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मोहसिना किदवई : भारतीय राजनीति के एक स्वर्णिम युग का अंत

पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की दिग्गज नेता मोहसिना किदवई के निधन से भारतीय राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसे भरना नामुमकिन है। उनके निधन पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ‘हेमवती नंदन बहुगुणा स्मृति समिति’ द्वारा एक शोक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें राजनीतिक दिग्गजों ने नम आंखों से अपनी प्रिय नेत्री को श्रद्धांजलि अर्पित की।

शोक सभा और भावभीनी श्रद्धांजलि

लखनऊ के गोमती एनक्लेव स्थित प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी (उपाध्यक्ष, ऑल इंडिया हेमवती नंदन बहुगुणा स्मृति समिति) के आवास पर आयोजित इस सभा की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश के पूर्व कार्यकारी मुख्यमंत्री और समिति के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अम्मार रिजवी ने की।

समिति द्वारा पारित शोक प्रस्ताव में मोहसिना किदवई के निधन को ‘अपूरणीय क्षति’ करार दिया गया। प्रस्ताव में कहा गया कि मोहसिना जी ने 50 वर्षों से अधिक के अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन में हमेशा गरीबों, वंचितों और विशेषकर महिलाओं के उत्थान के लिए काम किया। वे देश की पहली पंक्ति की महिला नेताओं में शामिल थीं और आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेंगी।

आजमगढ़ की ऐतिहासिक जीत और कांग्रेस का पुनर्जन्म

मोहसिना किदवई का नाम भारतीय इतिहास में उस साहसी नेत्री के रूप में दर्ज है, जिन्होंने डूबती हुई कांग्रेस को सहारा दिया था। 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद, जब इंदिरा गांधी और संजय गांधी जैसे दिग्गज भी चुनाव हार गए थे, तब 1978 में आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव में मोहसिना किदवई ने जीत दर्ज कर पूरे देश को चौंका दिया था।

उनकी इस जीत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया और यह माना जाता है कि इसी जीत ने 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी की नींव रखी थी। अवध के एक रूढ़िवादी लेकिन कुलीन मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाली मोहसिना जी ने साबित कर दिया कि सादगी और दृढ़ संकल्प से किसी भी चुनौती को जीता जा सकता है।

सफेद खादी और बेदाग राजनीतिक सफर

1960 में मात्र 28 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य बनकर अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाली मोहसिना किदवई ने केंद्र और राज्य दोनों सरकारों में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों के मंत्रिमंडल में वे एक भरोसेमंद मंत्री रहीं।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि उनका बेदाग चरित्र रहा। पांच दशकों से ज्यादा के सार्वजनिक जीवन में उन पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा। उनके ससुर जमीलुर रहमान किदवई और पति खलीलुर रहमान किदवई ने उनके राजनीतिक सफर में हमेशा उनका मार्गदर्शन और समर्थन किया।

Memoirs: ‘माय लाइफ इन इंडियन पॉलिटिक्स’

मोहसिना किदवई ने भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ाव को अपनी आत्मकथा “My Life in Indian Politics” में बहुत खूबसूरती से समेटा है, जिसे वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने संकलित किया है। इस किताब में उन्होंने इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी तक के साथ काम करने के अपने अनुभवों को साझा किया है।

उन्होंने अपने समकालीन नेताओं जैसे अर्जुन सिंह, एन.डी. तिवारी, प्रणब मुखर्जी, अहमद पटेल और लालू प्रसाद यादव के बारे में भी बेबाकी से लिखा है। उनके लेखन में संत कबीर का ‘कबीरपंथ’ झलकता है— “ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर”। उन्होंने शालीनता के साथ अपनी बात रखी और कभी किसी विवाद को तूल नहीं दिया।

एक आदर्श व्यक्तित्व: राजनीति से परिवार तक

मोहसिना किदवई न केवल एक कुशल राजनीतिज्ञ थीं, बल्कि वे एक आदर्श पत्नी, मां और बहन भी थीं। उन्होंने अपनी किताब अपने दिवंगत पति खलीलुर रहमान किदवई को समर्पित की है, जिनके बारे में उन्होंने लिखा है, “खलील, तुम्हारी रूह हमेशा मेरे साथ रही और तुमने मुझे अपने सपनों की उड़ान भरने की आजादी दी।”

लखनऊ की इस शोक सभा में प्रो. रीता बहुगुणा जोशी, डॉ. अम्मार रिजवी, अरशद आजमी, प्रदीप कपूर और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने उनके साथ बिताए पलों को याद किया। अंत में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए दुआ की गई और उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की गई।


मोहसिना किदवई का सफरनामा: एक नजर में

मील का पत्थरविवरण
राजनीतिक शुरुआत1960 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य (MLC)
ऐतिहासिक मोड़1978 आजमगढ़ उपचुनाव में जीत, जिसने कांग्रेस को पुनर्जीवित किया
मंत्रिमंडलयूपी सरकार में उद्योग मंत्री और केंद्र में कई महत्वपूर्ण मंत्रालय
संगठनयूपी कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष और एआईसीसी महासचिव
साहित्यिक योगदानआत्मकथा “माय लाइफ इन इंडियन पॉलिटिक्स”

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निष्कर्ष: मोहसिना किदवई का जाना एक ऐसे युग का अंत है जहां राजनीति मूल्यों, मर्यादा और शालीनता पर आधारित थी। वे धर्मनिरपेक्षता और महिला सशक्तिकरण की सच्ची प्रतिमूर्ति थीं।

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