हिंदू-मुस्लिम एकता की तस्वीर: दिल्ली की नेहा भारती हर साल कराती हैं इफ्तार
Table of Contents
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
रमज़ान का महीना जहां मुसलमानों के लिए इबादत, सब्र और रहमत का समय होता है, वहीं यह इंसानियत, आपसी सम्मान और भाईचारे का भी संदेश देता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से इन दिनों ऐसे कई उदाहरण सामने आ रहे हैं, जहां दूसरे धर्मों के लोग भी रमज़ान के रोज़ेदारों के प्रति सम्मान और सहयोग का परिचय दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि इफ्तार और सेहरी के दौरान सांप्रदायिक सौहार्द की मिसालें कायम की जा रही हैं।
इसी कड़ी में राजधानी दिल्ली की रहने वाली नेहा भारती एक बार फिर चर्चा में हैं। पिछले चार वर्षों से वह रमज़ान के दौरान पुरानी दिल्ली स्थित जामा मस्जिद में रोज़ेदारों के लिए इफ्तार का आयोजन कर रही हैं। इस वर्ष भी उन्होंने यह परंपरा जारी रखी है। खास बात यह है कि नेहा इफ्तार के लिए तैयार किए जाने वाले अधिकांश व्यंजन अपने घर पर ही बनाती हैं और उन्हें स्वयं लेकर जामा मस्जिद पहुंचती हैं।
ये दिल्ली की रहने वाली एक हिंदू लड़कीय नेहा भारती हैं जो पिछले 4 साल से रमजान के महीने में दिल्ली की जामा मस्जिद पर जाकर रोज़ेदारों को इफ्तार कराती आई हैं, वो एक एनजीओ भी चलाती हैं और हिंदू-मुस्लिम एकता, अमन और मोहब्बत का पैगाम फैलाने के लिए ये काम करती हैं, सैल्यूट! pic.twitter.com/5H8Q3nyu75
— Karishma Aziz (@KarishmaAziz_) February 20, 2026
चार साल से जारी है सेवा का सिलसिला
नेहा भारती का कहना है कि उन्होंने यह पहल चार वर्ष पहले शुरू की थी, जब उन्होंने समाज में बढ़ती दूरियों और अविश्वास को महसूस किया। उनका मानना है कि त्योहार केवल किसी एक समुदाय के नहीं होते, बल्कि वे समाज को जोड़ने का अवसर भी देते हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने जामा मस्जिद में रोज़ेदारों के लिए इफ्तार बांटना शुरू किया।
वह बताती हैं कि शुरुआत में यह कार्य उन्होंने अकेले किया था, लेकिन समय के साथ उनके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य भी इस पहल से जुड़ गए। अब पूरा परिवार मिलकर घर पर इफ्तार के लिए विभिन्न व्यंजन तैयार करता है। इनमें फल, खजूर, पकौड़े, मिठाइयां और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। नेहा यह सुनिश्चित करती हैं कि भोजन ताज़ा, स्वादिष्ट और संतुलित हो।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो
इस वर्ष भी जामा मस्जिद में इफ्तार वितरण का उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में नेहा रोज़ेदारों को इफ्तार के पैकेट वितरित करती नजर आ रही हैं। उन्होंने एक वीडियो संदेश में कहा कि वह एक एनजीओ भी चलाती हैं और हिंदू-मुस्लिम एकता, अमन और मोहब्बत का संदेश फैलाने के उद्देश्य से यह कार्य करती हैं।
हालांकि, सोशल मीडिया पर जहां बड़ी संख्या में लोग उनके इस प्रयास की सराहना कर रहे हैं, वहीं कुछ उपयोगकर्ताओं ने नकारात्मक टिप्पणियां भी की हैं। कुछ आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणियां भी सामने आईं, जिनमें उनके धर्म और व्यक्तिगत जीवन को लेकर असंवेदनशील बातें कही गईं। इसके बावजूद, नेहा ने इन प्रतिक्रियाओं पर सार्वजनिक रूप से कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी और अपने काम पर ध्यान केंद्रित रखा।

समर्थन की भी कमी नहीं
नेहा के समर्थन में भी बड़ी संख्या में लोग सामने आए हैं। कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने उनके प्रयास को इंसानियत और भाईचारे की मिसाल बताया। एक यूजर ने लिखा कि जब नीयत साफ होती है तो मजहब दीवार नहीं, बल्कि पुल बन जाता है। कई अन्य लोगों ने भी कहा कि ऐसे प्रयास समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और नफरत के माहौल को कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं।
शिक्षा और सामाजिक सोच
पुरानी दिल्ली की निवासी नेहा भारती दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं। वह बताती हैं कि समाज में बढ़ते तनाव और दूरी ने उन्हें इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुसार, शांति और एकता बनाए रखने के लिए एक-दूसरे के त्योहारों और परंपराओं का सम्मान करना जरूरी है। यही विचार उन्हें हर वर्ष रमज़ान के दौरान जामा मस्जिद तक ले जाता है।
नेहा का कहना है कि रमज़ान केवल मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए रहमत का महीना है। वह मानती हैं कि अगर लोग एक-दूसरे की खुशियों और आस्थाओं का सम्मान करें, तो समाज में सद्भाव कायम रह सकता है। उनका उद्देश्य केवल भोजन बांटना नहीं, बल्कि लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करना है।
परिवार का सहयोग
नेहा अपने माता-पिता को इस पहल का सबसे बड़ा सहारा मानती हैं। उनका कहना है कि उनके माता-पिता ने हमेशा उन्हें सिखाया कि नफरत से कभी कुछ अच्छा नहीं होता और जहां तक संभव हो, प्यार बांटना चाहिए। परिवार के सदस्य घर पर मिलकर इफ्तार की तैयारी करते हैं—कोई सब्जियां काटता है, कोई मिठाई तैयार करता है और कोई पैकेट तैयार करता है।
नेहा बताती हैं कि शुरुआत में कुछ रिश्तेदारों और परिचितों ने उनके इस प्रयास का मजाक भी उड़ाया। लेकिन उन्होंने इन बातों को नजरअंदाज करते हुए अपना काम जारी रखा। आज, जब उनके वीडियो सोशल मीडिया पर सराहे जा रहे हैं, तो वही लोग उनकी पहल को सकारात्मक नजरिए से देखने लगे हैं।
समाज में सकारात्मक संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रयास सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने में मदद करते हैं। धार्मिक त्योहारों के दौरान विभिन्न समुदायों के बीच सहयोग और सहभागिता से आपसी विश्वास बढ़ता है। जामा मस्जिद जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल पर एक गैर-मुस्लिम महिला द्वारा इफ्तार वितरण की पहल कई लोगों के लिए प्रेरणास्पद है।
नेहा का कहना है कि दुनिया में चाहे जितनी भी नफरत फैल जाए, प्यार हमेशा जीवित रहेगा। वह मानती हैं कि जिन समाजों में आपसी सम्मान और सहयोग होता है, वहां शांति और समृद्धि बनी रहती है। यही विश्वास उन्हें हर वर्ष रमज़ान में इस सेवा कार्य को दोहराने के लिए प्रेरित करता है।

बढ़ती भागीदारी
समाज के विभिन्न वर्गों से लोग अब उनके साथ जुड़ने लगे हैं। कुछ लोग आर्थिक सहयोग देते हैं तो कुछ स्वयंसेवक के रूप में इफ्तार वितरण में मदद करते हैं। इससे इफ्तार की थाली का दायरा भी बढ़ता जा रहा है और अधिक रोज़ेदारों तक भोजन पहुंचाया जा रहा है।
नेहा की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब सामाजिक ध्रुवीकरण की चर्चाएं अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। ऐसे माहौल में उनका प्रयास एक अलग संदेश देता है—कि संवाद, सहयोग और सेवा के जरिए समाज में सकारात्मक बदलाव संभव है।
निष्कर्ष
रमज़ान के इस पवित्र महीने में नेहा भारती की पहल एक बार फिर चर्चा में है। जहां एक ओर कुछ लोगों ने उनके प्रयास पर आपत्ति जताई, वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने इसे इंसानियत और भाईचारे की मिसाल बताया है। जामा मस्जिद में रोज़ेदारों को इफ्तार बांटने का उनका सिलसिला चौथे वर्ष भी जारी है और वह इसे आगे भी जारी रखने का संकल्प व्यक्त करती हैं।
नेहा कहती हैं कि त्योहारों का असली संदेश लोगों को जोड़ना है, बांटना नहीं। उनके अनुसार, यदि हर व्यक्ति अपने स्तर पर थोड़ा-सा भी योगदान दे, तो समाज में प्रेम और सद्भाव की भावना को मजबूत किया जा सकता है। रमज़ान के इस अवसर पर उनकी यह पहल सामाजिक एकता की एक सकारात्मक कहानी के रूप में सामने आई है।

