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मध्य-पूर्व में शांति की बड़ी पहल: ईरान और अमेरिका के बीच ’14-सूत्रीय’ गुप्त समझौते की तैयारी

वाशिंगटन/तेहरान

खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में महीनों से जारी युद्ध और बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक सफलता की सुगबुगाहट तेज हो गई है। विश्वसनीय सूत्रों और ‘एक्सियोस’ (Axios) की रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान के सामने एक ’14-सूत्रीय’ शांति प्रस्ताव रखा है। यह मसौदा न केवल वर्तमान संघर्ष को समाप्त करने की क्षमता रखता है, बल्कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी एक नई वैश्विक सहमति बना सकता है।

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच पर्दे के पीछे चल रही इस बातचीत ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों और तेल की कीमतों में हलचल पैदा कर दी है।


क्या है ’14-सूत्रीय’ प्रस्ताव? (मुख्य बिंदु)

हालांकि इस समझौते का आधिकारिक पूर्ण पाठ अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अमेरिका और ईरान एक संक्षिप्त समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर करने के बेहद करीब हैं। इस प्रस्तावित सौदे के मुख्य आकर्षण निम्नलिखित हैं:

  • तत्काल युद्धविराम: अमेरिका, ईरान और अप्रत्यक्ष रूप से इजरायल से जुड़े क्षेत्रीय अभियानों के बीच तत्काल संघर्ष विराम।
  • हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलना: ईरान द्वारा इस सामरिक मार्ग पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाना प्राथमिकता है। दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है।
  • यूरेनियम संवर्धन पर रोक: सबसे बड़ा पेच परमाणु संवर्धन की अवधि पर फंसा है। अमेरिका 20 साल की रोक चाहता था, जबकि ईरान 5 साल पर अड़ा था। फिलहाल 15 साल की अवधि पर सहमति बनने के आसार हैं।
  • संवर्धित यूरेनियम का निष्कासन: ईरान अपने पास मौजूद उच्च संवर्धित यूरेनियम को देश से बाहर भेजने पर विचार कर सकता है, जो कि तेहरान की ओर से एक बड़ी रियायत मानी जाएगी।
  • संपत्ति की बहाली और प्रतिबंधों में ढील: बदले में अमेरिका ईरान की जमी हुई संपत्तियों को मुक्त करेगा और आर्थिक प्रतिबंधों में बड़ी राहत देगा।
  • 30 दिनों का ‘नेगोशिएशन विंडो’: एक अस्थायी युद्धविराम के बाद 30 दिनों का समय दिया जाएगा, जिसमें एक स्थायी और व्यापक समझौते (Grand Bargain) की रूपरेखा तैयार की जाएगी।

पर्दे के पीछे के खिलाड़ी: विटकॉफ और कुश्नर की भूमिका

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस एक पन्ने के 14-सूत्रीय MOU को अंतिम रूप देने में ट्रंप के करीबी दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुश्नर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ये अधिकारी सीधे और मध्यस्थों के माध्यम से ईरानी अधिकारियों के संपर्क में हैं।

माना जा रहा है कि यदि सहमति बनती है, तो अगले दौर की उच्च स्तरीय वार्ता इस्लामाबाद (पाकिस्तान) या जेनेवा (स्विट्जरलैंड) में आयोजित की जा सकती है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि 30 दिनों की खिड़की के दौरान ईरान की जहाजरानी पर प्रतिबंध और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को धीरे-धीरे हटाया जाएगा।


अनसुलझे मुद्दे: राह अभी भी चुनौतीपूर्ण

भले ही बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है, लेकिन कुछ जटिल मुद्दे अब भी बाधा बने हुए हैं:

  1. ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम: क्या ईरान अपनी मिसाइल शक्ति को सीमित करने के लिए तैयार होगा?
  2. क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूह: हिजबुल्लाह और हूतियों को ईरान का समर्थन बातचीत का एक संवेदनशील हिस्सा है।
  3. नागरिक परमाणु क्षमता: क्या ईरान को भविष्य में शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए संवर्धन की अनुमति मिलेगी?
  4. निरीक्षण और सत्यापन: भविष्य में ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं से न मुकरे, इसके लिए कड़े अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण तंत्र पर सहमति अनिवार्य है।

बाजार की प्रतिक्रिया और वैश्विक प्रभाव

इस खबर के बाहर आते ही वैश्विक तेल बाजार ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। इस उम्मीद में कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य फिर से पूरी तरह खुल जाएगा, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) के बाद वाशिंगटन और तेहरान के बीच सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता हो सकती है।


संभावित खतरे: क्या समझौता टिक पाएगा?

इस शांति पहल के बावजूद संशय के बादल पूरी तरह छंटे नहीं हैं। ईरान और इजरायल दोनों देशों के ‘कट्टरपंथी’ (Hardliners) किसी भी तरह की रियायत का विरोध कर रहे हैं। इजरायल के भीतर एक बड़ा गुट ईरान को किसी भी तरह की परमाणु छूट देने के खिलाफ है।

दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि बातचीत विफल होती है, तो सैन्य विकल्प फिर से मेज पर होंगे। अमेरिकी बलों को निर्देश है कि विफलता की स्थिति में नाकाबंदी और सैन्य कार्रवाई को दोगुने वेग से शुरू किया जा सकता है।

निष्कर्ष: ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के तहत शुरू हुई यह पहल मध्य-पूर्व के इतिहास को बदलने का माद्दा रखती है। अगले 30 दिन न केवल खाड़ी देशों के लिए, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और शांति के लिए अत्यंत निर्णायक होने वाले हैं।

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