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दिल्ली में जमाअत-ए-इस्लामी हिंद का शांति और सद्भाव सम्मेलन

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद पूर्वी दिल्ली के तत्वावधान में रविवार को गीता कॉलोनी स्थित ताज एन्क्लेव में त्रैमासिक जिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में त्रिलोकपुरी और लक्ष्मी नगर यूनिटों के कार्यकर्ताओं, सदस्यों और जिम्मेदार पदाधिकारियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य दीन की समझ, सामाजिक जिम्मेदारियों, संगठनात्मक मजबूती और वर्तमान हालात में समुदाय की भूमिका को स्पष्ट करना था। पूरे आयोजन में आध्यात्मिक मार्गदर्शन, वैचारिक संवाद और सामाजिक चेतना का संदेश प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया।

सम्मेलन को दो सत्रों में आयोजित किया गया। पहले सत्र का संचालन त्रिलोकपुरी के स्थानीय जिम्मेदार अतीक भाई ने किया, जबकि दूसरे सत्र के संयोजक लक्ष्मी नगर यूनिट के अमीर मकामी फalahुद्दीन फलाही रहे। कार्यक्रम की शुरुआत कुरआन के पाठ और दुआ से हुई, जिसके बाद विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

पहले सत्र में शकील शम्सी ने सूरह अल-बक़रा की आयत 177, जिसे आयत-ए-बिर्र कहा जाता है, की व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि इस आयत में स्पष्ट किया गया है कि नेकी केवल रस्मों, औपचारिक इबादतों या बाहरी प्रतीकों का नाम नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण जीवन व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि सच्ची नेकी का संबंध ईमान, अच्छे चरित्र, इंसाफ, जरूरतमंदों की मदद, वचनबद्धता और समाज में भलाई फैलाने से है।

उन्होंने कहा कि आज बड़ी संख्या में लोग धर्म को केवल कुछ पूजा-पद्धतियों तक सीमित समझ लेते हैं, जबकि धर्म का वास्तविक उद्देश्य इंसान के चरित्र, व्यवहार और सामाजिक जीवन को बेहतर बनाना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कुरआन इंसान को व्यक्तिगत सुधार के साथ-साथ सामूहिक जिम्मेदारी का भी संदेश देता है।

नमाज़ की अहमियत पर बात करते हुए शकील शम्सी ने एक प्रभावशाली उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जैसे कोई व्यक्ति कार खरीदकर उसमें ईंधन डाले बिना उसे नहीं चला सकता, उसी तरह नमाज़ इंसानी जीवन की आध्यात्मिक ऊर्जा है। लेकिन जैसे कार केवल पेट्रोल भरने के लिए नहीं खरीदी जाती, बल्कि मंज़िल तक पहुंचने के लिए खरीदी जाती है, वैसे ही नमाज़ केवल एक क्रिया नहीं बल्कि इंसान को सही जीवन-पथ पर चलाने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि नमाज़ इंसान को अनुशासन, विनम्रता और अल्लाह से जुड़ाव सिखाती है।

उन्होंने कुरआन की उस शिक्षा का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि लोग पूरे के पूरे इस्लाम में दाखिल हों। शकील शम्सी ने कहा कि इसका अर्थ यह है कि इंसान जीवन के हर क्षेत्र—नैतिकता, परिवार, समाज, अर्थव्यवस्था और न्याय—में ईश्वरीय मार्गदर्शन को अपनाए। उन्होंने कहा कि यदि धर्म को केवल निजी दायरे तक सीमित कर दिया जाए तो उसका सामाजिक प्रभाव कम हो जाता है।

इसके बाद जिला नाज़िम इंजीनियर अब्दुल मन्नान ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने सम्मेलन में शामिल सभी मेहमानों, कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन संगठन के लिए नई ऊर्जा लेकर आते हैं और कार्यकर्ताओं में सेवा, समर्पण तथा जिम्मेदारी की भावना मजबूत करते हैं।

उन्होंने कहा कि जमाअत-ए-इस्लामी हिंद समाज में सकारात्मक बदलाव, नैतिक मूल्यों के प्रसार, शिक्षा, सामाजिक सुधार और शांति के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने उपस्थित लोगों से अपील की कि वे ईमानदारी, धैर्य और बुद्धिमत्ता के साथ समाज में भलाई का संदेश फैलाएं।

विराम के बाद दूसरे सत्र की शुरुआत हुई। इस सत्र में फवाद फलाही ने हदीस के प्रकाश में प्रेरक संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि कयामत के दिन कुछ लोग अल्लाह की रहमत के साए में होंगे, जबकि कुछ लोग कठिनाई और परेशानी में होंगे। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन लोगों को मिलेगा जिन्होंने दुनिया में सत्य, न्याय, सेवा, दान, ईमानदारी और अल्लाह की प्रसन्नता के लिए जीवन बिताया।

फवाद फलाही ने कहा कि दुनिया की जिंदगी एक परीक्षा है। जो व्यक्ति आज अपने स्वार्थ पर नियंत्रण रखता है, जरूरतमंदों की मदद करता है, अत्याचार के खिलाफ खड़ा होता है और इंसाफ का साथ देता है, वही कल सफल होगा। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे अपने जीवन का लक्ष्य केवल सांसारिक सफलता न बनाएं, बल्कि नैतिकता और परलोक की सफलता को भी महत्व दें।

इसके बाद जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के सहायक सचिव इनामुर्रहमान ने देश और समाज की मौजूदा परिस्थितियों पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि सत्य और असत्य के बीच संघर्ष हमेशा से रहा है, लेकिन अंततः विजय सत्य की ही होती है। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय धैर्य, विश्वास और सकारात्मक प्रयास की जरूरत होती है।

उन्होंने देश के मौजूदा हालात का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में बढ़ती नफरत, विभाजनकारी राजनीति और आपसी अविश्वास चिंता का विषय है। ऐसे समय में समुदायों के बीच संवाद, सहयोग और भाईचारा बढ़ाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों समेत सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे संविधान, न्याय और सामाजिक सद्भाव की रक्षा में अपना योगदान दें।

इनामुर्रहमान ने कहा कि निराशा किसी समस्या का समाधान नहीं है। उन्होंने युवाओं और कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे शिक्षा, चरित्र निर्माण, सामाजिक सेवा और शांतिपूर्ण प्रयासों के जरिए देश के विकास में भागीदारी करें।

सम्मेलन के अंतिम सत्र में अमीर-ए-हल्का सलीमुल्लाह खान ने उत्साहवर्धक संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के सम्मेलन केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं होते, बल्कि यह व्यक्तित्व निर्माण, वैचारिक स्पष्टता और सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम होते हैं। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने के लिए जिला नेतृत्व, स्थानीय इकाइयों और स्वयंसेवकों को बधाई दी।

उन्होंने कहा कि समाज में जब भी तनाव और नफरत का माहौल बनता है, तब जिम्मेदार लोगों का कर्तव्य और बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि देश को जोड़ने, शांति स्थापित करने और इंसाफ की आवाज बुलंद करने के लिए हर नागरिक को आगे आना चाहिए।

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि यदि समाज का कोई हिस्सा दूसरे हिस्से को दबाने की कोशिश करेगा तो नुकसान पूरे समाज को होगा। इसलिए सभी समुदायों को साथ लेकर चलना ही देशहित में है। उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं का देश है और इसकी ताकत आपसी सम्मान तथा साझी विरासत में है।

सलीमुल्लाह खान ने अच्छे चरित्र की ताकत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास में अनेक लोग केवल सच्चाई, ईमानदारी और व्यवहार से प्रभावित होकर अच्छे विचारों की ओर आए। उन्होंने कहा कि लोगों तक संदेश पहुंचाने का सबसे प्रभावी तरीका भाषण नहीं, बल्कि व्यवहार है।

उन्होंने उपस्थित लोगों से कहा कि वे अपने मोहल्लों, संस्थानों और सामाजिक दायरों में शांति, सहयोग, सेवा और नैतिकता का उदाहरण बनें। यदि समाज का हर जिम्मेदार व्यक्ति यह भूमिका निभाए तो हालात तेजी से बदल सकते हैं।

कार्यक्रम का समापन सामूहिक दुआ के साथ हुआ। सम्मेलन में शामिल प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में आध्यात्मिक सुधार, सामाजिक जिम्मेदारी, नैतिक आचरण और जनसेवा को प्राथमिकता देंगे।

यह त्रैमासिक सम्मेलन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि इसने यह संदेश भी दिया कि धर्म केवल रस्मों का नाम नहीं, बल्कि इंसानियत, न्याय, सेवा और बेहतर समाज निर्माण का मार्ग है। वर्तमान परिस्थितियों में ऐसे कार्यक्रम सामाजिक संवाद, सकारात्मक सोच और राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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