ईरान ने ठुकराया अमेरिकी प्रस्ताव, ट्रंप को करारा जवाब
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली/तेहरान
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच कूटनीतिक टकराव एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा क्षेत्रीय युद्धविराम और शांति बहाली के लिए भेजे गए प्रस्ताव को ईरान ने औपचारिक रूप से खारिज कर दिया है। भारत में ईरानी दूतावास ने सोमवार को स्पष्ट किया कि तेहरान की प्रतिक्रिया देश के “मौलिक अधिकारों” और राष्ट्रीय संप्रभुता को ध्यान में रखकर तैयार की गई है तथा अमेरिकी योजना को स्वीकार करना “ट्रंप की अत्यधिक मांगों के सामने आत्मसमर्पण” करने जैसा होता।
ईरान की इस प्रतिक्रिया ने पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव को और बढ़ा दिया है। ऐसे समय में जब अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष को सीमित करने के लिए बैक-चैनल कूटनीति चल रही थी, तेहरान का यह कड़ा रुख संकेत देता है कि दोनों देशों के बीच समझौते की राह अभी भी बेहद कठिन बनी हुई है।
भारत में ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक बयान जारी कर कहा कि ईरान द्वारा अमेरिका को भेजी गई प्रतिक्रिया “ईरानी राष्ट्र के मौलिक अधिकारों” पर आधारित है। दूतावास के अनुसार, अमेरिकी प्रस्ताव में ऐसी शर्तें शामिल थीं, जो ईरान की संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति के खिलाफ मानी गईं। बयान में कहा गया कि अमेरिका की योजना को स्वीकार करने का अर्थ होता कि तेहरान ट्रंप प्रशासन की “अत्यधिक और अस्वीकार्य मांगों” के सामने झुक जाए।
ईरान ने अपने जवाब में कई अहम मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। सबसे पहले, तेहरान ने अमेरिका से युद्ध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई यानी “वॉर रिपेरेशंस” की मांग की है। ईरानी पक्ष का कहना है कि हालिया संघर्षों में देश को आर्थिक और रणनीतिक नुकसान हुआ है, जिसकी जिम्मेदारी अमेरिका और उसके सहयोगियों को लेनी चाहिए।
इसके अलावा ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर अपनी संप्रभुता को दोहराते हुए साफ किया है कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर उसका अधिकार किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं बन सकता। गौरतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर सकता है।
ईरानी प्रस्ताव में अमेरिकी प्रतिबंधों को समाप्त करने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई है। तेहरान ने कहा है कि वर्षों से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है और यदि किसी प्रकार की शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है, तो पहले इन प्रतिबंधों को हटाना होगा। साथ ही, ईरान ने विदेशों में जब्त की गई अपनी संपत्तियों और वित्तीय परिसंपत्तियों को भी वापस करने की मांग रखी है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, ईरान ने यह भी कहा है कि अमेरिका को क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करनी चाहिए और पश्चिम एशिया में “शत्रुतापूर्ण गतिविधियों” को समाप्त करना चाहिए। रिपोर्टों के मुताबिक, ईरानी मसौदे में यह मांग भी शामिल है कि अमेरिका, लेबनान में इज़राइल की सैन्य कार्रवाई को रोकने में भूमिका निभाए और क्षेत्रीय संघर्षों को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। रविवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर ट्रंप ने ईरान की प्रतिक्रिया को “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया। उन्होंने लिखा कि उन्होंने ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया पढ़ी है और यह उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आई।
ट्रंप की इस टिप्पणी से यह साफ संकेत मिलता है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच मतभेद अब भी गहरे हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सैन्य प्रभाव और रणनीतिक गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि ईरान इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा मामला मानता है।
दरअसल, पिछले कुछ सप्ताहों में पश्चिम एशिया की स्थिति बेहद तनावपूर्ण रही है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान समर्थित समूहों पर कार्रवाई, समुद्री सुरक्षा संकट, ड्रोन हमले और आर्थिक प्रतिबंधों ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। हालांकि हाल के दिनों में सीमित युद्धविराम की स्थिति बनी हुई है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच अविश्वास कम नहीं हुआ है।
ईरानी सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए (IRNA) के अनुसार, तेहरान ने अपना जवाब पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका तक पहुंचाया है। पाकिस्तान को इस पूरे मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाला देश माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल बातचीत का प्राथमिक उद्देश्य क्षेत्र में युद्ध समाप्त करना होना चाहिए, लेकिन यह तभी संभव है जब अमेरिकी पक्ष ईरान की मूल चिंताओं को गंभीरता से ले।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय अमेरिका और ईरान दोनों घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबावों का सामना कर रहे हैं। एक ओर ट्रंप प्रशासन पश्चिम एशिया में अपनी रणनीतिक पकड़ कमजोर नहीं करना चाहता, वहीं ईरान भी अपनी क्षेत्रीय शक्ति और राजनीतिक प्रतिष्ठा को बनाए रखने की कोशिश में है। यही वजह है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी “रेड लाइन” से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे।
भूराजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह कूटनीतिक गतिरोध लंबा खिंचता है, तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। खाड़ी क्षेत्र में तेल आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक बाजारों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि चीन, रूस, यूरोपीय देशों और खाड़ी राष्ट्रों की नजरें अब इस संकट पर टिकी हुई हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका और ईरान बातचीत के किसी साझा बिंदु तक पहुंच पाएंगे या फिर पश्चिम एशिया एक नए और बड़े टकराव की ओर बढ़ रहा है। ट्रंप के कड़े रुख और ईरान की स्पष्ट असहमति ने यह जरूर साफ कर दिया है कि शांति की राह अभी लंबी, जटिल और राजनीतिक शर्तों से भरी हुई है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के अगले कदम तय करेंगे कि क्षेत्र युद्ध की आग से बाहर निकलता है या एक बार फिर बड़े संकट की तरफ बढ़ता है।

