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Assam Muslims Success Story : गांव से अमेरिका तक डॉ. मुस्तफा का सफर

मुस्लिम नाउ विशेष

कभी गांव की कीचड़ भरी सड़कों पर साइकिल चलाकर पढ़ाई के लिए शहर जाने वाला एक शर्मीला लड़का आज अमेरिका में पैथोलॉजी की दुनिया का बड़ा नाम बन चुका है। असम के हैलाकांडी जिले के छोटे से गांव बहादुरपुर से निकलकर अमेरिका के शीर्ष चिकित्सा संस्थानों तक पहुंचने वाले डॉ. मुस्तफा ए. बरभुइया की कहानी मेहनत, संघर्ष और सपनों की मिसाल है।

आज डॉ. मुस्तफा पश्चिमी मैसाचुसेट्स, अमेरिका में बेस्टेट हेल्थ पैथोलॉजी सर्विसेज में सेक्शन मेडिकल डायरेक्टर हैं। वह क्लिनिकल केमिस्ट्री और पॉइंट ऑफ केयर टेस्टिंग संचालन की निगरानी करते हैं। उनकी जिम्मेदारी सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। वह डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों को मेडिकल जांच की सही व्याख्या में भी मदद करते हैं ताकि मरीजों का इलाज सही समय पर हो सके।

लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था।

दक्षिणी असम के हैलाकांडी जिले के बहादुरपुर गांव में पले बढ़े डॉ. मुस्तफा ने शुरुआती पढ़ाई सनुहर अली मेमोरियल हाई स्कूल से की। यह वह समय था जब गांव में न बिजली थी और न सड़क की ठीक व्यवस्था। स्कूल और पढ़ाई के लिए संघर्ष रोज का हिस्सा था।

डॉ. मुस्तफा बताते हैं कि वह गांव से कीचड़ भरे रास्तों पर साइकिल चलाकर हैलाकांडी शहर जाते थे, जहां एडवांस्ड मैथेमेटिक्स और साइंस की क्लास लेते थे। पढ़ाई के प्रति उनका लगाव शुरू से ही गहरा था।

12वीं की पढ़ाई के बाद उन्होंने सिलचर के गुरुचरण कॉलेज में दाखिला लिया। यहां उन्होंने जूलॉजी में बैचलर ऑफ साइंस किया और बॉटनी, केमिस्ट्री समेत दूसरे विषयों की पढ़ाई की। इसके बाद उनका सफर उन्हें मध्य प्रदेश के ग्वालियर ले गया, जहां उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय से बायोकेमिस्ट्री में मास्टर्स और फिर पीएचडी पूरी की।

यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।

जुलाई 2013 में पीएचडी पूरी करने के बाद उन्हें अमेरिका के प्रतिष्ठित जॉन्स हॉपकिन्स स्कूल ऑफ मेडिसिन में पोस्टडॉक्टरल प्रशिक्षण का मौका मिला। यह उनके करियर का अहम पड़ाव साबित हुआ।

डॉ. मुस्तफा कहते हैं कि उनका सपना हमेशा भारत लौटने का था। वह असम में अपनी प्रयोगशाला खोलकर क्लिनिकल बायोकेमिस्ट्री और मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स के क्षेत्र में काम करना चाहते थे। लेकिन हालात कुछ और थे।

उन्होंने कहा, “पोस्टडॉक्टरल प्रशिक्षण पूरा होने के बाद भारत में उपयुक्त अवसर नहीं मिला। इसलिए अमेरिका में ही काम जारी रखना पड़ा।”

इसके बाद उन्होंने पेन स्टेट कॉलेज ऑफ मेडिसिन से क्लिनिकल केमिस्ट्री फेलोशिप पूरी की और एक प्रैक्टिसिंग क्लिनिकल बायोकेमिस्ट तथा क्लिनिकल लैबोरेटरी डायरेक्टर बने।

आज वह अमेरिका में पैथोलॉजी के क्षेत्र के प्रभावशाली नामों में गिने जाते हैं। उन्हें ‘पैथोलॉजिस्ट पावर लिस्ट 2024’ में जगह मिली, जिसमें पैथोलॉजी क्षेत्र के शीर्ष प्रभावशाली लोगों को शामिल किया जाता है। उत्तर पूर्व भारत के युवाओं के लिए यह उपलब्धि खास मायने रखती है।

डॉ. मुस्तफा सिर्फ चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने अमेरिका और भारत में मिलकर एक गैर लाभकारी संस्था ‘फाउंडेशन फॉर एडवांसमेंट ऑफ एसेंशियल डायग्नोस्टिक्स’ की भी स्थापना की है। इस संस्था का मकसद जरूरतमंद और संसाधनों की कमी वाले इलाकों में बेहतर जांच सुविधाएं पहुंचाना है।

वह फिलहाल यूमास चैन मेडिकल स्कूल के बेस्टेट रीजनल कैंपस में सहायक प्रोफेसर भी हैं। साथ ही कैंसर और बायोमार्कर से जुड़े शोध पर काम कर रहे हैं।

अपने गांव और देश को लेकर उनका जुड़ाव आज भी वैसा ही है।

डॉ. मुस्तफा कहते हैं, “मेरा अंतिम सपना भारत लौटना है। मैं अपने राज्य असम और गरीब लोगों के लिए काम करना चाहता हूं। अगर कोई युवा मेरे जैसे करियर के लिए अमेरिका आना चाहता है तो मैं उसकी मदद के लिए हमेशा तैयार हूं।”

बहादुरपुर के उस छोटे गांव से निकला यह सफर अब हजारों युवाओं के लिए उम्मीद की कहानी बन चुका है। मेहनत, शिक्षा और धैर्य से मंजिल कितनी बड़ी हो सकती है, डॉ. मुस्तफा इसकी जीती जागती मिसाल हैं।

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