ईरानी सर्वोच्च नेता के दफ़न पर मौलाना रजानी बोले,आम जनता जैसा हो अंतिम संस्कार
अहमदाबाद
ईरान के सर्वोच्च नेता सैयद अली खामनेई के निधन और उनके अंतिम संस्कार की खबरों के बीच भारतीय शिया धर्मगुरु मौलाना हसन अली रजानी का एक बड़ा बयान सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान सरकार सर्वोच्च नेता को मशहद शहर में स्थित आठवें इमाम, इमाम अली रज़ा के पवित्र हरम (मज़ार) के करीब दफनाने की योजना बना रही है।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मौलाना रजानी ने एक गहरा तर्क पेश किया है। उन्होंने कहा कि यदि सर्वोच्च नेता को इमाम अली रज़ा के बगल में विशेष स्थान दिया जाता है, तो ईरान की 90 मिलियन (9 करोड़) शिया जनता को भी वहीं दफन होने का हक मिलना चाहिए।
बंकर वाली घटना का दिया हवाला
मौलाना रजानी ने सर्वोच्च नेता के जीवन की एक पुरानी घटना को याद करते हुए अपने तर्क को मजबूती दी। उन्होंने बताया कि जब एक बार खामनेई को सुरक्षा कारणों से बंकर में जाने की सलाह दी गई थी, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था।
खामनेई के शब्द थे: “अगर मेरे 9 करोड़ ईरानियों को बंकर में छिपने की जगह मिल सकती है, तो ही मैं बंकर में जाऊंगा।”
चूंकि पूरी जनता के लिए बंकर में जगह होना नामुमकिन था, इसलिए वे खुद भी नहीं गए। मौलाना रजानी का कहना है कि जो नेता जीवन भर अपनी जनता के साथ खड़ा रहा, उसकी रूह तभी खुश होगी जब उसे मृत्यु के बाद भी आम नागरिक की तरह ही माना जाए।
विशेषाधिकार बनाम सार्वजनिक न्याय
मौलाना ने सीधे तौर पर ईरान सरकार को सुझाव दिया है कि यदि सरकार सभी 90 मिलियन नागरिकों को इमाम अली रज़ा के करीब दफनाने की व्यवस्था कर सकती है, तभी सर्वोच्च नेता को वहां दफन किया जाए। यदि ऐसा संभव नहीं है—जो कि व्यावहारिक रूप से असंभव है—तो उन्हें किसी सामान्य कब्रिस्तान (सार्वजनिक स्थान) पर दफन किया जाना चाहिए।
मौलाना रजानी का यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब ईरान एक कठिन संक्रमण काल से गुजर रहा है। उनका यह दृष्टिकोण न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक समानता और सर्वोच्च नेता के अपने सिद्धांतों के प्रति एक श्रद्धांजलि के रूप में देखा जा रहा है। उनके अनुसार, एक सच्चा नेता अपनी मृत्यु के बाद भी अपनी जनता से अलग विशेष दर्जा नहीं चाहता।

