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अमेरिका-ईरान युद्धविराम का स्वागत, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने की स्थायी शांति की मांग

मुख्य आकर्षण:

  • युद्धविराम का स्वागत: जेआईएच ने इसे मानवीय संकट टालने वाला कदम बताया।
  • जवाबदेही की मांग: अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन पर कार्रवाई की अपील।
  • आर्थिक राहत: हॉर्मुज जलडमरूमध्य खुलने से भारत को होगा लाभ।
  • लेबनान पर रुख: चयनात्मक युद्धविराम को अस्थिरता का कारण बताया।

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (JIH) के अध्यक्ष सैयद सादतुल्लाह हुसैनी ने अमेरिका और ईरान के बीच घोषित दो सप्ताह के युद्धविराम का स्वागत किया है। उन्होंने इसे वैश्विक तनाव को कम करने की दिशा में एक ‘अनिवार्य विराम’ करार दिया। हुसैनी ने जोर देकर कहा कि इस शत्रुता के रुकने से न केवल बेकसूर लोगों की जान बचेगी, बल्कि एक गहरे मानवीय संकट को टलने में भी मदद मिलेगी।

सैन्य आक्रामकता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन

मीडिया को जारी एक आधिकारिक बयान में जेआईएच अध्यक्ष ने कहा कि पिछले कुछ हफ्तों के दौरान ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया था। उन्होंने कहा, “इस आक्रामकता के कारण बड़े पैमाने पर नागरिक हताहत हुए और बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन का गंभीर मामला है। यद्यपि युद्धविराम एक राहत की खबर है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि अस्थायी विराम कोई स्थायी समाधान नहीं है।”

हुसैनी ने स्पष्ट किया कि दुनिया में स्थायी और न्यायपूर्ण शांति तभी संभव है जब सैन्य आक्रामकता को पूरी तरह समाप्त किया जाए, देशों की संप्रभुता का सम्मान हो और अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़ने वालों की जवाबदेही तय की जाए।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत पर प्रभाव

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने युद्धविराम के आर्थिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला। सैयद सादतुल्लाह हुसैनी के अनुसार, हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के फिर से खुलने की संभावना से वैश्विक स्तर पर राहत मिली है। उन्होंने कहा, “इस जलमार्ग के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई थी, जिसका सीधा असर भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा था। अब जबकि तनाव कम हो रहा है, तो अमेरिका और इजरायल को, जिन्होंने इस युद्ध की शुरुआत की थी, सार्थक राजनयिक बातचीत की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।”

लेबनान पर इजरायली हमलों पर चिंता

हुसैनी ने युद्धविराम की ‘नाजुक प्रकृति’ की ओर इशारा करते हुए चेतावनी दी कि किसी भी पक्ष को आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से लेबनान में इजरायल की निरंतर सैन्य कार्रवाई की निंदा की। उन्होंने कहा, “कोई भी चयनात्मक (Selective) युद्धविराम, जो संघर्ष के कुछ क्षेत्रों (जैसे लेबनान) को बाहर रखता है, क्षेत्र में अस्थिरता और मानवीय पीड़ा को बढ़ाने का जोखिम पैदा करता है। शांति पूर्ण और व्यापक होनी चाहिए।”

संवाद ही एकमात्र समाधान

जेआईएच अध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि हालिया संघर्ष ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सैन्य शक्ति के जरिए जटिल राजनीतिक विवादों को हल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “इतने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई के बाद भी स्थिति अंततः वार्ता की मेज पर ही लौट आई है। यह साबित करता है कि स्थायी समाधान केवल संवाद, आपसी सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन से ही प्राप्त हो सकता है।”

भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील

अंत में, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया कि वे उन शक्तियों की जवाबदेही सुनिश्चित करें जिन्होंने मानवीय कानूनों का उल्लंघन किया है। हुसैनी ने भारत सरकार से भी आह्वान किया कि वह वैश्विक शांति प्रयासों में अपनी सक्रिय और सैद्धांतिक भूमिका निभाए ताकि मध्य पूर्व में स्थायी स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

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