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केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी में सनाअ शालान पर ऐतिहासिक शोध चर्चा

भारत और अरब जगत के बीच भाषाई और सांस्कृतिक सेतु को और अधिक मजबूती प्रदान करते हुए, केरल के प्रतिष्ठित कालीकट विश्वविद्यालय में अरबी साहित्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की गई है । कासरगोड सरकारी कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत भारतीय शोधकर्ता अब्बास बी. एम. ने अरबी भाषा और साहित्य विभाग में अपना डॉक्टरेट शोध प्रबंध सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया है । उनका यह शोध कार्य पूरी तरह से अरबी भाषा में लिखा गया है, जिसका शीर्षक “सना शालन के नाटक: शैली और विषय-वस्तु – उनके चयनित कार्यों का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन” है । इस शोध के माध्यम से उन्होंने जॉर्डन की प्रसिद्ध लेखिका और दार्शनिक प्रोफेसर डॉ. सना शालन के नाट्य साहित्य की गहराई और उनकी आधुनिक लेखन शैली को भारतीय अकादमिक जगत के सामने रखा है ।+2

अब्बास बी. एम. का यह व्यापक अध्ययन मुख्य रूप से डॉ. सना शालन के विशाल नाट्य संग्रह “सेल्फी विद द सी” (سيلفي مع البحر) पर केंद्रित है, जिसे वर्ष 2019 में प्रकाशित किया गया था । लगभग 422 पृष्ठों के इस वृहद ग्रंथ में लेखिका के छह कालजयी नाटकों को संकलित किया गया है, जिनमें ‘दावत अला शराफ अल-लौन अल-अहमार’, ‘सेल्फी मा अल-बहर’, ‘वजह वाहिद ली-इथ्नेन मातिरिन’, ‘मुहाकामा अल-इस्म X’, ‘अल-सुल्तान ला यनाम’, और ‘खर्राफिया सादिया उम्म अल-हुज़ूज़’ शामिल हैं । शोधकर्ता के अनुसार, डॉ. सना शालन का चयन इसलिए किया गया क्योंकि वह समकालीन अरब साहित्यकारों और नाटककारों के बीच एक विशिष्ट स्थान रखती हैं । उनकी कृतियों ने अपनी साहित्यिक मूल्य और नैतिक गहराई के कारण अरब जगत में एक बड़ी वैचारिक लहर पैदा की है ।+2

इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. सना शालन को अरबी जगत की पहली महिला नाटककार के रूप में पहचाना गया है, जिन्होंने प्रसिद्ध जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त की जटिल नाट्य तकनीकों का अपने लेखन में समावेश किया है । उन्होंने ‘सेल्फी विद द सी’ और अन्य नाटकों में ‘अलगाव प्रभाव’ (Alienation effect) और ‘चौथी दीवार के गिरने’ (Fall of the fourth wall) जैसी आधुनिक तकनीकों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है, जो दर्शकों को केवल भावुक होने के बजाय तर्क करने पर विवश करती हैं । इसके साथ ही, शोधकर्ता ने यह भी स्पष्ट किया है कि शालन के नाटक केवल तकनीकी रूप से ही समृद्ध नहीं हैं, बल्कि वे नारीवाद, अवैध संतानों के अधिकार, फिलिस्तीनी शरणार्थियों की पीड़ा, ज़ायोनी आंदोलनों की साजिशों और फिलिस्तीनी जनता के प्रतिरोध जैसे गंभीर समकालीन मुद्दों को भी प्रखरता से उठाते हैं ।+1

अब्बास बी. एम. ने अपने शोध में वर्णनात्मक-विश्लेषणात्मक पद्धति और तुलनात्मक मूल्यांकन का उपयोग किया है । शोध प्रबंध की संरचना अत्यंत विस्तृत है, जिसे एक प्रस्तावना, छह प्रमुख अध्यायों और एक निष्कर्ष में विभाजित किया गया है । इनमें नाटक की उत्पत्ति से लेकर जॉर्डन के अरबी नाटकों के विकास और डॉ. सना शालन के व्यक्तिगत जीवन व उनके रचनात्मक योगदान का गहरा विश्लेषण किया गया है । विशेष रूप से चौथे और पांचवें अध्याय में ब्रेख्त की तकनीकों और सामाजिक मुद्दों जैसे पहचान के संकट (विशेषकर फिलिस्तीन में) पर गहन चर्चा की गई है ।+3

इस ऐतिहासिक शोध की मौखिक परीक्षा एक उच्च स्तरीय समिति के समक्ष संपन्न हुई, जिसमें कालीकट विश्वविद्यालय के अरबी विभाग के अध्यक्ष और शोध पर्यवेक्षक प्रोफेसर डॉ. अब्दुल मजीद टी. ए. और मद्रास विश्वविद्यालय के अरबी, फारसी और उर्दू विभाग के अध्यक्ष डॉ. जाहर हुसैन शामिल थे । यह शोध कार्य न केवल भारतीय विद्वानों की अरबी साहित्य पर पकड़ को दर्शाता है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दो महान संस्कृतियों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान का एक सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।