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ट्रंप की घुड़की और चौतरफा दबाव: क्या झुकने को मजबूर हुए बेंजामिन नेतन्याहू? लेबनान के साथ सीधी बातचीत को तैयार इजरायल

मुख्य बिंदु:

  • नेतन्याहू का यू-टर्न: लेबनान से सीधी बातचीत के लिए कैबिनेट को दिए निर्देश।
  • ट्रंप का प्रभाव: अमेरिकी राष्ट्रपति की चेतावनी के बाद बदली इजरायल की रणनीति।
  • मृत्यु का आंकड़ा: 24 घंटों में 300 से अधिक लेबनानी नागरिकों की जान गई।
  • वाशिंगटन समिट: अगले हफ्ते से शुरू होगी एम्बेसडर स्तर की वार्ता।
  • ईरान की नाकाबंदी: होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही अभी भी ठप।

पश्चिम एशिया के रणक्षेत्र से एक ऐसी कूटनीतिक हलचल सामने आ रही है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। लेबनान में 300 से अधिक नागरिकों की मौत और भीषण बमबारी के बाद पैदा हुए वैश्विक आक्रोश के बीच इजरायल के रुख में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जो अब तक लेबनान के साथ किसी भी समझौते को सिरे से खारिज कर रहे थे, अब बेरूत के साथ सीधी मेज पर बैठने को तैयार हो गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस हृदय परिवर्तन के पीछे न केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव है, बल्कि नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वह ‘सख्त चेतावनी’ भी है, जिसने इजरायली नेतृत्व को अपनी युद्ध नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

ट्रंप का ‘डेडलाइन’ कूटनीति और नेतन्याहू का यू-टर्न

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को अमेरिका और ईरान के बीच जिस ऐतिहासिक युद्ध विराम की घोषणा की थी, वह अब खतरे में नजर आ रही है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि ईरान और उसके सहयोगियों के साथ संघर्ष नहीं रुका, तो परिणाम विनाशकारी होंगे। जानकारों का मानना है कि ट्रंप की ‘घुड़की’ के बाद नेतन्याहू ने अपनी कैबिनेट को निर्देश दिया है कि वे लेबनान के साथ सीधी बातचीत का रास्ता खोलें।

गुरुवार, 9 अप्रैल को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से जारी बयान में कहा गया कि इजरायल अब लेबनान के साथ “जितनी जल्दी हो सके” बातचीत शुरू करना चाहता है। नेतन्याहू के इस कदम को रणनीतिक विशेषज्ञ उनके घरेलू भ्रष्टाचार के मुकदमों और वैश्विक अलगाव से बचने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।


अगले हफ्ते वाशिंगटन में सजेगी कूटनीति की मेज

प्रसिद्ध पत्रकार बराक रविद की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत का पहला दौर अगले सप्ताह वाशिंगटन में अमेरिकी विदेश विभाग की मेजबानी में शुरू हो सकता है।

  • इजरायल का प्रतिनिधित्व: राजदूत येचिएल लीटर करेंगे।
  • लेबनान का प्रतिनिधित्व: राजदूत नाडा हमादेह-मोआवाद करेंगी।
  • अमेरिकी मध्यस्थ: लेबनान में अमेरिकी राजदूत मिशेल इस्सा इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेंगे।

इजरायल का मुख्य एजेंडा हिज्बुल्लाह का पूर्ण निशस्त्रीकरण और सीमाओं पर स्थायी शांति स्थापित करना है। दूसरी ओर, लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने कूटनीतिक ट्रैक पर काम करने की पुष्टि करते हुए इसे “सकारात्मक” दिशा में एक कदम बताया है।


ईरान का तंज: “जेल जाने से बचने की जुगत”

इस कूटनीतिक विकास पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए नेतन्याहू पर सीधा हमला बोला। उन्होंने लिखा कि लेबनान और पूरे क्षेत्र में युद्ध विराम का मतलब नेतन्याहू के लिए जेल की राह आसान होना है। अराघची का तर्क है कि जैसे ही युद्ध थमेगा, नेतन्याहू के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों का ट्रायल फिर से शुरू हो जाएगा, जिससे बचने के लिए वे अब तक युद्ध को खींच रहे थे।


हिज्बुल्लाह का कड़ा रुख और जमीनी हकीकत

भले ही कूटनीतिक गलियारों में बातचीत की सुगबुगाहट है, लेकिन जमीनी हालात अब भी तनावपूर्ण हैं। हिज्बुल्लाह के सांसद अली फय्याद ने स्पष्ट किया है कि उनका समूह इजरायल के साथ किसी भी ‘सीधी बातचीत’ के पक्ष में नहीं है। उन्होंने शर्त रखी है कि किसी भी चर्चा से पहले इजरायल को लेबनान पर बमबारी पूरी तरह बंद करनी होगी।

इजरायली सेना के प्रमुख इयाल जमीर ने दक्षिणी लेबनान में सैनिकों को संबोधित करते हुए दावा किया कि हिज्बुल्लाह को “भारी झटका” लगा है। लेकिन हिज्बुल्लाह ने भी गुरुवार को 20 से अधिक सैन्य ऑपरेशनों को अंजाम देकर यह जता दिया कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता अभी खत्म नहीं हुई है।


होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक ऊर्जा संकट का केंद्र

युद्ध विराम की घोषणा के बावजूद वैश्विक चिंता का एक बड़ा कारण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) पर ईरान की नाकाबंदी है।

आंकड़े बताते हैं कि युद्ध से पहले यहां रोजाना 140 जहाज गुजरते थे, लेकिन युद्ध विराम के पहले 24 घंटों में केवल 6 जहाज ही वहां से गुजर सके। ईरान का कहना है कि जब तक लेबनान और यमन पर इजरायली हमले पूरी तरह नहीं रुकते, तब तक ऊर्जा आपूर्ति का यह मार्ग सामान्य नहीं होगा। पाकिस्तान भी इस समय अमेरिका-ईरान वार्ता के पहले दौर की मेजबानी के लिए तैयार है, और पूरी राजधानी इस्लामाबाद को सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया है।


क्षेत्रीय देशों की मांग: लेबनान को भी मिले सुरक्षा कवच

तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान समेत ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने पुरजोर मांग की है कि अमेरिका-ईरान युद्ध विराम का दायरा बढ़ाकर लेबनान तक किया जाए। ईरान के पार्लियामेंट स्पीकर मोहम्मद बाकर कलिबाफ ने भी स्पष्ट किया है कि ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ (लेबनान, यमन और सीरिया) किसी भी समझौते का अभिन्न हिस्सा हैं।

निष्कर्ष: शांति की उम्मीद या सिर्फ एक कूटनीतिक पैंतरा?

एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि पश्चिम एशिया इस समय एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ ट्रंप की आक्रामक कूटनीति है, दूसरी तरफ नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य और तीसरी तरफ ईरान की क्षेत्रीय साख। यदि वाशिंगटन में होने वाली अगले हफ्ते की बातचीत सफल होती है, तो यह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा शांति समझौता हो सकता है। लेकिन यदि इजरायल ने लेबनान पर हमले जारी रखे, तो यह ‘सीजफायर’ सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।

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