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इस्लामबाद बना शांति का केंद्र: पाकिस्तान में सऊदी, तुर्की और मिस्र की महाबैठक

इस्लामबाद/दुबई।

मध्य पूर्व (Middle East) में गहराते युद्ध के बादलों और ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच जारी भीषण संघर्ष को रोकने के लिए पाकिस्तान ने एक बड़ी कूटनीतिक पहल की है। रविवार, 29 मार्च 2026 को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामबाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अखाड़ा बन गई, जहां क्षेत्र की तीन बड़ी शक्तियों—सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र—के विदेश मंत्रियों ने एक आपातकालीन शांति चर्चा के लिए डेरा डाला।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार के निमंत्रण पर सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान, तुर्की के हाकान फिदान और मिस्र के बद्र अब्देलाती इस्लामबाद पहुंचे। इस उच्च-स्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य ईरान और पश्चिमी ताकतों के बीच जारी शत्रुता को समाप्त कर क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करना है।

पाकिस्तान की ‘मध्यस्थ’ भूमिका: युद्ध रोकने की आखिरी उम्मीद?

पिछले कुछ हफ्तों से मध्य पूर्व की स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई है। 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तो उसके जवाब में ईरान ने भी खाड़ी देशों में अमेरिकी हितों और तेल बुनियादी ढांचों को निशाना बनाया। इस तनाव के बीच पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ (Mediator) के रूप में उभरा है।

इस्लामबाद वर्तमान में तेहरान (ईरान) और वाशिंगटन (अमेरिका) के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभा रहा है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तेल और मालवाहक जहाजों की आवाजाही बुरी तरह बाधित है और क्षेत्रीय हवाई गलियारे असुरक्षित हो चुके हैं।


ईरान को शांति का कड़ा संदेश

विदेशी मेहमानों के पहुंचने से ठीक पहले, शनिवार देर रात इशाक डार ने अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची से फोन पर लंबी बातचीत की। पाकिस्तान ने स्पष्ट शब्दों में ईरान से “सभी हमलों और शत्रुता को समाप्त करने” का आग्रह किया है।

पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के अनुसार:

“विदेश मंत्री डार ने अराघची से कहा कि बातचीत और कूटनीति ही स्थायी शांति का एकमात्र रास्ता है। पाकिस्तान क्षेत्रीय शांति बहाल करने के हर प्रयास का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है। तनाव को कम करना (De-escalation) अब समय की सबसे बड़ी मांग है।”

होर्मुज जलडमरूमध्य से राहत की खबर

कूटनीतिक प्रयासों का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। डार ने शनिवार रात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक बड़ी सफलता की घोषणा की। उन्होंने बताया कि ईरान ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से 20 अतिरिक्त पाकिस्तानी ध्वज वाले जहाजों को गुजरने की अनुमति दे दी है।

इस नई व्यवस्था के तहत अब रोजाना दो पाकिस्तानी जहाज इस रास्ते को पार कर सकेंगे। डार ने इसे ईरान का एक “सकारात्मक और रचनात्मक कदम” बताया, जो क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए एक शुभ संकेत (Harbinger of peace) साबित हो सकता है।


इस्लामबाद बैठक का एजेंडा: क्या निकलेगा समाधान?

सऊदी, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्रियों की यह संयुक्त बैठक केवल औपचारिक मुलाकात नहीं है। इसके पीछे गहरे रणनीतिक मायने छिपे हैं:

  1. सऊदी अरब का रुख: सऊदी अरब अपने तेल क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। प्रिंस फैसल बिन फरहान इस बैठक के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि ईरान-अमेरिका युद्ध की आग उनके देश की अर्थव्यवस्था को न झुलसाए।
  2. तुर्की की भूमिका: तुर्की हमेशा से क्षेत्रीय विवादों में एक संतुलित शक्ति रहा है। हाकान फिदान इस बैठक में गाजा संकट और व्यापक क्षेत्रीय युद्ध को रोकने के लिए ‘मुस्लिम ब्लॉक’ की एकजुटता पर जोर दे रहे हैं।
  3. मिस्र की चिंता: स्वेज नहर और व्यापारिक रास्तों पर असर पड़ने से मिस्र की अर्थव्यवस्था को बड़ा घाटा हो रहा है। बद्र अब्देलाती का ध्यान समुद्र में सुरक्षा (Maritime Security) बहाल करने पर है।

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात

इस्लामबाद पहुंचे ये तीनों दिग्गज नेता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से भी मुलाकात करेंगे। पाकिस्तान सरकार का लक्ष्य इन देशों के साथ मिलकर एक ऐसा ‘शांति रोडमैप’ तैयार करना है जिसे अमेरिका और ईरान दोनों स्वीकार कर सकें।

वैश्विक प्रभाव: तेल की कीमतें और व्यापार

यदि यह वार्ता सफल रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आ रही भारी अस्थिरता पर लगाम लग सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल व्यापार की जीवन रेखा है। पाकिस्तान द्वारा यहां जहाजों की आवाजाही को सुचारू बनाने की पहल ने वैश्विक बाजारों को थोड़ी राहत दी है।

चुनौतियां अभी बाकी हैं

हालांकि पाकिस्तान एक सेतु का काम कर रहा है, लेकिन इजरायल और अमेरिका के कड़े रुख और ईरान के जवाबी हमलों के बीच शांति का रास्ता आसान नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि सऊदी अरब और तुर्की जैसे देश सामूहिक रूप से दबाव बनाने में सफल रहे, तो ही युद्ध विराम की कोई ठोस उम्मीद की जा सकती है।

निष्कर्ष

मध्य पूर्व का भविष्य अब इस्लामबाद की इन बंद कमरों की बैठकों पर टिका है। पाकिस्तान ने एक ‘शांति दूत’ बनकर यह साबित कर दिया है कि वह न केवल दक्षिण एशिया, बल्कि पूरे इस्लामी जगत और वैश्विक कूटनीति में एक अपरिहार्य खिलाड़ी है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि दुनिया एक तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ेगी या कूटनीति एक बार फिर बंदूकों पर भारी पड़ेगी।


एजेंसी इनपुट: एपी (AP)