ट्रंप-नेतन्याहू की गुप्त साजिश: ईरान को दहलाने और ‘सत्ता परिवर्तन’ का पूरा सनसनीखेज सच
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मुस्लिम नाउ विशेष
अमेरिकी पत्रकार जोनाथन स्वान और मैगी हैबरमैन की एक विस्फोटक रिपोर्ट ( How Trump Took the U.S. to War With Ira) ने वैश्विक राजनीति में भूचाल ला दिया है। 10,000 शब्दों की इस विस्तृत खोजी रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कैसे इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘मोहरा’ बनाकर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या और ईरान में तख्तापलट की एक बेहद खतरनाक साजिश रची।
यह रिपोर्ट जल्द आने वाली पुस्तक “Regime Change: Inside the Imperial Presidency of Donald Trump” के अंशों पर आधारित है, जो बताती है कि कैसे एक ‘गुप्त बैठक’ ने पूरी दुनिया को महायुद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया।

11 फरवरी: व्हाइट हाउस के ‘सिचुएशन रूम’ में रची गई पटकथा
11 फरवरी की सुबह, एक काली SUV व्हाइट हाउस पहुंचती है। इसमें सवार थे बेंजामिन नेतन्याहू, जो रिपोर्टरों की नजरों से बचते हुए सीधे ‘सिचुएशन रूम’ पहुंचे। आमतौर पर इस कमरे का इस्तेमाल विदेशी नेताओं के लिए नहीं होता, लेकिन उस दिन का मकसद ‘आम’ नहीं था।
नेतन्याहू के पीछे लगी बड़ी स्क्रीन पर मोसाद (Mossad) के निदेशक डेविड बार्निया और इजरायली जनरल दिखाई दे रहे थे। कमरे में ट्रंप के साथ उनकी ‘वॉर कैबिनेट’ मौजूद थी—जिसमें रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, विदेश मंत्री मार्को रूबियो और सीआईए निदेशक जॉन रैटक्लिफ शामिल थे। जेडी वैंस उस समय अजरबैजान में थे और इस बैठक से दूर थे।
नेतन्याहू का जाल: ट्रंप को दिखाया ‘ईरान का भविष्य’
नेतन्याहू ने एक घंटे की प्रेजेंटेशन में ट्रंप को यकीन दिलाया कि ईरान का अंत निकट है। इजरायलियों ने ट्रंप को एक वीडियो दिखाया, जिसमें शाह के निर्वासित बेटे रजा पहलवी को ईरान के अगले धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में पेश किया गया था।
इजरायल का दावा था:
- ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम कुछ ही हफ्तों में तबाह हो जाएगा।
- बमबारी शुरू होते ही ईरानी जनता सड़कों पर उतर आएगी और विद्रोह कर देगी।
- ईरानी कुर्द लड़ाके उत्तर-पश्चिम से जमीनी हमला करेंगे।
- ईरान इतना कमजोर हो जाएगा कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद नहीं कर पाएगा।
नेतन्याहू की इस ‘पक्की जीत’ की लय ने ट्रंप को मंत्रमुग्ध कर दिया। ट्रंप ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे तो यह बहुत अच्छा लग रहा है।”
अमेरिकी इंटेलिजेंस की चेतावनी: “यह हास्यस्पद है”
अगले दिन, 12 फरवरी को अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने ट्रंप के सामने इस योजना का विश्लेषण रखा। सीआईए निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने नेतन्याहू के ‘सत्ता परिवर्तन’ और ‘विद्रोह’ के दावे को सिरे से खारिज करते हुए केवल एक शब्द इस्तेमाल किया— “हास्यास्पद” (Ridiculous)।
अमेरिकी जनरलों का मानना था कि अयातुल्ला को मार गिराना (Decapitation) और मिसाइल प्रोग्राम तबाह करना तो संभव है, लेकिन जनता का विद्रोह और किसी बाहरी नेता को गद्दी पर बिठाना हकीकत से कोसों दूर था। जनरल डैन केन ने राष्ट्रपति को आगाह किया कि इजरायल अपनी बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है क्योंकि उन्हें अमेरिकी सेना की जरूरत है।
जेडी वैंस का विरोध और ट्रंप का अटूट विश्वास
व्हाइट हाउस के भीतर जेडी वैंस इस युद्ध के सबसे मुखर विरोधी थे। उन्होंने इसे “संसाधनों की भारी बर्बादी” बताया। वहीं, जनरल केन ने चेतावनी दी कि ईरान के साथ युद्ध से अमेरिकी मिसाइल इंटरसेप्टर का भंडार खत्म हो जाएगा, जो पहले ही यूक्रेन और इजरायल की मदद के कारण दबाव में था।
लेकिन ट्रंप पर इन चेतावनियों का कोई असर नहीं हुआ। उनके दिमाग में दो बातें घर कर गई थीं:
- अयातुल्ला खामेनेई और शीर्ष कमांडरों का खात्मा।
- ईरानी सेना को पूरी तरह पंगु बनाना।
ट्रंप को वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के खिलाफ मिली हालिया सफलता और जून में ईरान पर की गई बमबारी के प्रति ईरान की ‘नरम प्रतिक्रिया’ ने यह भरोसा दिला दिया था कि यह युद्ध बहुत संक्षिप्त और निर्णायक होगा।
साजिश के पीछे का व्यक्तिगत कारण: प्रतिशोध की आग
रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप के इस कड़े रुख के पीछे एक व्यक्तिगत कारण भी था। अमेरिकी खुफिया जानकारी के अनुसार, ईरान ने जनवरी 2020 में जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए ट्रंप की हत्या की साजिश रची थी। ट्रंप 47 साल पुराने उस ‘कांटे’ (ईरानी शासन) को हमेशा के लिए निकाल फेंकना चाहते थे, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अमेरिका को चुनौती दे रहा था।
26 फरवरी: अंतिम बैठक और ‘डेथ वारंट’ पर हस्ताक्षर
गुरुवार, 26 फरवरी की शाम 5 बजे सिचुएशन रूम में अंतिम बैठक हुई। इस समूह को इतना गोपनीय रखा गया था कि ट्रेजरी सेक्रेटरी और नेशनल इंटेलिजेंस की डायरेक्टर तुलसी गबार्ड को भी अंधेरे में रखा गया।
बैठक में मेज के चारों ओर बैठे सलाहकारों से ट्रंप ने राय मांगी:
- जेडी वैंस: “मुझे लगता है यह बुरा विचार है, लेकिन आप करेंगे तो मैं साथ हूँ।”
- मार्को रूबियो: “सत्ता परिवर्तन नहीं, केवल मिसाइल प्रोग्राम खत्म करने पर ध्यान दें।”
- पीट हेगसेथ: “हमें अभी ही ईरान से निपट लेना चाहिए।”
- डेविड वॉरिंगटन (वकील): “कानूनी रूप से यह स्वीकार्य है।”
अंत में ट्रंप ने अपना फैसला सुनाया: “मुझे लगता है कि हमें यह करना चाहिए।” उन्हें डर था कि अगर देरी की गई, तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सुरक्षा कवच के भीतर ले जाएगा।

ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ की शुरुआत
अगले दिन, एयर फोर्स वन विमान में सवार ट्रंप ने तय समय से 22 मिनट पहले जनरल केन को अपना अंतिम संदेश भेजा:
“ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury) मंजूर किया जाता है। कोई रोक नहीं। शुभकामनाएं।”
इस एक संदेश ने इजरायल की उस साजिश पर मुहर लगा दी, जिसने मध्य पूर्व को एक ऐसे युद्ध में धकेल दिया जिसके परिणाम दशकों तक महसूस किए जाएंगे। यह रिपोर्ट साबित करती है कि कैसे व्यक्तिगत अहंकार, खुफिया विफलता और इजरायली दबाव ने अमेरिकी विदेश नीति को ‘विनाश’ के रास्ते पर मोड़ दिया।
सारांश: क्या ट्रंप को वास्तव में फंसाया गया?
जोनाथन स्वान और मैगी हैबरमैन की यह रिपोर्ट निष्कर्ष निकालती है कि नेतन्याहू ने ट्रंप की ‘अजेय होने’ की भावना और उनकी व्यक्तिगत रंजिशों को बखूबी पढ़ा था। इजरायल ने ईरान के खिलाफ जो जाल बुना, उसमें ट्रंप केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि नेतन्याहू के दृष्टिकोण के ‘सबसे बड़े प्रशंसक’ के रूप में उभरे। ‘एपिक फ्यूरी’ केवल एक सैन्य ऑपरेशन नहीं, बल्कि एक साम्राज्यवादी राष्ट्रपति की उस महत्वाकांक्षा का नतीजा था, जिसने वैश्विक कूटनीति के हर नियम को ताक पर रख दिया।

