लद्दाख की नन्ही बच्ची ने तोड़ी अपनी ‘गुल्लक’, ईरान युद्ध पीड़ितों के लिए उमड़ा भारत का प्यार
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लेह/श्रीनगर | विशेष संवाददाता
जब तोपों की गड़गड़ाहट और मिसाइलों के धुएं ने आसमान को काला कर दिया हो, तब एक नन्ही बच्ची की गुल्लक से निकले चंद सिक्के दुनिया को उम्मीद की नई रोशनी दिखाते हैं। लद्दाख के बर्फीले पहाड़ों से लेकर कश्मीर की वादियों तक, इस समय ईरान में युद्ध की मार झेल रहे मासूमों के लिए एक अभूतपूर्व मानवीय लहर उठी है।
लेह (लद्दाख) की एक छोटी सी बच्ची ने जब अपनी बरसों की जमा पूंजी—अपनी ‘गुल्लक’—को तोड़कर ईरान के राहत कार्यों के लिए दान किया, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। यह केवल पैसे का दान नहीं था, बल्कि एक मासूम का दूसरे मासूम के प्रति वह निस्वार्थ प्रेम था, जो धर्म और सरहद की दीवारों को नहीं पहचानता।
लद्दाख से ईरान तक: एकजुटता का संदेश
पिछले 30 दिनों से जारी अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच भीषण संघर्ष ने लाखों लोगों को बेघर और बेसहारा कर दिया है। इस संकट की घड़ी में लद्दाख के निवासी न केवल पैसे, बल्कि अपनी सबसे कीमती वस्तुएं भी दान कर रहे हैं। लेह में आयोजित डोनेशन कैंपों में जो नजारा दिखा, वह दिल जीत लेने वाला था:
- बच्चों का त्याग: राहत सामग्री में बच्चों की साइकिलें और खिलौने भी देखे गए, जो उन्होंने अपने हमउम्र ईरानी बच्चों के लिए भेजे हैं।
- महिलाओं का समर्पण: जम्मू-कश्मीर के चंद्रकोट (रामबन) में इमामबाड़े पर सैकड़ों महिलाएं एकत्र हुईं। उन्होंने न केवल अपने सोने-चांदी के जेवर दान किए, बल्कि अपने बच्चों के कानों की बालियां और हाथों की चूड़ियां तक उतारकर युद्ध पीड़ितों के नाम कर दीं।
- किसानों का जज्बा: समर्पण का आलम यह था कि एक गरीब व्यक्ति ने अपनी भेड़ तक दान में दे दी, ताकि उससे मिलने वाली राशि से किसी भूखे का पेट भर सके।
कश्मीर की वादियों से गूंजी इंसानियत की पुकार
चंद्रकोट से लेकर बडगाम तक, शिया समुदाय और स्थानीय नागरिकों ने बर्तनों से लेकर नकदी और कीमती धातुओं तक का अंबार लगा दिया है। बडगाम के लोगों ने सोने और चांदी के आभूषणों के साथ-साथ अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ईरान के पुनर्निर्माण के लिए समर्पित किया है।
यह उस ‘भारत’ की तस्वीर है, जो वसुधैव कुटुंबकम (पूरी दुनिया एक परिवार है) के सिद्धांत को जीता है।
ईरानी दूतावास ने जताया आभार: “भारत का अहसान कभी नहीं भूलेंगे”
भारतीयों की इस बेमिसाल दरियादिली को देखते हुए भारत में ईरानी दूतावास ने एक भावुक संदेश जारी किया है। 22 मार्च को जारी अपने बयान में दूतावास ने कहा:
“हम भारतीयों की दयालुता और मानवता को कभी नहीं भूलेंगे। कश्मीर के लोगों ने जिस तरह इस संकट की घड़ी में ईरान के साथ खड़े होकर अपनी एकजुटता दिखाई है, वह हमारे दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी। शुक्रिया, भारत।”
युद्ध की पृष्ठभूमि: क्यों मची है तबाही?
पश्चिम एशिया में तनाव उस समय चरम पर पहुंच गया था, जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के एक संयुक्त सैन्य हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और अन्य वरिष्ठ नेताओं की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद तेहरान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया हुई और क्षेत्र एक भीषण युद्ध की आग में झुलस गया।
निष्कर्ष: नफरत पर भारी पड़ती मोहब्बत
एक पत्रकार के रूप में, जब हम युद्ध की रिपोर्टिंग करते हैं, तो अक्सर मौतों के आंकड़े और मिसाइलों की रेंज की बात करते हैं। लेकिन लद्दाख की उस नन्ही बच्ची की ‘गुल्लक’ हमें याद दिलाती है कि युद्ध भले ही राजनेता और सेनाएं लड़ती हों, लेकिन उसका दर्द और उसकी भरपाई आम इंसान ही करता है। भारत के कोने-कोने से जा रही यह मदद केवल सामग्री नहीं, बल्कि एक मरहम है जो ईरान के जख्मी लोगों के काम आएगा।

