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दीवारों के पीछे एक और नरसंहार: फिलीस्तीनी कैदियों की दर्दनाक दास्तां

दुनिया जब युद्ध के मैदानों और बम धमाकों की खबरों में उलझी है, तब जेल की ऊंची और खामोश दीवारों के पीछे एक और खौफनाक मंजर पनप रहा है। ‘फिलीस्तीनी कैदी दिवस’ की पूर्व संध्या पर भारत में स्थित फिलीस्तीनी दूतावास ने एक बेहद चिंताजनक बयान जारी किया है। दूतावास ने जेलों के भीतर फिलीस्तीनी कैदियों की स्थिति को ‘दीवारों के पीछे छिपा एक और नरसंहार’ करार दिया है। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि उन हजारों जिंदगियों की चीख है जो बिना किसी जुर्म या सुनवाई के सलाखों के पीछे दम तोड़ रही हैं।

साढ़े सात लाख गिरफ्तारियां और आजादी की गूंज

फिलीस्तीनी दूतावास के अनुसार 1967 से लेकर अब तक लगभग साढ़े सात लाख फिलीस्तीनियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। यह आंकड़ा डराने वाला है। बयान में कहा गया है कि गिरफ्तारी और कैद का यह सिलसिला दरअसल आजादी की मांग करने वाली आवाजों को कुचलने का एक पुराना हथियार है। जेल की इन सलाखों का इस्तेमाल फिलीस्तीन के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को दबाने के लिए किया जा रहा है। मानवाधिकार संगठन लंबे समय से इसकी आलोचना कर रहे हैं लेकिन हालात सुधरने के बजाय और भी बदतर होते जा रहे हैं।

7 अक्टूबर के बाद बदला खौफनाक मंजर

7 अक्टूबर 2023 की घटना के बाद से गिरफ्तारी के आंकड़ों में भयानक उछाल आया है। दूतावास की रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ महीनों में वेस्ट बैंक और यरूशलेम से लगभग 22,000 फिलीस्तीनियों को हिरासत में लिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें केवल पुरुष ही नहीं बल्कि 1,760 मासूम बच्चे और 731 महिलाएं भी शामिल हैं। पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया है। करीब 240 पत्रकारों को सलाखों के पीछे भेज दिया गया है ताकि जमीन की हकीकत दुनिया तक न पहुंच सके।

प्रशासनिक हिरासत: बिना वकील, बिना दलील की कैद

दूतावास ने ‘प्रशासनिक हिरासत’ (Administrative Detention) के कानून को सबसे क्रूर बताया है। इसकी तुलना औपनिवेशिक काल के ‘रॉलेट एक्ट’ से की गई है। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को बिना किसी आरोप या मुकदमे के अनिश्चित काल तक जेल में रखा जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान हुई कुल गिरफ्तारियों में से 91 प्रतिशत मामले इसी कानून के तहत दर्ज किए गए हैं। वर्तमान में करीब 3,532 लोग बिना किसी चार्ज के जेलों में सड़ रहे हैं। उन्हें यह भी नहीं पता कि उन्हें कब छोड़ा जाएगा या उनका अपराध क्या है।

मेडिकल लापरवाही और मौत का साया

जेलों के भीतर की स्थिति अमानवीयता की हदें पार कर रही है। 1967 से अब तक हिरासत में 326 कैदियों की मौत हो चुकी है। दुखद पहलू यह है कि इजरायल ने अब भी 97 कैदियों के शवों को उनके परिवारों को नहीं सौंपा है। अक्टूबर 2023 के बाद से जेलों में होने वाली मौतों का सिलसिला तेज हुआ है। अकेले इस दौरान 86 कैदियों ने दम तोड़ दिया। दूतावास का आरोप है कि कैदियों को जानबूझकर चिकित्सा सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। उनके साथ शारीरिक शोषण और कई मामलों में यौन हिंसा की खबरें भी सामने आई हैं।

यूरो-मेड मॉनिटर की चेतावनी: मानवता के खिलाफ अपराध

अप्रैल 2026 में यूरो-मेड ह्यूमन राइट्स मॉनिटर ने ‘दीवारों के पीछे एक और नरसंहार’ शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इजरायली हिरासत केंद्र अब व्यवस्थित दुर्व्यवहार के अड्डे बन चुके हैं। इन्हें संस्थागत समर्थन प्राप्त है और यहां काम करने वाले लोगों को पूरी छूट मिली हुई है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि ये कृत्य ‘युद्ध अपराध’ और ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ की श्रेणी में आते हैं। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही तय होना बहुत जरूरी है।

मौत की सजा का नया कानून और नैतिक सवाल

इजरायल में फिलीस्तीनी कैदियों के लिए ‘मौत की सजा’ से जुड़े नए विधायी घटनाक्रमों ने भी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। दूतावास का कहना है कि ऐसे कानून अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गंभीर कानूनी और नैतिक सवाल खड़े करते हैं। यह कदम संघर्ष को और ज्यादा भड़काने वाला है। फिलीस्तीनी दूतावास ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे अपनी चुप्पी तोड़ें। अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन सुनिश्चित किया जाए और कैदियों के अधिकारों की रक्षा की जाए।

यह संघर्ष केवल जमीन का नहीं है। यह उन हजारों परिवारों का है जिनके बच्चे जेलों में गायब हो चुके हैं। यह उन माताओं का है जो अपने बच्चों के शवों के इंतजार में बूढ़ी हो रही हैं। फिलीस्तीनी दूतावास का यह बयान दुनिया के लिए एक जागने का इशारा है। क्या न्याय की तराजू जेल की इन दीवारों के पीछे भी पहुंचेगी? यह सवाल आज पूरी दुनिया के सामने खड़ा है। फिलीस्तीनी कैदियों का मुद्दा अब केवल जेल का मामला नहीं बल्कि न्याय और गरिमा की वैश्विक लड़ाई बन चुका है।


मुख्य तथ्य:

  • 1967 से अब तक 7.5 लाख फिलीस्तीनी गिरफ्तार।
  • 7 अक्टूबर 2023 के बाद 22,000 नई गिरफ्तारियां।
  • हिरासत में अब तक 326 कैदियों की मौत।
  • 3,500 से ज्यादा लोग बिना किसी मुकदमे के जेल में।
  • यूरो-मेड मॉनिटर ने इसे मानवता के खिलाफ अपराध बताया।

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