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ईद-उल-अजहा पर जमाअत अध्यक्ष सआदतुल्लाह हुसैनी का संदेश: इब्राहीमी आदर्शों को अपनाने की अपील

नई दिल्ली

त्याग, समर्पण और अटूट विश्वास के पावन पर्व ईद-उल-अजहा (बकरीद) के पावन अवसर पर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (JIH) के राष्ट्रीय अध्यक्ष (अमीर) सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने देश और दुनिया के तमाम नागरिकों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय को तहेदिल से मुबारकबाद पेश की है। मीडिया को जारी एक विशेष और आधिकारिक बयान में जमाअत प्रमुख ने दुआ की है कि यह ईद पूरी इंसानियत के लिए सुख, चैन, अमन-चैन और सुरक्षा का जरिया बने। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह त्योहार एक ऐसे नए युग की शुरुआत साबित होगा, जो समाज में न्याय (इंसाफ), विनम्रता और लोक-कल्याण के प्रकाश से जगमगाएगा।

सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने अपने संदेश में ईद-उल-अजहा के वास्तविक और रूहानी संदेश पर विस्तार से रौशनी डाली। उन्होंने कहा कि यह त्योहार केवल कुछ रस्मों को पूरा करने का नाम नहीं है, बल्कि यह ‘तौहीद’ (एकेश्वरवाद) का सबसे बड़ा उत्सव है। यह पर्व सिखाता है कि इंसान अपने पैदा करने वाले यानी एक ईश्वर के प्रति खुद को पूरी तरह समर्पित कर दे, सांसारिक मोह-माया के जालों को तोड़े और हर तरह के पाखंड या मिथ्या से मुक्ति पाए।

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हजरत इब्राहीम (अले.) का जीवन: कठिन परीक्षाओं में अडिग रहने की मिसाल

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष ने अपने वक्तव्य में ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों का जिक्र करते हुए कहा कि ईद-उल-अजहा सीधे तौर पर हजरत इब्राहीम (उन पर शांति हो) और उनके परिवार के महान बलिदानों की याद दिलाता है। उन्होंने कहा:

“यह त्योहार वफादारी का एक जीवंत दस्तावेज है। अल्लाह के साथ किए गए वादों के प्रति वफादारी, कठिन से कठिन इम्तिहान के समय भी सत्य (हक) के रास्ते पर पर्वत की तरह अटल रहने की वफादारी। यह एक ऐसी निष्ठा की मांग करता है जो बिना किसी झिझक के अपनी सबसे प्रिय चीज को भी कुर्बान करने के लिए तैयार रहे।”

उन्होंने पवित्र कुरान की आयतों का हवाला देते हुए समझाया कि खुदा ने हजरत इब्राहीम के इस बेमिसाल चरित्र और उनकी अटूट आस्था को कुरान के पन्नों में हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया है। यह एक ऐसा आदर्श है, जो किसी एक कालखंड के लिए नहीं, बल्कि हर युग और हर दौर में पूरी इंसानियत को सही रास्ता दिखाता रहेगा।

वर्तमान वैश्विक और राष्ट्रीय परिदृश्य में मुस्लिम समाज के लिए संदेश

आज के दौर में जब भारत सहित पूरी दुनिया में मुस्लिम समुदाय विभिन्न प्रकार के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संकटों तथा चुनौतियों से जूझ रहा है, सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी का यह बयान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने मौजूदा संकटों का सीधे तौर पर जिक्र करते हुए कहा कि हजरत इब्राहीम (अले.) के जीवन और उनके आदर्शों में आज के दौर के मुसलमानों के लिए कामयाबी, तरक्की और सम्मान का एक बहुत बड़ा राज छुपा हुआ है।

जमाअत अध्यक्ष ने समुदाय का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि जब-जब ईमान वालों पर कठिन समय आया है, वह उनके विश्वास की परीक्षा का दौर रहा है। यह खुदा का सनातन नियम (सुन्नत) है कि उसने बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबियों को हमेशा पक्के संकल्प, सब्र (धैर्य) और दृढ़ता जैसे उच्च मानवीय गुणों से जोड़ा है। विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय अपने नैतिक चरित्र को मजबूत करना ही असल बुद्धिमानी है।

औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का ‘ईश्वरीय नुस्खा’

सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि ईद-उल-अजहा को महज एक पारंपरिक या औपचारिक उत्सव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने मुस्लिम समाज से अपील की कि:

  • मूल भावना को समझें: कुर्बानी की तमाम रस्मों को केवल दिखावे या परंपरा के तौर पर न निभाएं, बल्कि उसके पीछे छिपे असल मकसद और रूह को समझें।
  • इब्राहीमी चरित्र का विकास: इस बात की आज सख्त जरूरत है कि हर मुसलमान अपने भीतर इब्राहीम (अले.) जैसा चरित्र विकसित करे, जिसमें समाज के लिए त्याग और ईश्वर के लिए पूर्ण समर्पण की भावना हो।
  • भविष्य की राह: यदि आज का समाज इन नैतिक और आध्यात्मिक गुणों को अपने भीतर दोबारा पैदा कर लेता है, तो आने वाले कल की राहें अपने आप रोशन हो जाएंगी और भविष्य उज्जवल होगा।

जमाअत प्रमुख की विशेष दुआ: जिम्मेदारियों को पूरा करने का मिले सौभाग्य

बयान के आखिरी हिस्से में सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने बेहद भावुक अंदाज में अल्लाह तआला से सामूहिक प्रार्थना (दुआ) की। उन्होंने प्रार्थना की कि ईश्वर हम सभी को हजरत इब्राहीम जैसा अडिग ईमान, वैसी ही चट्टानी दृढ़ता और अटूट समर्पण की भावना अता फरमाए।

साथ ही उन्होंने विशेष तौर पर यह दुआ भी मांगी कि देश और समाज के मौजूदा हालात में मुसलमानों के कंधों पर जो भी धार्मिक, सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारियां आयद (लागू) होती हैं, उन्हें वे पूरी एकाग्रता, ईमानदारी और हिम्मत के साथ पूरा कर सकें। उन्होंने समाज के सभी वर्गों से इस त्योहार को आपसी भाईचारे, मोहब्बत और कौमी यकजहती (सांप्रदायिक सौहार्द) के साथ मनाने की पुरजोर अपील की।

यह विस्तृत रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के इस संदेश का मुख्य उद्देश्य त्योहार की रस्मों से आगे बढ़कर समाज में एक गहरे नैतिक और व्यावहारिक बदलाव की बुनियाद रखना है, जो मौजूदा दौर की सबसे बड़ी जरूरत है।

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