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ऐतिहासिक इस्लामाबाद शिखर सम्मेलन: अमेरिका और ईरान के बीच महायुद्ध खत्म करने की निर्णायक वार्ता शुरू

इस्लामाबाद

मध्य पूर्व में पिछले छह सप्ताह से जारी भीषण युद्ध को समाप्त करने की दिशा में शनिवार को एक ऐतिहासिक मोड़ आया। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय शांति वार्ता आधिकारिक तौर पर शुरू हो गई है। यह वार्ता न केवल क्षेत्र में शांति की उम्मीद जगा रही है, बल्कि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच होने वाली यह अब तक की सबसे उच्च स्तरीय सीधी बातचीत है।

इस्लामाबाद बना दुनिया का कूटनीतिक केंद्र

शनिवार सुबह इस्लामाबाद के हवाई अड्डे पर अमेरिकी वायुसेना के दो विमान उतरे, जिसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में एक शक्तिशाली प्रतिनिधिमंडल शामिल था। इस दल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर जैसे प्रभावशाली चेहरे भी मौजूद हैं।

दूसरी ओर, ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर कलीबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची कर रहे हैं, जो शुक्रवार को ही इस्लामाबाद पहुंच गए थे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस बैठक की मेजबानी करते हुए इसे क्षेत्र में टिकाऊ शांति की दिशा में एक “महत्वपूर्ण मील का पत्थर” करार दिया है।

वार्ता की शुरुआत और ईरान की कड़ी शर्तें

ईरानी समाचार एजेंसियों ‘फार्स’ और ‘तस्नीम’ ने पुष्टि की है कि प्रारंभिक बातचीत में प्रगति और दक्षिणी बेरूत (लेबनान) में इजरायली हमलों में कमी आने के बाद औपचारिक वार्ता शुरू करने का निर्णय लिया गया। हालांकि, ईरान ने मेज पर बैठने से पहले अपनी शर्तें बेहद सख्त रखी हैं।

ईरानी संसद अध्यक्ष कलीबाफ ने स्पष्ट किया कि तेहरान को वाशिंगटन पर भरोसा नहीं है। उन्होंने सोशल मीडिया और राज्य मीडिया के माध्यम से कहा:

“हमारे पास नेक इरादे हैं लेकिन हमें भरोसा नहीं है। अमेरिकियों के साथ बातचीत का हमारा पिछला अनुभव हमेशा टूटे हुए वादों और विफलता से भरा रहा है।”

ईरान की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

  1. लेबनान में तत्काल युद्धविराम: ईरान का कहना है कि जब तक लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायली हमले नहीं रुकते, वार्ता आगे नहीं बढ़ सकती।
  2. प्रतिबंधों से मुक्ति: ईरान की चरमराई अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए वह वर्षों से लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की मांग कर रहा है।
  3. संपत्ति की बहाली: ईरान चाहता है कि अमेरिका उसकी ब्लॉक की गई संपत्तियों को तुरंत मुक्त करे।

ट्रंप का आक्रामक रुख: “ईरान के पास कोई कार्ड नहीं”

शांति वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सोशल मीडिया पर एक विवादित और बेहद सख्त बयान सामने आया है। ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उनके पास बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

ट्रंप ने पोस्ट किया:

“ईरानियों को शायद यह समझ नहीं आ रहा है कि उनके पास अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) के जरिए दुनिया को कुछ समय के लिए डराने के अलावा कोई कार्ड नहीं बचा है। वे आज केवल इसलिए जीवित हैं क्योंकि उन्हें समझौता करना है!”

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी इस्लामाबाद पहुंचने पर कहा कि हालांकि वह एक सकारात्मक परिणाम की उम्मीद करते हैं, लेकिन अगर ईरान ने चालाकी दिखाने की कोशिश की, तो अमेरिकी टीम उतनी उदार नहीं होगी।

होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक ऊर्जा संकट

इस युद्ध का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी कर रखी है, जिससे दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति में अब तक का सबसे बड़ा व्यवधान पैदा हुआ है।

  • ईरान की मांग: तेहरान इस जलमार्ग पर अपना पूर्ण अधिकार चाहता है और वहां से गुजरने वाले जहाजों से ट्रांजिट शुल्क वसूलने की योजना बना रहा है।
  • आर्थिक प्रभाव: इस नाकेबंदी के कारण वैश्विक मुद्रास्फीति बढ़ गई है और कई देशों की अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ गई है। भले ही वार्ता सफल हो जाए, लेकिन ऊर्जा आपूर्ति को सामान्य होने में महीनों लग सकते हैं।

लेबनान में जारी हिंसा और ‘सीजफायर’ का भ्रम

एक तरफ इस्लामाबाद में शांति की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ लेबनान के मोर्चे पर रक्तपात थमने का नाम नहीं ले रहा है। इजरायल और अमेरिका का तर्क है कि लेबनान अभियान इस शांति वार्ता का हिस्सा नहीं है, जबकि ईरान इसे अनिवार्य शर्त मान रहा है।

शुक्रवार को दक्षिणी लेबनान के नबातियेह शहर में एक इजरायली हमले में राज्य सुरक्षा बल के 13 सदस्य मारे गए। जवाब में हिजबुल्लाह ने उत्तरी इजरायली शहरों पर रॉकेटों की बौछार कर दी। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित दो सप्ताह का युद्धविराम केवल ईरान पर हवाई हमलों तक सीमित दिख रहा है, जबकि लेबनान में इजरायली कार्रवाई जारी है।

ईरान का नया नेतृत्व और ‘मुआवजे’ की मांग

ईरान के नए सर्वोच्च नेता आयतल्लाह मुजतबा खामेनेई ने, जिन्होंने अपने पिता (जो युद्ध के पहले दिन मारे गए थे) की जगह ली है, एक कड़ा संदेश जारी किया है। उन्होंने अभी तक सार्वजनिक रूप से दर्शन नहीं दिए हैं, लेकिन उनके संदेश में कहा गया है कि ईरान युद्ध से हुए नुकसान के लिए ‘मुआवजे’ की मांग करेगा और “अपराधी हमलावरों” को दंडित किए बिना नहीं छोड़ेगा।

पाकिस्तान की भूमिका: एक मध्यस्थ के रूप में उभरता इस्लामाबाद

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने दोहराया कि इस्लामाबाद संघर्ष के “स्थायी और टिकाऊ समाधान” के लिए एक सूत्रधार के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहेगा। वार्ता के मद्देनजर इस्लामाबाद को पूरी तरह छावनी में बदल दिया गया है। हजारों अर्धसैनिक बलों और सेना के जवानों को रेड जोन और सेरेना होटल के आसपास तैनात किया गया है, जहाँ यह ‘मेक-ऑर-ब्रेक’ (बनने या बिगड़ने वाली) बातचीत हो रही है।

क्या हासिल हुआ और क्या बाकी है?

डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही सैन्य रूप से जीत की घोषणा कर दी हो और दावा किया हो कि ईरान की सैन्य क्षमता कम हो गई है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है:

  • मिसाइल शक्ति: ईरान के पास अभी भी पड़ोसी देशों को निशाना बनाने में सक्षम मिसाइलों और ड्रोनों का जखीरा है।
  • परमाणु कार्यक्रम: तेहरान के पास 400 किलोग्राम से अधिक समृद्ध यूरेनियम का भंडार है, जो बम बनाने के स्तर के करीब है।
  • राजनीतिक स्थिरता: भीषण हमलों और आंतरिक विद्रोह के बावजूद ईरान के क्लर्किकल शासक सत्ता पर काबिज हैं और किसी संगठित विरोध के संकेत नहीं मिल रहे हैं।

निष्कर्ष: भविष्य की राह

अगले कुछ दिन न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी दुनिया के लिए निर्णायक होने वाले हैं। यदि इस्लामाबाद में जेडी वेंस और कलीबाफ के बीच का यह संवाद किसी ठोस नतीजे पर पहुंचता है, तो यह वैश्विक तेल बाजार और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक नई सुबह होगी। लेकिन, यदि ट्रंप का सख्त तेवर और ईरान की अड़ियल शर्तें टकराती हैं, तो यह युद्ध और भी भयावह रूप ले सकता है।

पूरी दुनिया की निगाहें अब इस्लामाबाद के रेड जोन पर टिकी हैं, जहां बंद कमरों में दुनिया की दो सबसे बड़ी शत्रु शक्तियां इतिहास लिखने की कोशिश कर रही हैं।


संपादकीय टिप्पणी: यह वार्ता 2015 के परमाणु समझौते (जिसे ट्रंप ने 2018 में रद्द कर दिया था) के बाद दोनों देशों के बीच पहली आधिकारिक आमने-सामने की बातचीत है। इसमें शामिल पक्षों की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान ने इसके लिए ‘अनपेक्षित’ सुरक्षा घेरा तैयार किया है।

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