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झोपड़ी में सजी ट्रॉफियां और गुमनाम खिलाड़ी: यूसुफ पठान के वीडियो ने खोला राज

राजनीति के गलियारों में अक्सर चमक-धमक और बड़े वादे सुनाई देते हैं। लेकिन कभी-कभी एक छोटा सा वीडियो वह कड़वी सच्चाई सामने ले आता है जिसे व्यवस्था सालों से दबाए बैठी होती है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद और पूर्व दिग्गज क्रिकेटर यूसुफ पठान के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने पश्चिम बंगाल के खेल जगत की एक दुखद तस्वीर दुनिया को दिखाई है। यह कहानी एक ऐसे फुटबॉल खिलाड़ी की है जिसका घर भले ही घास-फूस का है, लेकिन उसकी अलमारियां बेशकीमती जीत के पदकों और शील्ड से लदी हुई हैं।

शक्तिपुर के रास्ते में मिली एक अनमोल प्रतिभा

यूसुफ पठान बेलडांगा के शक्तिपुर में एक चुनावी रैली के लिए जा रहे थे। रास्ते में रामनगर घाट पर स्थानीय फुटबॉल कोच समीर सरदार ने उनसे रुकने का अनुरोध किया। यूसुफ पठान उनकी सादगी देख मना नहीं कर सके और उनके घर चले गए। वहां उन्होंने समीर सरदार और उनके परिवार के साथ जमीन पर बैठकर चावल और ‘सुक्तो’ (बंगाल का पारंपरिक व्यंजन) का आनंद लिया।

यूसुफ पठान ने इस मुलाकात का वीडियो साझा किया है। वीडियो देखने वाले हैरान हैं। एक टूटी-फूटी झोपड़ी के भीतर समीर सरदार ने अपनी पूरी जिंदगी की मेहनत सहेज कर रखी है। वहां रखे टेबल और पुरानी अलमारियां ट्रॉफी, मेडल और शील्ड से भरी पड़ी हैं। यह मंजर चीख-चीख कर कह रहा है कि समीर अपने जमाने के मंझे हुए खिलाड़ी रहे हैं।

अभावों में दम तोड़ती प्रतिभाएं

इस वीडियो ने देश के सामने दो बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला यह कि भारत के गांव-गांव और गलियों में हुनर की कोई कमी नहीं है। दूसरा यह कि जब ऐसी प्रतिभाओं को सही मंच या सरकारी मदद नहीं मिलती, तो वे गुमनामी के अंधेरे में खो जाती हैं। समीर सरदार की झोपड़ी में रखी उन चमचमाती ट्राफियों का मोल तब तक क्या है, जब तक वह खिलाड़ी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा हो?

समीर सरदार ने फुटबॉल को अपना जीवन दिया। वह आज भी एक लोकल कोच के रूप में युवाओं को फुटबॉल सिखाते हैं। लेकिन उनकी खुद की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय है। दुखद बात यह है कि बंगाल जैसे फुटबॉल प्रेमी राज्य में एक खिलाड़ी का यह हाल है।

यूसुफ पठान की चुप्पी पर उठे सवाल

एक खिलाड़ी जब दूसरे खिलाड़ी के संघर्ष को देखता है, तो उम्मीद की जाती है कि वह उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाएगा। यूसुफ पठान खुद एक बड़े क्रिकेटर रहे हैं और अब सत्ताधारी दल के सांसद भी हैं। उन्होंने समीर सरदार के घर खाना तो खाया और सोशल मीडिया पर उनकी तारीफ भी की। लेकिन स्थानीय लोगों और खेल प्रेमियों में इस बात को लेकर थोड़ी निराशा है कि सांसद ने समीर सरदार के भविष्य या उनके कोचिंग संस्थान की मदद के लिए कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया।

यूसुफ पठान ने अपने पोस्ट में लिखा:

“शक्तिपुर में रैली के रास्ते में मैंने कोच समीर सरदार के अनुरोध पर रामनगर घाट पर विश्राम किया। मुझे उनके घर जाने और उनके परिवार के साथ स्वादिष्ट दोपहर का भोजन करने का अवसर मिला। मैंने वहां पड़ोसियों की समस्याओं को भी ध्यान से सुना।”

लेकिन सवाल वही है कि क्या सिर्फ सुनने से हालात बदलेंगे? क्या उन ट्राफियों को धूल झाड़ने के लिए ही छोड़ दिया जाएगा?

कौन हैं समीर सरदार?

अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) के रिकॉर्ड के अनुसार समीर सरदार बंगाल फुटबॉल अकादमी जैसे क्लबों से जुड़े रहे हैं। वह एक मंझे हुए एमेच्योर खिलाड़ी रहे हैं। फुटबॉल के प्रति उनका जुनून आज भी कम नहीं हुआ है। वह आज भी बंगाल के ग्रामीण इलाकों में फुटबॉल की अलख जगा रहे हैं। लेकिन उनकी झोपड़ी यह गवाही दे रही है कि उन्हें वह मुकाम नहीं मिला जिसके वह हकदार थे।

सिस्टम की विफलता का प्रतीक

समीर सरदार की कहानी किसी एक इंसान की कहानी नहीं है। यह भारत के उन हजारों खिलाड़ियों की कहानी है जो जिला और राज्य स्तर पर मेडल जीतते हैं, लेकिन करियर के अंत में उनके पास केवल यादें और लोहे के कुछ टुकड़े (शील्ड) रह जाते हैं।

यूसुफ पठान का यह दौरा भले ही राजनीतिक प्रचार का हिस्सा रहा हो, लेकिन इसने एक बड़ी चर्चा को जन्म दे दिया है। क्या हमारी सरकारें इन गुमनाम नायकों की सुध लेंगी? क्या इन खिलाड़ियों को सम्मानजनक जीवन जीने का हक मिलेगा? या फिर अगली बार भी कोई नेता आएगा, खाना खाएगा, फोटो खिंचवाएगा और चला जाएगा? समीर सरदार जैसे खिलाड़ियों को सहानुभूति नहीं, सहयोग और सम्मान की जरूरत है।

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