ष्य: जिन्ना ने अपनी दूसरी पत्नी (रत्ती जिन्ना) को बॉम्बे के शिया कब्रिस्तान में दफनाया था।
- विरासत का कानून: फातिमा जिन्ना (जिन्ना की बहन) ने जिन्ना की संपत्ति पर शिया शरीयत कानूनों के तहत दावा किया था, क्योंकि सुन्नी कानून के अनुसार बहन को भाई की विरासत में वह हिस्सा नहीं मिलता जो शिया कानून में मिलता है।
- निजी संस्कार: फील्ड मार्शल अयूब खान की डायरी के अनुसार, फातिमा जिन्ना का अंतिम संस्कार शिया रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया था और उनके आवास (मोहाट्टा पैलेस) पर ‘अलम’ (शिया प्रतीक) रखा रहता था।
Jinnah was born into a Khoja Shia Ismaili family but converted to being a Twelver Shia sometime around 1910:
— Asad 🇵🇰 (@asadfacts) March 22, 2026
– Jinnah was an active member of the Khoja Shia Ithna Ashari (Twelver) Jamaat Bombay for his last 35 years, making hefty donations [proof attached hereinwith].
– He had… https://t.co/ozIZubdJ9w pic.twitter.com/VQlsvNvLnR
सेना प्रमुख का बयान और सुलगती चिंगारी
जनरल आसिम मुनीर का बयान पाकिस्तान में मौजूद शिया समुदाय और ईरान के प्रति सहानुभूति रखने वाले तबके के लिए एक सीधा प्रहार माना जा रहा है। पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी शिया है, और जिन्ना की पहचान को लेकर यह विवाद दरअसल इस बात की लड़ाई है कि “पाकिस्तान किसका है?”
ईरान-इजरायल युद्ध ने पाकिस्तान के भीतर के सांप्रदायिक समीकरणों को संवेदनशील बना दिया है। जब सेना प्रमुख ईरान समर्थकों को ‘देश छोड़ने’ की बात कहते हैं, तो अनजाने में वह उस ऐतिहासिक बहस को हवा दे देते हैं कि देश बनाने वाला व्यक्ति स्वयं किस विचारधारा का था।
दुनिया के लिए ‘मूर्खता’, पाकिस्तान के लिए ‘अस्तित्व का संकट’
जहाँ वैश्विक विश्लेषक इस बहस को पाकिस्तान की ‘बौद्धिक कंगाली’ और ‘मूर्खता’ करार दे रहे हैं, वहीं पाकिस्तान के भीतर यह एक गंभीर संकट है।
- एकता में दरार: जिस समय पाकिस्तान को आर्थिक बदहाली और बाहरी खतरों से निपटने के लिए एकजुट होना चाहिए, उस समय देश के संस्थापक को फिरकों (sects) में बांटना एकता के लिए घातक साबित हो रहा है।
- धार्मिक ध्रुवीकरण: सोशल मीडिया पर ‘यजीद-अपोलॉजिस्ट’ और ‘शिया-प्रचारक’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि पाकिस्तान का समाज वैचारिक रूप से कितना खंडित हो चुका है।
महापुरुषों को सीमाओं में न बांधें
एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के लिए यह आत्ममंथन का समय है। मोहम्मद अली जिन्ना ने एक ऐसे देश का सपना देखा था जहाँ मजहब राज्य का काम नहीं होगा। उन्हें शिया या सुन्नी के संकीर्ण चश्मे से देखना उनकी व्यापक राजनीतिक विरासत का अपमान है।
तथ्य यह है कि जिन्ना एक ‘सेकुलर’ पहचान वाले मुस्लिम नेता थे, जिन्होंने सभी संप्रदायों को एक झंडे के नीचे लाने का काम किया। आज उन्हें किसी एक फिरके तक सीमित करने की कोशिश केवल वर्तमान राजनीतिक हितों को साधने का जरिया मात्र है।
भविष्य की राह
पाकिस्तान में चल रही यह जुबानी जंग केवल जिन्ना के धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की भविष्य की दिशा तय करने वाली बहस है। क्या पाकिस्तान एक समावेशी राष्ट्र बनेगा या फिर सांप्रदायिक पहचान ही यहाँ की राजनीति का केंद्र रहेगी? सेना प्रमुख के बयान और उसके बाद उपजे इस विवाद ने यह साफ कर दिया है कि पाकिस्तान के भीतर की वैचारिक खाई अभी भरने वाली नहीं है।
पाकिस्तान: शिया-सुन्नी जनसांख्यिकी और सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव
| कारक | सुन्नी समुदाय (Sunni) | शिया समुदाय (Shia) |
| अनुमानित जनसंख्या | लगभग 80-85% | लगभग 15-20% (दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी) |
| प्रमुख उप-समूह | देवबंदी, बरेलवी, अहले-हदीस | इसना अdescriptionशरी (Twelvers), इस्माइली, बोहरा |
| राजनीतिक झुकाव | पारंपरिक रूप से दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों (JUI-F, TLP) का समर्थन। | ऐतिहासिक रूप से पीपीपी (PPP) जैसी धर्मनिरपेक्ष या उदारवादी पार्टियों का झुकाव। |
| वैश्विक संरेखण | सऊदी अरब और खाड़ी देशों के साथ वैचारिक निकटता। | ईरान के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव। |
| सेना में प्रतिनिधित्व | बहुसंख्यक प्रतिनिधित्व; वर्तमान सेना प्रमुख का रुख सख्त सुन्नी राष्ट्रवाद की ओर दिखता है। | उच्च पदों पर प्रतिनिधित्व रहा है (पूर्व राष्ट्रपति याह्या खान और मूसा खान शिया थे), लेकिन अब दबाव में हैं। |
| विवाद का केंद्र | जिन्ना को एक ‘आदर्श सुन्नी’ नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं ताकि ‘पाकिस्तानी राष्ट्रवाद’ को सुन्नी पहचान से जोड़ा जा सके। | जिन्ना के शिया मूल का हवाला देकर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि पाकिस्तान सभी संप्रदायों का साझा देश है। |

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निष्कर्ष और विश्लेषण
पाकिस्तान में शिया-सुन्नी विवाद केवल ‘अकीदे’ (आस्था) की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह सत्ता और संसाधनों के बंटवारे की जंग है।
- सेना का नया नैरेटिव: सेना प्रमुख आसिम मुनीर का हालिया बयान संकेत देता है कि पाकिस्तानी एस्टेब्लिशमेंट अब ‘ईरान समर्थक’ तत्वों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मान रहा है।
- जिन्ना का इस्तेमाल: जिन्ना की पहचान को लेकर चल रही यह बहस दरअसल इस डर से उपजी है कि अगर देश का संस्थापक ही ‘शिया’ सिद्ध हो गया, तो कट्टरपंथी सुन्नी धड़े का वह नैरेटिव कमजोर पड़ जाएगा जिसमें वे पाकिस्तान को केवल एक ‘सुन्नी रियासत’ के रूप में देखते हैं।

