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नरेटिव के जाल से बाहर निकलतीं मुस्लिम महिलाएं: अधिकारों और हकीकतों पर दिल्ली में महामंथन

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित इंडिया हैबीटैट सेंटर में आयोजित एक विशेष संगोष्ठी ने मुस्लिम महिलाओं को लेकर देश में चल रहे पारंपरिक नरेटिव को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। ‘भारत में मुस्लिम महिलाएं: अधिकार, वास्तविकताएं और चुनौतियां’ विषय पर जुटे देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं और पत्रकारों ने दो-टूक शब्दों में कहा कि मुस्लिम महिलाओं की पहचान किसी खास एजेंडे की मोहताज नहीं है।

फिल्मी नरेटिव बनाम हकीकत

वरिष्ठ पत्रकार सबा नकवी ने कार्यक्रम में बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए हालिया वर्षों में बनी फिल्मों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरल फाइल्स’ जैसी फिल्में केवल एक विशिष्ट नरेटिव गढ़ने का जरिया हैं, जिनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुस्लिम महिलाएं अपने फैसले खुद लेने में सक्षम हैं और उन्हें किसी भी पुरुष के मार्गदर्शन या थोपे गए फैसलों की जरूरत नहीं है।

1400 साल पहले मिले अधिकार और आज की कानूनी जंग

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता फिरदौस कुतुब वानी ने कानूनी और धार्मिक अधिकारों के बीच के सेतु को परिभाषित किया। उन्होंने जोर देकर कहा:

“इस्लाम ने महिलाओं को वे अधिकार चौदह सौ साल पहले ही दे दिए थे, जिनके लिए दुनिया आज संघर्ष कर रही है। चाहे वह मायके की संपत्ति हो या ससुराल की, इस्लाम में महिलाओं का हिस्सा सुनिश्चित है।”

वानी ने इस बात पर दुख जताया कि सही जानकारी के अभाव में महिलाएं अपने अधिकारों से वंचित हैं। उन्होंने एक सशक्त उदाहरण पेश करते हुए कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट जाने वाली पहली हिजाबधारी महिला वकील हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिजाब पहनना उनका निजी फैसला है और किसी को भी इस पर टोकने या सवाल उठाने का अधिकार नहीं है।

बुनियादी ढांचा और शिक्षा की चुनौती

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. सबिस्तां गफ्फार ने मुस्लिम महिलाओं के पिछड़ेपन के पीछे धार्मिक कारणों के बजाय ‘स्ट्रक्चरल’ यानी ढांचे की कमी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने हरियाणा के मेवात का उदाहरण देते हुए एक कड़वी सच्चाई बयां की:

  • पानी की किल्लत: मेवात जैसे इलाकों में मुस्लिम बच्चियां स्कूल इसलिए नहीं जा पातीं क्योंकि उन्हें घर के लिए पानी लाना पड़ता है।
  • प्रदूषित स्रोत: बच्चियां उन तालाबों से पानी ढोने को मजबूर हैं जहाँ पशुओं को नहलाया जाता है और कपड़े धोए जाते हैं।
  • अवसरों का अभाव: जब तक बुनियादी ढांचा नहीं सुधरेगा, शिक्षा का सपना अधूरा रहेगा।

नीतिगत सुधार और भविष्य की चुनौतियां

प्रोफेसर सबा हुसैन ने चर्चा को नीतिगत स्तर पर ले जाते हुए कहा कि मुस्लिम महिलाओं को अक्सर केवल ‘इस्लामी नजरिए’ से देखा जाता है, जबकि उन्हें एक नागरिक के तौर पर समान अवसरों की आवश्यकता है। उन्होंने सरकार और समाज से एक व्यापक नीति बनाने की मांग की ताकि महिलाओं को मुख्यधारा में अधिक मौके मिल सकें।

कार्यक्रम के अंत में भविष्य की चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। एक वक्ता ने आगाह किया कि आने वाले समय में इस्लाम में प्रचलित ‘चार शादियों’ के प्रावधान को लेकर बड़े विवाद खड़े किए जा सकते हैं, जिसके लिए समुदाय को बौद्धिक रूप से तैयार रहना होगा।


निष्कर्ष: यह कार्यक्रम महज एक चर्चा नहीं, बल्कि उन रूढ़ियों के खिलाफ एक शंखनाद था जो मुस्लिम महिलाओं को केवल ‘पीड़ित’ के रूप में पेश करती हैं। वक्ताओं ने साफ कर दिया कि शिक्षा, सही जानकारी और आत्मनिर्णय का अधिकार ही वह रास्ता है जो उन्हें सशक्त बनाएगा।

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