सोशल मीडिया बना ‘अदालत’: लेंसकार्ट, टीसीएस और नमिता थापर पर कट्टरपंथियों का हमला
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नई दिल्ली। मुस्लिम नाउ ब्यूरो
भारत में क्या अब कानून का राज खत्म हो गया है? क्या अब देश की न्याय व्यवस्था सोशल मीडिया के ट्रोल्स और सड़कों पर हुड़दंग करने वाली भीड़ तय करेगी? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि पिछले कुछ दिनों में देश के तीन बड़े औद्योगिक घरानों के साथ जो हुआ, उसने सबको हैरान कर दिया है। लेंसकार्ट, टीसीएस और एमक्योर फार्मा की नमिता थापर। इन तीनों ही मामलों में एक समानता है। वह यह कि कानून से पहले सोशल मीडिया ने फैसला सुना दिया। पुलिस और प्रशासन मूक दर्शक बने रहे।
लेंसकार्ट: शोरूम में हंगामा और जबरन बिंदी
लेंसकार्ट का विवाद सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है। मामला कंपनी के ड्रेस कोड का था। दरअसल, हर कंपनी की अपनी एक पॉलिसी होती है। सहारा ग्रुप ने भी कभी अपने कर्मचारियों के लिए सफेद शर्ट और काली पैंट तय की थी। अगर आपको नौकरी करनी है, तो कंपनी के नियम मानने होते हैं। लेंसकार्ट में बुर्का पहनने पर पाबंदी थी। यह कंपनी का आंतरिक फैसला था।
लेकिन इस पर जो प्रतिक्रिया हुई, वह डराने वाली है। कट्टरपंथी भीड़ ने शोरूम में घुसकर उत्पात मचाया। एक महिला ने तो हद पार कर दी। उसने बिना अनुमति के शोरूम में घुसकर मुस्लिम कर्मचारियों के माथे पर जबरन बिंदी लगा दी। सवाल यह है कि कंपनी की नीति में कर्मचारियों का क्या कसूर? किसी की मर्जी के बिना उसके शरीर को छूना या माथे पर कुछ लगाना क्या अपराध नहीं है? पुलिस ने अब तक इस पर कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या अब कंपनियां अपनी मर्जी से ड्रेस कोड भी तय नहीं कर पाएंगी?
टीसीएस नासिक: बिना जांच के ‘धर्मांतरण’ का ठप्पा
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) जैसी प्रतिष्ठित कंपनी को भी नहीं बख्शा गया। नासिक के टीसीएस ऑफिस को लेकर सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया में एक कहानी चलाई गई। दावा किया गया कि वहां बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का खेल चल रहा है। एक मुस्लिम महिला कर्मचारी को इस पूरे मामले का ‘मास्टरमाइंड’ और एचआर हेड बताकर पेश किया गया।
सच्चाई इसके उलट निकली। टीसीएस प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि वह महिला कभी एचआर विभाग में थी ही नहीं। वह पिछले दो महीनों से अपनी गर्भावस्था की समस्याओं के कारण छुट्टी पर चल रही थी। लेकिन ट्रोल्स को इससे कोई मतलब नहीं था। उन्होंने बिना किसी पुलिस जांच के कंपनी और महिला कर्मचारी की छवि बिगाड़ दी। टाटा जैसे ग्रुप, जो अपनी नैतिकता के लिए जाने जाते हैं, उन्हें इस तरह के निराधार आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। क्या देश का कानून इन झूठी खबरें फैलाने वालों पर लगाम कसेगा?
नमिता थापर: स्वास्थ्य की बात कहना पड़ा भारी
‘शार्क टैंक इंडिया’ फेम नमिता थापर की कहानी और भी दुखद है। नमिता अक्सर योग और सूर्य नमस्कार के वीडियो साझा करती रहती हैं। हाल ही में ईद के मौके पर उन्होंने नमाज से होने वाले शारीरिक फायदों के बारे में एक पोस्ट डाल दी। बस इसी बात पर तथाकथित ‘धर्म के ठेकेदार’ उनके पीछे पड़ गए।
उन्हें सोशल मीडिया पर भद्दी गालियां दी गईं। उन्हें इतना परेशान किया गया कि अंत में उन्हें एक वीडियो बनाकर देश के समझदार लोगों से मदद की अपील करनी पड़ी। नमिता ने साफ कहा कि वह स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाती हैं, न कि किसी धर्म का प्रचार। लेकिन ट्रोल्स का एजेंडा अलग है। वे नमिता जैसी सफल महिला को निशाना बनाकर सिर्फ अपने व्यूज बढ़ाना चाहते हैं। विडंबना देखिए कि कानून के रखवालों ने इस गाली-गलौज और ट्रोलिंग पर खामोशी की चादर ओढ़ रखी है।
I left for bombay at 6.30 am like the hard working professional that I am & stopped the car at 7 am to make this reel as I’ve long realised that silence is not a virtue & one must speak up when they are disrespected. Yes if wrong things happen at any workplace that are against… pic.twitter.com/rvMSu0wXz0
— Namita (@namitathapar) April 20, 2026
अराजकता की ओर बढ़ता देश?
इन तीनों घटनाओं का असर सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। लेंसकार्ट के शेयरों में इस विवाद की वजह से गिरावट देखी गई। कंपनियां हजारों लोगों को रोजगार देती हैं। वे देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देती हैं। लेकिन अगर उन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी, तो निवेश कौन करेगा?
आज हालात यह हैं कि कोई भी मोबाइल उठाकर किसी भी बड़ी कंपनी या व्यक्ति को निशाना बना लेता है। खुद को ‘राष्ट्रवादी’ कहने वाले ये लोग असल में देश में अराजकता फैला रहे हैं। वे कानून हाथ में ले रहे हैं। अदालतों को इन मामलों में खुद संज्ञान लेना चाहिए। अगर आज इन ट्रोल्स को नहीं रोका गया, तो कल कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा।
क्या भारत अब संविधान से चलेगा या ट्विटर (X) के ट्रेंड्स से? यह सवाल आज हर उस नागरिक के मन में है जो शांति और तरक्की चाहता है। पुलिस की चुप्पी अपराधियों का हौसला बढ़ा रही है। अब वक्त आ गया है कि सोशल मीडिया की इस ‘कंगारू कोर्ट’ पर ताला लगाया जाए और कानून का इकबाल बुलंद किया जाए।

