विधानसभा चुनाव 2026: पांच राज्यों के नतीजे और भारतीय मुसलमानों का भविष्य
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नई दिल्ली,
भारत की सियासत के लिए 4 मई का दिन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। सोमवार की शाम तक केरल, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनावी नतीजे पूरी तरह साफ हो जाएंगे। यह नतीजे सिर्फ हार-जीत का आंकड़ा नहीं होंगे। यह तय करेंगे कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुसलमानों की आने वाले समय में राजनीतिक हैसियत क्या होगी। इन पांच राज्यों में मुस्लिम आबादी का घनत्व और उनका सियासी मिजाज केंद्र की सत्ता को भी बड़े संकेत देने वाला है। 2029 के लोकसभा चुनाव की नींव इन्हीं नतीजों पर टिकी है।
बंगाल का रण और मुस्लिम पहचान का संकट
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की साख दांव पर लगी है। वह लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की कोशिश में हैं। बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 30 प्रतिशत है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से ममता बनर्जी का मजबूत वोट बैंक रहा है। लेकिन इस बार भाजपा ने यहां मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों को अपनी राजनीति का मुख्य हथियार बनाया। मतदाता सूची से करीब 90 लाख नाम हटाए जाने का मुद्दा पूरे चुनाव में छाया रहा। टीएमसी ने इसे मुसलमानों को बेदखल करने की साजिश बताया। वहीं भाजपा ने इसे बाहरी घुसपैठियों के खिलाफ सफाई अभियान कहा।
VIDEO | West Bengal Election 2026: TMC leader Jayprakash Majumdar, says, "Trinamool Congress will have a very comfortable win in this election. When the result will come out on May 4, we are 100 per cent confident… Mamata Banerjee will chief minister for the fourth time in… pic.twitter.com/T7fIIGMIOk
— Press Trust of India (@PTI_News) April 29, 2026
ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव उनकी राजनीतिक विरासत को बचाने की लड़ाई है। यदि मुस्लिम वोट बैंक में थोड़ी भी सेंधमारी होती है तो बंगाल का सियासी नक्शा बदल सकता है। कोलकाता और मुर्शिदाबाद जैसी जगहों पर मुस्लिम मतदाताओं ने किस करवट रुख किया है यह कल साफ हो जाएगा। इस चुनाव में भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे भी हावी रहे। भाजपा ने इन मुद्दों के जरिए ममता सरकार की घेराबंदी की है।
असम में ध्रुवीकरण और नागरिकता का सवाल
असम का चुनाव देश के मुसलमानों के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय रहा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अपने पिछले पांच साल के कार्यकाल में कई ऐसे फैसले लिए जिन्हें मुस्लिम विरोधी माना गया। मदरसों को बंद करने से लेकर बाल विवाह के खिलाफ कार्रवाई तक के फैसलों ने ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया। असम में बंगाली भाषी मुसलमानों को लेकर हमेशा एक तनाव की स्थिति बनी रहती है। भाजपा ने इस तनाव को अपनी चुनावी ताकत में बदला है।
विपक्ष के तौर पर गौरव गोगोई और एआईयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल ने अपनी पूरी ताकत लगाई है। असम के मुस्लिम मतदाता इस बार बेहद खामोश रहे हैं। उनकी यह खामोशी भाजपा के लिए खतरे की घंटी भी हो सकती है और जीत का आधार भी। जलुकबारी और जियागंज जैसी सीटों पर सबकी निगाहें टिकी हैं। यहां का परिणाम यह बताएगा कि क्या असम के मुसलमान अपनी राजनीतिक जमीन बचा पाएंगे।
केरल और तमिलनाडु: दक्षिण की अलग कहानी
केरल की राजनीति उत्तर भारत से बिल्कुल अलग है। यहां मुस्लिम और ईसाई आबादी मिलकर करीब 50 प्रतिशत तक पहुंचती है। केरल के मुसलमान शिक्षा और व्यापार में काफी आगे हैं। पिनाराई विजयन की वामपंथी सरकार ने हमेशा खुद को अल्पसंख्यकों का रक्षक पेश किया है। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ भी मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है। केरल का मुसलमान इस बात से संतुष्ट रहता है कि वहां भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति को ज्यादा जगह नहीं मिलती।
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— ABP Nadu (@abpnadu) May 3, 2026
तमिलनाडु में एमके स्टालिन की द्रविड़ राजनीति ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का अहसास दिलाया है। इस बार अभिनेता विजय की नई पार्टी टीवीके की एंट्री ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। विजय की पार्टी युवाओं के बीच लोकप्रिय है। देखना होगा कि क्या यह नई पार्टी मुसलमानों के वोट बैंक में कोई असर डाल पाती है। तमिलनाडु में मुस्लिम समुदाय हमेशा से क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर वोट करता आया है।
सत्ता का संतुलन और राज्यसभा की गणित
इन राज्यों के चुनाव नतीजे सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं चुनेंगे। यह तय करेंगे कि राज्यसभा में भाजपा की स्थिति क्या होगी। भाजपा फिलहाल राज्यसभा में बहुमत के करीब पहुंचने की कोशिश कर रही है। यदि वह बंगाल और असम में बड़ी जीत हासिल करती है तो उसके लिए संविधान में बड़े बदलाव करना आसान हो जाएगा। मुसलमानों के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
एक्जिट पोल की विश्वसनीयता इस बार पूरी तरह संदेह के घेरे में है। कई बड़ी कंपनियों ने डेटा लीक होने और मतदाताओं के डर की वजह से नतीजे नहीं बताए। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में लोग अपनी पसंद बताने से कतराते हैं। ऐसे में कल सुबह जब ईवीएम खुलेगी तो कई चौंकाने वाले नाम सामने आ सकते हैं।

अल्पसंख्यकों की उम्मीदें और जमीनी हकीकत
देश का मुसलमान चाहता है कि इन पांचों राज्यों में ऐसी सरकारें बनें जो उनके हितों की रक्षा करें। असम में जहां वजूद की लड़ाई है वहीं बंगाल में सत्ता में हिस्सेदारी का सवाल है। पुडुचेरी जैसे छोटे प्रदेश में भी सात प्रतिशत मुस्लिम आबादी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखती है। वहां एन रंगासामी और भाजपा के गठबंधन के सामने कांग्रेस की चुनौती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन चुनावों के बाद भाजपा अपनी रणनीति में बदलाव कर सकती है। यदि उसे दक्षिण में सफलता नहीं मिलती तो वह उत्तर और पूर्व में अपना एजेंडा और तेज करेगी। मुसलमानों के लिए यह समय एकजुट होकर अपनी राजनीतिक दिशा तय करने का है। सोमवार की शाम को आने वाले आंकड़े सिर्फ किसी पार्टी की जीत नहीं होंगे बल्कि यह करोड़ों लोगों की उम्मीदों का फैसला होगा।
भारत के संघीय ढांचे में राज्य सरकारों के पास पुलिस और कानून व्यवस्था जैसे अहम अधिकार होते हैं। मुस्लिम समुदाय के लिए स्थानीय प्रशासन का रवैया सबसे ज्यादा मायने रखता है। यही वजह है कि इन पांच राज्यों के नतीजों का इंतजार पूरा देश बेसब्री से कर रहा है। कल का सूरज किसके लिए खुशियां लाएगा और किसके लिए चुनौतियां यह कुछ ही घंटों में साफ हो जाएगा।

