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देना पोत त्रासदी: कूटनीतिक चुप्पी पर भारत घिरा सवालों में

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच एक नया विवाद सामने आया है, जिसमें भारत का नाम भी अप्रत्याशित रूप से जुड़ गया है। यह मामला ईरान के युद्धपोत “देना” से जुड़ा है, जिस पर आधारित एक संक्षिप्त डाक्यूमेंट्री ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा को जन्म दे दिया है। इस डाक्यूमेंट्री में दावा किया गया है कि शांति मिशन पर भारत आए ईरानी युद्धपोत को वापसी के दौरान अमेरिका ने निशाना बनाकर डुबो दिया।

ईरान द्वारा तैयार इस वीडियो में पूरे घटनाक्रम को एक भावनात्मक और राजनीतिक संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। लगभग एक मिनट अड़तीस सेकंड की इस डाक्यूमेंट्री में उन ईरानी नौसैनिकों को श्रद्धांजलि दी गई है, जो कथित हमले में मारे गए। इसके साथ ही इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीतिक मर्यादा और वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी सवाल उठाए गए हैं।

बताया गया है कि ईरान का यह युद्धपोत शांति और सहयोग के संदेश के साथ विभिन्न देशों की यात्रा पर था। इस मिशन के तहत वह पहले मलेशिया पहुंचा, जहां से आगे बढ़ते हुए भारत आया। भारत में इस पोत का स्वागत औपचारिक और कूटनीतिक रूप से किया गया। विशाखापत्तनम में ईरानी नौसैनिकों ने भारतीय अधिकारियों के साथ औपचारिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इस दौरान भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उपस्थिति में एक परेड का भी आयोजन किया गया, जो दोनों देशों के बीच मित्रता और सहयोग का प्रतीक माना गया।

करीब एक सप्ताह के प्रवास के बाद जब यह युद्धपोत भारत से रवाना हुआ, तो घटनाक्रम ने अचानक नाटकीय मोड़ ले लिया। डाक्यूमेंट्री के अनुसार, जैसे ही यह पोत हिंद महासागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में पहुंचा, उसे अमेरिकी टॉरपीडो द्वारा निशाना बनाया गया। इस हमले में पोत पूरी तरह समुद्र में समा गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस जहाज पर लगभग डेढ़ सौ ईरानी नौसैनिक सवार थे। इनमें से करीब तीस को किसी तरह श्रीलंका की मदद से बचाया जा सका, जबकि बाकी सैनिकों की मौत हो गई। डाक्यूमेंट्री में इन शहीद नौसैनिकों की तस्वीरें भी दिखाई गई हैं, जिससे इसका भावनात्मक प्रभाव और अधिक गहरा हो जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम को ईरान ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। डाक्यूमेंट्री में यह संकेत दिया गया है कि शांति मिशन पर निकले किसी सैन्य पोत पर हमला करना न केवल कूटनीतिक मानदंडों के खिलाफ है, बल्कि यह वैश्विक शांति के लिए भी गंभीर खतरा है। हालांकि, इसमें भारत का नाम सीधे तौर पर नकारात्मक रूप में नहीं लिया गया, लेकिन यह जरूर कहा गया कि यह स्थिति कूटनीतिक दृष्टि से संतुलित नहीं मानी जा सकती।

भारत की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। डाक्यूमेंट्री में यह दिखाया गया है कि यह पोत भारत से शांति संदेश के साथ लौटा था, लेकिन हमले के बाद भारत की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। न तो अमेरिका के खिलाफ कोई खुला विरोध दर्ज किया गया और न ही डूबते हुए ईरानी नौसैनिकों को बचाने के लिए कोई सक्रिय पहल दिखाई गई।

इसी मुद्दे को लेकर देश के भीतर भी बहस शुरू हो गई है। कुछ आलोचकों का मानना है कि भारत को इस मामले में अधिक सक्रिय और स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए था, खासकर तब जब घटना उसके समुद्री क्षेत्र के समीप हुई। वहीं, कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत ने अपने कूटनीतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए संयमित प्रतिक्रिया दी।

यह पूरा मामला भारत की विदेश नीति के उस जटिल संतुलन को उजागर करता है, जिसमें उसे एक ओर अपने रणनीतिक साझेदार अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखने होते हैं, तो दूसरी ओर ईरान जैसे पारंपरिक सहयोगियों के साथ भी संतुलन साधना पड़ता है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक गतिविधियां इस संतुलन को और भी चुनौतीपूर्ण बना रही हैं।

डाक्यूमेंट्री के सामने आने के बाद यह मुद्दा केवल एक सैन्य घटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, नैतिकता और वैश्विक शक्ति समीकरणों पर बहस का विषय बन गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस पर आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया देता है या अपनी मौजूदा चुप्पी को ही बरकरार रखता है।

कुल मिलाकर, ईरानी युद्धपोत “देना” की यह घटना और उस पर बनी डाक्यूमेंट्री ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वैश्विक राजनीति में हर घटना के कई आयाम होते हैं। भारत जैसे बड़े देश के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह हर कदम सोच-समझकर उठाए, क्योंकि उसकी हर प्रतिक्रिया न केवल क्षेत्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गहरा प्रभाव डालती है।