ईरान पर ट्रंप सख्त, शांति प्रस्ताव पर बढ़ा तनाव
वॉशिंगटन/तेहरान
पश्चिम एशिया में जारी तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम और शांति समझौते की संभावनाओं को उस समय बड़ा झटका लगा, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की ओर से अमेरिकी शांति प्रस्ताव पर दिए गए जवाब को “पूरी तरह अस्वीकार्य” करार दिया। ट्रंप की इस तीखी प्रतिक्रिया ने यह संकेत दे दिया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक दूरी अभी भी बरकरार है और क्षेत्रीय संकट किसी भी समय दोबारा गहरा सकता है।
हाल के हफ्तों में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव, हवाई हमलों, समुद्री घटनाओं और आर्थिक दबावों ने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया था। हालांकि एक नाजुक युद्धविराम फिलहाल कायम है, लेकिन कूटनीतिक बातचीत में आई रुकावट ने वैश्विक शक्तियों की चिंता बढ़ा दी है। इस बीच चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और खाड़ी देशों की सक्रियता यह संकेत देती है कि संकट अब सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों तक पहुंच चुका है।
रविवार देर रात और सोमवार तड़के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ईरान की प्रतिक्रिया को “टोटली अनएक्सेप्टेबल” यानी पूरी तरह अस्वीकार्य बताया। ट्रंप ने आरोप लगाया कि तेहरान वार्ता को गंभीरता से नहीं ले रहा और उसके वार्ताकार “राजनीतिक खेल” खेल रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका ऐसी किसी भी शर्त को स्वीकार नहीं करेगा, जो उसके रणनीतिक हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था के खिलाफ हो।
ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब बैक-चैनल कूटनीतिक प्रयासों के जरिए दोनों देशों के बीच एक व्यापक समझौते की संभावनाएं तलाशने की कोशिश हो रही थी। अमेरिकी प्रस्ताव का मकसद युद्ध की स्थिति को नियंत्रित करना और लंबे समय के लिए तनाव कम करने का रास्ता तैयार करना बताया जा रहा था। लेकिन ईरान की ओर से आई प्रतिक्रिया ने इस प्रक्रिया को फिर से अनिश्चितता में डाल दिया है।
ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, तेहरान ने अमेरिकी प्रस्ताव को प्रभावी रूप से खारिज कर दिया है। ईरान का कहना है कि प्रस्ताव की शर्तें “आत्मसमर्पण” जैसी हैं और उससे देश की संप्रभुता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। ईरानी नेतृत्व का मानना है कि किसी भी समझौते में उसकी सैन्य और परमाणु क्षमताओं पर अत्यधिक दबाव डालना स्वीकार्य नहीं होगा।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम और समृद्ध यूरेनियम भंडार को लेकर है। अमेरिका और इज़राइल लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के जरिए क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलने की कोशिश कर रहा है, जबकि तेहरान हमेशा यह कहता आया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।
इसी तनावपूर्ण माहौल के बीच इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच रविवार शाम अहम बातचीत हुई। इज़राइली अधिकारियों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों नेताओं ने ईरान के साथ जारी वार्ता और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात पर चर्चा की। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू और ट्रंप के बीच ईरान के समृद्ध यूरेनियम भंडार को लेकर साझा चिंता बनी हुई है। हाल ही में एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने कहा था कि “ईरान को लेकर अभी बहुत काम किया जाना बाकी है,” जिससे यह संकेत मिलता है कि इज़राइल सैन्य और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर दबाव बनाए रखना चाहता है।
उधर, इस संकट के बीच चीन ने एक अहम घोषणा करते हुए पुष्टि की है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 13 से 15 मई तक चीन की यात्रा करेंगे। बीजिंग के अनुसार, ट्रंप चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के निमंत्रण पर राजकीय दौरे पर पहुंचेंगे। इस यात्रा के दौरान ईरान संकट और व्यापार विवाद दोनों प्रमुख मुद्दे रहेंगे।
यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार शुल्क, ताइवान और भू-राजनीतिक प्रभाव को लेकर पहले से तनाव बना हुआ है। ट्रंप की यह यात्रा पहले मार्च-अप्रैल में प्रस्तावित थी, लेकिन ईरान युद्ध पर ध्यान केंद्रित करने के कारण इसे टाल दिया गया था। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप, चीन पर ईरान के मामले में अधिक दबाव डालने और साथ ही व्यापारिक रिश्तों में नरमी लाने की कोशिश कर सकते हैं।
इस बीच पश्चिम एशिया में सुरक्षा चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। अरब संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बिन अहमद अल यमाही ने कुवैत के हवाई क्षेत्र में ड्रोन हमले की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे कुवैत की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन और पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा बताया। अरब संसद ने कुवैत के साथ एकजुटता जताते हुए कहा कि उसकी सुरक्षा पूरे अरब क्षेत्र की सामूहिक सुरक्षा का हिस्सा है।
वहीं, बहरीन ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर कथित ईरानी ड्रोन हमलों की तीखी आलोचना की है। बहरीन सरकार ने इन हमलों को “स्पष्ट और अनुचित आक्रामकता” करार दिया। रिपोर्टों के मुताबिक, हाल ही में यूएई की ओर दो ड्रोन भेजे गए थे, जिन्हें वहां की वायु रक्षा प्रणाली ने निष्क्रिय कर दिया। इसी क्रम में सऊदी अरब ने भी यूएई, कतर और कुवैत की क्षेत्रीय सुरक्षा को निशाना बनाने की घटनाओं की कड़ी निंदा की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता पूरी तरह विफल होती है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की सुरक्षा पर संकट गहराने की आशंका है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस परिवहन होता है। यही कारण है कि ब्रिटेन और फ्रांस बहुराष्ट्रीय बैठक की तैयारी कर रहे हैं, ताकि समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
हालांकि फिलहाल युद्धविराम कायम है, लेकिन ट्रंप के बयान और ईरान की असहमति ने यह साफ कर दिया है कि शांति का रास्ता अभी लंबा और मुश्किल है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी रणनीतिक लाल रेखाओं से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे। ऐसे में पश्चिम एशिया एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहां एक छोटी सी चूक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकती है। आने वाले दिनों में ट्रंप की चीन यात्रा, अमेरिका-ईरान बैक-चैनल वार्ता और खाड़ी देशों की प्रतिक्रिया इस संकट की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

