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बांग्लादेश : 20 महीनों में दरगाहों पर 67 हमले,साजिश या सिस्टम की नाकामी

सूफी विरासत पर बढ़ते हमलों ने खड़े किए गंभीर सवाल, क्या अस्थिरता की भेंट चढ़ जाएगा देश?

मणि आचार्य | ढाका

बांग्लादेश इस वक्त एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसकी सदियों पुरानी सूफी पहचान और धार्मिक सद्भाव दांव पर है। आखिर कौन है जो बांग्लादेश की मिट्टी में धार्मिक उन्माद का जहर घोल रहा है? किसकी साजिश है कि यहां के प्राचीन और प्रतिष्ठित धर्मस्थलों को निशाना बनाया जा रहा है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमलों के निशाने पर केवल दरगाहें ही क्यों हैं? क्या यह सूफी विचारधारा और इस्लाम के अन्य कट्टरपंथी फिरकों के बीच एक बड़ी जंग छेड़ने की कोशिश है?

इन सवालों के जवाब फिलहाल बांग्लादेश की सरकार और प्रशासन के पास नहीं हैं। लेकिन आंकड़े जो कहानी बयां कर रहे हैं, वह बेहद डरावनी है। पिछले 20 महीनों के भीतर बांग्लादेश में 67 दरगाहों पर हमले हुए हैं। इन हमलों ने न केवल मुल्क की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि यह भी जाहिर कर दिया है कि नई सरकार भी इन कट्टरपंथी ताकतों पर नकेल कसने में बेबस नजर आ रही है।

कुश्तिया हत्याकांड: इंसाफ की उम्मीद पर गहराता साया

हाल ही में कुश्तिया में हुई एक वारदात ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 11 अप्रैल को फिलिपनगर यूनियन के दारोगर मोड़ इलाके में स्थित दरबार शरीफ पर उन्मादी भीड़ ने हमला किया। आरोप लगाया गया कि वहां धर्म का अपमान हुआ है। इस भीड़ ने न केवल तोड़फोड़ की, बल्कि दरगाह परिसर को आग के हवाले कर दिया। सबसे दुखद पहलू यह रहा कि दरबार प्रमुख अब्दुर रहमान की बेरहमी से हत्या कर दी गई।

इस मामले में कुश्तिया जिला छात्र शिविर के पूर्व अध्यक्ष खजा अहमद को मुख्य आरोपी बनाया गया है। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर 180 अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्य आरोपी सरेआम घूम रहा है और पुलिस उसे छूने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। यह स्थिति अपराधियों के बुलंद हौसले और पुलिस की लाचारी का जीता जागता सबूत है।

दरगाहों को क्यों बनाया जा रहा है निशाना?

बांग्लादेश के प्रतिष्ठित मीडिया आउटलेट ‘ढाका पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, हमलों का यह सिलसिला बहुत लंबा है। सिलहट में हजरत शाह परान (आरए) की दरगाह पर हमला हुआ और वहां गायन-संगीत पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई। नारायणगंज में दीवानबागी और लंगता बाबा की दरगाहों को जला दिया गया। गाजीपुर में शाह सूफी फसीह पगला की दरगाह पर दंगे हुए। सिराजगंज और मानिकगंज में भी इसी तरह की तोड़फोड़ देखी गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि दरगाहें बांग्लादेश की उस मिली-जुली संस्कृति का प्रतीक हैं, जो कट्टरपंथियों की आंखों में खटकती है। सूफीवाद शांति और प्रेम का संदेश देता है, जबकि हमलावर गुट नफरत और विभाजन की राजनीति करना चाहते हैं।


आंकड़ों की जुबानी: कानून व्यवस्था की विफलता

पुलिस मुख्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, 5 अगस्त 2024 से 16 अप्रैल 2026 तक के 20 महीनों में धार्मिक स्थलों पर हमलों की बाढ़ सी आ गई है। इस अवधि में कुल 67 हमले दर्ज किए गए। हालांकि पुलिस ने 67 लोगों को गिरफ्तार करने का दावा किया है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया की रफ्तार बेहद सुस्त है।

  • मामलों की लीपापोती: अधिकतर मामलों में नियमित केस दर्ज करने के बजाय उन्हें केवल जनरल डायरी (जीडी) में दर्ज कर छोड़ दिया गया। देशभर में 40 जीडी और केवल 26 नियमित मामले दर्ज हुए।
  • जांच में देरी: दर्ज किए गए 26 मामलों में से केवल 9 में चार्जशीट दाखिल हुई है। लगभग 42 प्रतिशत मामले 20 महीने बीतने के बाद भी ‘जांच के अधीन’ हैं।
  • क्षेत्रीय स्थिति: ढाका और चटगांव प्रांत इन हमलों का सबसे बड़ा केंद्र रहे हैं। ढाका में 25 और चटगांव में 15 घटनाएं हुईं। राजशाही और बारिसल जैसे इलाकों में भी घटनाएं हुईं, लेकिन वहां गिरफ्तारियों का आंकड़ा शून्य रहा।

राहत की बात केवल इतनी है कि बड़े महानगरों में जिला पुलिस की तुलना में घटनाएं कम हुई हैं। लेकिन ग्रामीण और क्षेत्रीय इलाकों में स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर दिख रही है।


राजनीतिक साजिश और प्रशासनिक मौन

महानगरों की पुलिस का कहना है कि वे मामलों को जल्द निपटा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने स्वीकार किया कि कई बार पीड़ित पक्ष डरा हुआ होता है और वह मामले को ज्यादा आगे नहीं बढ़ाना चाहता। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य की जिम्मेदारी केवल पीड़ित के भरोसे ही टिकी है?

सुरक्षा विश्लेषक और प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद उमर फारूक के अनुसार, इन हमलों के पीछे गहरा राजनीतिक मकसद हो सकता है। कुछ समूह धार्मिक व्याख्याओं को हथियार बनाकर अपनी हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। लंबे समय से ऐसी घटनाएं होने के बावजूद अपराधियों को सजा न मिलना ही हिंसा को बढ़ावा दे रहा है।

क्या है समाधान?

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने निष्पक्ष और त्वरित जांच सुनिश्चित नहीं की, तो यह धार्मिक उन्माद पूरे समाज को निगल जाएगा। यह केवल ईंट और पत्थर की इमारतों पर हमला नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश की सामाजिक स्थिरता पर सीधा प्रहार है।

सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई का अभाव और घटनाओं को अलग-थलग करके देखने की प्रवृत्ति ने स्थिति को और बिगाड़ा है। अगर वक्त रहते इन कट्टरपंथी तत्वों को नहीं रोका गया, तो बांग्लादेश उस अस्थिरता की आग में जल सकता है जिससे बाहर निकलना शायद नामुमकिन होगा। अब यह ढाका की सत्ता पर निर्भर करता है कि वह कानून का इकबाल बुलंद करती है या इन उपद्रवियों के सामने सरेंडर कर देती है।

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