Assam Muslims Success Story : क्रिकेट सितारों के निर्माता नवाब अली
मुस्लिम नाउ विशेष | Assam Muslims Success Story
किसी खिलाड़ी की सफलता के पीछे अक्सर एक ऐसा चेहरा होता है, जो सुर्खियों में नहीं आता। वह मैदान के किनारे खड़ा रहता है। खिलाड़ियों को गिरते हुए संभालता है। हार में हौसला देता है और जीत में पीछे हट जाता है। असम में ऐसा ही एक नाम है नवाब अली। गुवाहाटी में लोग उन्हें प्यार से ‘नबाबदा’ कहते हैं।
नवाब अली ने अपनी जिंदगी क्रिकेट को समर्पित कर दी। उन्होंने सिर्फ खिलाड़ियों को ट्रेनिंग नहीं दी, बल्कि सपनों को दिशा दी। उनकी मेहनत का असर आज पूरे देश में दिखाई देता है। असम रणजी टीम के पूर्व कप्तान पराग दास को तराशने वाले यही शख्स हैं। इतना ही नहीं, पराग दास के बेटे रियान पराग को भी उन्होंने शुरुआती दौर में तैयार किया। वही रियान, जिसने आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय टीम की जर्सी पहनी।

जब भारत में महान क्रिकेट कोचों की चर्चा होती है, तो मुंबई के रामाकांत आचरेकर का नाम सम्मान से लिया जाता है। जिन्होंने सचिन तेंदुलकर जैसी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाया। असम में नवाब अली ने कुछ वैसा ही काम किया है। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्होंने गुमनामी में रहकर यह सफर तय किया।
गुवाहाटी के नेहरू स्टेडियम में 1985 में शुरू हुआ गुवाहाटी क्रिकेट कोचिंग सेंटर आज हजारों सपनों का ठिकाना बन चुका है। इसके संस्थापक नवाब अली हैं। करीब चार दशक से वह लगातार बच्चों को क्रिकेट सिखा रहे हैं। 60 साल की उम्र पार करने के बाद भी उनका जोश कम नहीं हुआ। खास बात यह है कि इतने वर्षों में वह शायद ही कभी किसी ट्रेनिंग सत्र से गैरहाजिर रहे हों।
नवाब अली का क्रिकेट सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा। उन्होंने सिर्फ 15 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया। 1981 से 1984 के बीच उन्होंने सीके नायडू ट्रॉफी में असम का प्रतिनिधित्व किया। गुवाहाटी जिला टीम की तरफ से नुरुद्दीन ट्रॉफी भी खेली। लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि उनका असली जुनून मैदान में खेलने से ज्यादा खिलाड़ियों को तैयार करने में है।
1984 में उन्होंने SAI कोच विरेंद्र शर्मा से पेशेवर प्रशिक्षण लिया। यहीं से उनके कोचिंग सफर की मजबूत नींव पड़ी। फिर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी।

आज उनके शिष्यों की सूची बेहद लंबी है। रियान पराग, पराग दास, अबू नासचिम अहमद, सैयद जकारिया ज़ुफरी, निशांता बोर्डोलोई, गौतम दत्ता, मृगेन तकुकदार, पोलाश ज्योति दास, खानिन सैकिया और सादेक इमरान चौधरी जैसे कई खिलाड़ी उनकी कोचिंग से निकलकर राष्ट्रीय और प्रथम श्रेणी क्रिकेट तक पहुंचे।
नवाब अली सिर्फ एक कोच नहीं हैं। वह एक कुशल संगठनकर्ता भी रहे हैं। 1992 से 2018 तक उन्होंने गुवाहाटी स्पोर्ट्स एसोसिएशन का नेतृत्व किया। उनके मार्गदर्शन में कोचिंग सेंटर ने 25 से 30 खिलाड़ियों से शुरुआत की थी। आज यहां 350 से अधिक युवा क्रिकेट की बारीकियां सीख रहे हैं।
उनकी आंखों में अब भी कई सपने हैं। उन्हें भरोसा है कि असम क्रिकेट का भविष्य मजबूत है। इसकी एक वजह उनके अपने शिष्य देवजीत सैकिया भी हैं, जो कभी उनके कोचिंग सेंटर में खिलाड़ी थे और आज BCCI के सचिव हैं।
नवाब अली मानते हैं कि अब असम के खिलाड़ियों को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। उनकी यह बात उम्मीद जगाती है।
असल में नवाब अली की कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं है। यह भरोसे, मेहनत और समर्पण की कहानी है। ऐसे इंसान की कहानी, जिसने खुद रोशनी में आने के बजाय दूसरों को चमकना सिखाया। असम की क्रिकेट दुनिया में वह एक नाम नहीं, एक संस्था बन चुके हैं।

