ईरान विरोध में दुश्मन से हाथ: अपनों के खिलाफ पाक जनरल की ढाल बने मौलाना
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली:
जब दुनिया की सियासत बारूद के ढेर पर बैठी हो, तब वफादारी और विचारधारा के मायने अक्सर धुंधले पड़ जाते हैं। पश्चिम एशिया में जारी भीषण युद्ध की लपटों के बीच भारत से एक ऐसी आवाज उठी है जिसने शिया समुदाय और भारतीय मुस्लिम बुद्धिजीवियों के बीच बहस का एक नया तूफान खड़ा कर दिया है। यह आवाज है गुजरात के शिया मौलाना हसन अली रजानी की, जिनका ईरान विरोधी रुख अब उन्हें उस दहलीज पर ले आया है जहाँ वे भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।
पाकिस्तानी जनरल की ‘नसीहत’ और भारतीय मौलाना की ‘तारीफ’
मामला बेहद पेचीदा और संवेदनशील है। हाल ही में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने रावलपिंडी में एक इफ्तार पार्टी के दौरान पाकिस्तानी शिया मौलवियों को कड़े लहजे में चेतावनी दी थी। मुनीर ने कहा था, “यदि आपको ईरान से इतना ही प्यार है, तो आप ईरान चले जाएं।” यह बयान उस वक्त आया जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद पाकिस्तान में ईरान समर्थक प्रदर्शन उग्र हो रहे थे।
हैरानी की बात यह है कि जहाँ खुद पाकिस्तान के भीतर शिया समुदाय जनरल मुनीर को ‘इजरायल का एजेंट’ बताकर उनका विरोध कर रहा है, वहीं भारत के मौलाना हसन अली रजानी ने मुनीर के इस बयान का खुला समर्थन कर दिया है। रजानी का यह रुख केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी ‘अजीबोगरीब’ माना जा रहा है।
भारत का बदलता स्टैंड और रजानी का विरोधाभास
मौलाना रजानी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार ने ईरान-इजरायल विवाद में अपना रुख बेहद संतुलित और मानवीय रखा है। भारत ने न केवल ईरानी राष्ट्रपति से संवाद किया है, बल्कि संकट की इस घड़ी में ईरान को मानवीय सहायता भी भेजी है। इस कूटनीति का फल यह मिला कि ईरान ने भारतीय तेल जहाजों को सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘जलडमरूमध्य’ (Strait) से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दे दी।
एक तरफ भारत के बुद्धिजीवी और सरकार ईरान के साथ खड़े होकर राष्ट्रीय हितों को साध रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मौलाना रजानी भारत के मुसलमानों को नसीहत दे रहे हैं कि वे स्थानीय शांति के नाम पर ईरान का विरोध करें। उनका तर्क है कि भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में ईरान समर्थक मौलवी विदेशी फंडिंग के जरिए अशांति फैला रहे हैं।
“विदेशी विद्वान बेईमान हैं”: रजानी का तीखा प्रहार
मौलाना रजानी ने अपने बयान में बेहद तल्ख शब्दों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने ईरान के नेतृत्व को ‘विदेशी’ और उनके समर्थकों को ‘एजेंट’ करार देते हुए कहा कि दुनिया भर के शियाओं को ईरानी लीडरशिप के बजाय अपने-अपने देशों के विद्वानों को फॉलो करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि “बेईमान विदेशी विद्वान” शिया समुदाय का इस्तेमाल अपने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे के लिए कर रहे हैं।
रजानी ने जोर देकर कहा, “हर देश को अपने झगड़े अपनी सीमाओं के भीतर ही सुलझाने चाहिए।” लेकिन आलोचकों का सवाल यह है कि यदि वे सीमाओं की बात करते हैं, तो एक भारतीय मौलाना होकर वे पाकिस्तान के उस जनरल के सुर में सुर क्यों मिला रहे हैं, जो भारत के खिलाफ हमेशा जहर उगलता रहा है?
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जनरल मुनीर: इजरायल के पैरोकार या अनुशासन के रक्षक?
पाकिस्तान में जनरल आसिम मुनीर को लेकर जनता में भारी आक्रोश है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मुनीर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका और इजरायल के हितों की रक्षा कर रहे हैं। जब मुनीर ने चेतावनी दी कि “दूसरे देश की घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी”, तो इसे शिया समुदाय की धार्मिक भावनाओं को कुचलने के प्रयास के रूप में देखा गया।
हैरत की बात यह है कि इसी ‘मुनीर दर्शन’ को मौलाना रजानी भारत में लागू करने की वकालत कर रहे हैं। वे इसे “अपने देश के प्रति वफादारी” का नाम दे रहे हैं, जबकि हकीकत में भारत के शिया और सुन्नी दोनों ही समुदाय ईरान के प्रति सहानुभूति रख रहे हैं क्योंकि वे इसे ‘मजलूम’ (पीड़ित) और ‘जालिम’ (अत्याचारी) की लड़ाई मान रहे हैं।
वैचारिक युद्ध का नया मोर्चा
यह खबर केवल एक बयान नहीं, बल्कि शिया विचारधारा के भीतर बढ़ते बिखराव का संकेत है। एक तरफ वे लोग हैं जो ईरान को ‘प्रतिरोध का केंद्र’ (Axis of Resistance) मानते हैं और खामेनेई की शहादत को इंसानियत की क्षति समझते हैं। दूसरी तरफ मौलाना रजानी जैसे लोग हैं, जो ईरान के बढ़ते प्रभाव को स्थानीय सत्ता के लिए खतरा मानते हैं।
मौलाना रजानी का यह कदम उन्हें शिया समुदाय के एक बड़े हिस्से से अलग-थलग कर सकता है। गुजरात के धार्मिक हलकों में यह चर्चा आम है कि क्या रजानी का यह रुख व्यक्तिगत है या इसके पीछे कोई और शक्ति काम कर रही है?
निष्कर्ष: कूटनीति बनाम कट्टरता
अंततः, यह पूरा घटनाक्रम एक अजीबोगरीब तस्वीर पेश करता है। जहाँ भारत की केंद्र सरकार अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) दिखाते हुए ईरान के साथ रिश्ते सुधार रही है, वहीं एक भारतीय मौलाना उस पाकिस्तानी जनरल की तारीफ कर रहे हैं जो खुद अपनी आवाम की नजरों में अपनी साख खो चुका है।
यह कहानी बताती है कि युद्ध केवल सरहदों पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि यह दिलों, दिमागों और धार्मिक मंचों पर भी लड़ा जाता है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जहाँ ईरान के लिए सहानुभूति का सैलाब है, वहीं मौलाना रजानी की यह ‘नसीहत’ एक जलते हुए सवाल की तरह खड़ी है—वफादारी की परिभाषा क्या है और इसका फैसला कौन करेगा?
वैचारिक टकराव: रजानी बनाम वैश्विक शिया भावना
नीचे दी गई तालिका मौलाना रजानी के तर्कों और उनके विरोधियों के स्टैंड के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है:
| विषय | मौलाना हसन अली रजानी का रुख | ईरान समर्थकों/आम जनता का स्टैंड |
| वफादारी | केवल अपने देश के प्रति (राष्ट्रवाद सर्वोपरि)। | इंसानियत और मजलूमों (पीड़ितों) के प्रति। |
| धार्मिक नेतृत्व | स्थानीय विद्वानों को फॉलो करें, विदेशी (ईरानी) नेतृत्व को नहीं। | अयातुल्ला खामेनेई को ‘प्रतिरोध का प्रतीक’ मानते हैं। |
| पाक जनरल मुनीर | मुनीर का “ईरान चले जाओ” वाला बयान सही और अनुशासित है। | मुनीर को इजरायल-अमेरिका का ‘एजेंट’ और दमनकारी मानते हैं। |
| विदेशी फंडिंग | आरोप है कि ईरानी संस्थाएं भारत में अस्थिरता के लिए फंडिंग कर रही हैं। | इसे केवल मानवीय मदद और धार्मिक एकजुटता मानते हैं। |

