बांग्लादेश की आजादी और जासूसी की अनकही दास्तान-‘जाज़ सिटी’, क्या जीत पाएगी आपका दिल?
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, मुंबई
आजकल ओटीटी की दुनिया में हर रोज नई कहानियों का सैलाब आ रहा है। ‘धुरंधर-2’ की चर्चाओं और वैश्विक युद्धों की गहमागहमी के बीच सोनी लिव पर एक ऐसी सीरीज ने दस्तक दी है जो चुपचाप दर्शकों के बीच अपनी जगह बना रही है। इस सीरीज का नाम है ‘जाज़ सिटी’ (Jazz City)। नाम से भले ही यह अंग्रेजी फिल्म लगे लेकिन यह पूरी तरह से अपनी मिट्टी और इतिहास की कहानी है। यह सीरीज हमें 1971 के उस दौर में ले जाती है जब बांग्लादेश अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था।

एक जासूस और एक नाइट क्लब की अनोखी जुगलबंदी
‘जाज़ सिटी’ की कहानी 1970 के दशक के कोलकाता के इर्द-गिर्द बुनी गई है। पार्क स्ट्रीट पर स्थित एक मशहूर नाइट क्लब इसका केंद्र है। इस क्लब का मालिक है जिमी रॉय। जिमी एक ऐसा इंसान है जिसे राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। वह अपनी रंगीन दुनिया और बिजनेस में खुश है। लेकिन हालात उसे एक गैर-राजनीतिक व्यवसायी से जासूस और फिर एक क्रांतिकारी बना देते हैं।
कहानी में मोड़ तब आता है जब जिमी को तीन बांग्लादेशी छात्रों को बचाने की जिम्मेदारी मिलती है। ये छात्र पाकिस्तानी सेना की नजरों से बचकर भाग रहे हैं। यहीं से जिमी का सामना भारतीय खुफिया अधिकारी सिन्हा से होता है। सिन्हा को जिमी में वह जांबाज जासूस दिखता है जो भारत के सीक्रेट ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है।
अरिफिन शुवो: ढालीवुड का सितारा अब वैश्विक मंच पर
इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत इसके मुख्य अभिनेता अरिफिन शुवो हैं। बांग्लादेशी सुपरस्टार शुवो ने इससे पहले फिल्म ‘मुजीब’ में शेख मुजीबुर रहमान का किरदार निभाया था। ‘जाज़ सिटी’ में उन्होंने जिमी रॉय के रूप में जान डाल दी है। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘द हॉलीवुड रिपोर्टर’ ने भी उनकी एक्टिंग की जमकर तारीफ की है। पर्दे पर उनके सिगरेट जलाने के अंदाज से लेकर भारी संवादों तक उनकी मौजूदगी बेहद मनोरंजक है। आलोचकों का मानना है कि भले ही सीरीज की कहानी में कुछ कमियां हों लेकिन अरिफिन शुवो ने अपने अभिनय से इसे संभाल लिया है।

प्रमुख जानकारी एक नजर में
- मुख्य कलाकार: अरिफिन शुवो, सौरसेनी मैत्रा, शांतनु घटक, शताफ फिगार, सायनदीप सेन
- निर्माता व निर्देशक: सौमिक सेन (गुलाब गैंग और जुबली फेम)
- प्लेटफॉर्म: सोनी लिव (SonyLiv)
- स्टार रेटिंग: ★★ (दो स्टार)
- एपिसोड: 10 एपिसोड (कुल 10 घंटे)

कैसी है सीरीज: उम्मीदें और हकीकत
सौमिक सेन ने इस सीरीज के जरिए 1960 के दशक के अंत और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध की भावना को दिखाने की कोशिश की है। सीरीज यह याद दिलाती है कि बांग्लादेश की आजादी में भारत का योगदान कितना बड़ा था। हालांकि सीरीज को लेकर कुछ मिश्रित प्रतिक्रियाएं भी आई हैं।
1. रफ़्तार की समस्या 10 एपिसोड में फैली इस सीरीज की शुरुआत काफी धीमी है। किरदार अपनी जगह बनाने में काफी वक्त लेते हैं। 10 घंटे लंबा यह सफर कहीं-कहीं उबाऊ लगने लगता है। दर्शकों को लगता है कि जो कहानी 5 घंटों में खत्म हो सकती थी उसे जबरदस्ती खींचा गया है।
2. संगीत और प्रस्तुति फिल्म का नाम ‘जाज़ सिटी’ है और यह एक म्यूजिक क्लब पर आधारित है। ऐसे में उम्मीद थी कि संगीत बेहद शानदार होगा। लेकिन यहाँ निराशा हाथ लगती है। जाज़ संगीत की वह गहराई और रूह सीरीज में गायब दिखती है। क्लब की मुख्य गायिका पामेला के गाने और उनका अंदाज भी कुछ अटपटा सा लगता है।
3. कहानी का पुराना ढांचा आलोचकों का कहना है कि कहानी वही पुराने ढर्रे पर चलती है। भारत को रक्षक, बांग्लादेश को संकट में और पाकिस्तान को विलेन के रूप में दिखाया गया है। इसमें कुछ भी नया प्रयोग नहीं किया गया है। संवादों में भी पुराने और घिसे-पिटे जुमलों का इस्तेमाल ज्यादा हुआ है।

अभिनय के मामले में कौन किस पर भारी?
सीरीज में अरिफिन शुवो के अलावा सौरसेनी मैत्रा ने शीला का किरदार निभाया है। शीला जिमी की पुरानी प्रेमिका है जिसका दिल शरणार्थियों का दुख देखकर पिघल जाता है। शांतनु घटक ने भारतीय इंटेलिजेंस ऑफिसर के रूप में संजीदा काम किया है। वहीं विलेन के रूप में शताफ फिगार का गुस्सा थोड़ा लाउड लगता है। इंदिरा गांधी के किरदार में आलोकिका डे भी उतनी प्रभावशाली नहीं लगतीं।
क्या आपको ‘जाज़ सिटी’ देखनी चाहिए?
अगर आप अरिफिन शुवो के प्रशंसक हैं तो यह सीरीज आपके लिए मस्ट वॉच है। उनकी स्टाइलिश मौजूदगी ही वह वजह है जो आपको स्क्रीन से बांधे रखती है। इसके अलावा अगर आपको पुराने कोलकाता की साज़िशों, जासूसों और विद्रोहियों की कहानियों में दिलचस्पी है तो आप इसे एक बार देख सकते हैं।
फिल्म में एक पादरी का किरदार भी काफी रहस्यमयी है। वह ईसाई सीख के बिल्कुल उलट सोच रखता है। कोलकाता के उस दौर को री-क्रिएट करने के लिए सेट और लोकेशन पर काफी मेहनत की गई है। हालांकि कमजोर वीएफएक्स (VFX) कई जगहों पर इस मेहनत को फीका कर देते हैं।

निष्कर्ष: आधा अधूरा सफर
‘जाज़ सिटी’ में एक बेहतरीन जासूसी थ्रिलर बनने की पूरी क्षमता थी। सौमिक सेन की सोच बड़ी थी लेकिन उसे पर्दे पर उतारने में कुछ चूक हो गई। किरदारों के बदलाव बहुत सुविधाजनक और बेवकूफी भरे लगते हैं। जिमी रॉय का एक आम आदमी से अचानक जासूस बन जाना गले से नहीं उतरता।
फिर भी बांग्लादेश मुक्ति युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी यह कहानी भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की एक अहम कड़ी को सामने लाती है। अरिफिन शुवो की जबरदस्त परफॉर्मेंस ने इस सीरीज को डूबने से बचा लिया है। अगर आपके पास काफी समय है और आप धीमी रफ़्तार वाले ऐतिहासिक ड्रामा पसंद करते हैं तो सोनी लिव पर ‘जाज़ सिटी’ का लुत्फ उठा सकते हैं।
क्या जिमी रॉय इस युद्ध में अपनी पहचान बचा पाएगा? क्या वह उन तीन छात्रों को सुरक्षित निकाल पाएगा? इन सवालों के जवाब आपको सीरीज के आखिरी एपिसोड तक मिलेंगे। फिलहाल यह सीरीज उन लोगों के बीच चर्चा का विषय है जो इतिहास को जासूसी के चश्मे से देखना पसंद करते हैं।

