बकरीद पर परीक्षा विवाद: गजेटेड हॉलिडे के बावजूद एग्जाम, कोर्ट के आदेश पर भी अड़ी यूनिवर्सिटीज
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नई दिल्ली, मुस्लिम नाउ ब्यूरो:
शैक्षणिक संस्थानों में छुट्टियों को लेकर राजनीति और विवाद नया नहीं है, लेकिन जब मामला देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज का हो और सीधे तौर पर एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हो, तो बहस का गंभीर होना लाजिमी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU), हरियाणा की केआर मंगलम यूनिवर्सिटी (KR Mangalam University) और गुजरात की कुछ प्रमुख यूनिवर्सिटीज में हाल ही में कुछ ऐसा ही देखने को मिला। केंद्र सरकार द्वारा घोषित गजेटेड हॉलिडे (राजपत्रित अवकाश) होने के बावजूद, 28 मई को बकरीद (ईद-उल-अजहा) के दिन परीक्षाओं का आयोजन किया गया।
इस फैसले ने न केवल छात्रों को मुसीबत में डाला, बल्कि अब इस पर एक बड़ा सामाजिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। छात्र, उनके अभिभावक और सामाजिक कार्यकर्ता अब सीधे सवाल उठा रहे हैं: क्या यह महज एक प्रशासनिक लापरवाही है या फिर अल्पसंख्यकों को परेशान करने की कोई सोची-समझी कोशिश?
A Delhi University law student has moved the Delhi High Court challenging the university's decision to conduct examinations on May 28, the date to which the Centre officially shifted the Eid Ul Zuha ( Bakrid) holiday. The plea argues it violates the religious rights of Muslim… pic.twitter.com/qnRHU72Qa7
— Bar and Bench (@barandbench) May 26, 2026
कोर्ट का आदेश भी बेअसर, डीयू प्रशासन की ‘हठधर्मी’ पर उठे सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे हैरान करने वाला पहलू दिल्ली यूनिवर्सिटी में देखने को मिला। जब केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर अधिसूचना जारी कर बकरीद की छुट्टी को संशोधित करते हुए 28 मई तय किया, तब भी डीयू प्रशासन ने अपनी परीक्षाओं की तारीखों में कोई बदलाव नहीं किया।
यूनिवर्सिटी के इस अड़ियल रुख के खिलाफ दिल्ली यूनिवर्सिटी के लॉ के एक छात्र ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में तर्क दिया गया कि राजपत्रित अवकाश के दिन परीक्षा आयोजित करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण) के तहत मुस्लिम छात्रों के मौलिक और धार्मिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
Delhi HC declares May 28 as a holiday on account of Id-ul-Zuha (Bakrid). #DelhiHighCourt #Bakrid pic.twitter.com/y1HEbfeZZW
— Bar and Bench (@barandbench) May 26, 2026
मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से 28 मई को ईद-उल-जुहा (बकरीद) के अवसर पर आधिकारिक अवकाश घोषित किया। लेकिन कोर्ट के इस रुख के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन टस से मस नहीं हुआ।
छात्रों का आरोप: जब छात्र परीक्षा नियंत्रक (Controller of Examinations) और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मिलने पहुंचे, तो उन्हें कथित तौर पर रूखा जवाब मिला कि ‘परीक्षाएं तय शेड्यूल पर ही होंगी, आप चाहें तो कोर्ट जा सकते हैं।’ हद तो तब हो गई जब २४ मई और उसके बाद परीक्षा नियंत्रक कार्यालय के बाहर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों को यूनिवर्सिटी के सुरक्षा गार्डों द्वारा घसीटकर बाहर निकाल दिया गया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और ‘मकतूब हिंदी’ जैसी मीडिया रिपोर्ट्स इस बात की तस्दीक करती हैं कि छात्रों के साथ वहां बदसलूकी की गई।
DU में ईद के दिन भी परीक्षा, विरोध कर रहे छात्रों को घसीट कर ले गए गार्ड. दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के Controller of Examinations के दफ्तर के बाहर छात्रों ने जोरदार विरोध-प्रदर्शन किया. छात्र 28 मई को होने वाली परीक्षाओं का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इसी दिन ईद-उल-अज़हा (बकरीद) का… pic.twitter.com/zsTFXeQWmS
— Maktoob Hindi (@maktoobhindi) May 27, 2026
हरियाणा और गुजरात में भी यही कहानी
यह संकट सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। हरियाणा की केआर मंगलम यूनिवर्सिटी में भी बकरीद के पवित्र त्योहार के दिन परीक्षाएं आयोजित की गईं। छात्रों का कहना है कि उन्होंने एक हफ्ते पहले ही प्रशासन को लिखित में अवगत कराया था कि इस दिन उनका सबसे बड़ा त्योहार है और वे परीक्षा देने की स्थिति में नहीं होंगे। इसके बावजूद प्रबंधन ने साफ कह दिया कि डेटशीट पहले से तय है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा।
यही हाल गुजरात की कुछ यूनिवर्सिटीज का भी रहा, जहां त्योहार के दिन छात्रों को परिवार और नमाज छोड़कर परीक्षा केंद्रों के चक्कर काटने पड़े।
दिल्ली यूनिवर्सिटी ने ईद उल अज़हा के रोज़ परीक्षा रख दी है। हालांकि ईद उल अज़हा की गजेटेड छुट्टी रहती है, फिर भी इस रोज़ परीक्षा रख दी। जब छात्रों ने सवाल किया तो उनसे @UniofDelhi ने कि हाईकोर्ट चले जाइए। शिक्षा मंत्री @dpradhanbjp इसका संज्ञान लीजिए। pic.twitter.com/tSyI42IjIe
— Wasim Akram Tyagi (@WasimAkramTyagi) May 27, 2026
‘सांस्कृतिक युद्ध’ या प्रशासनिक नाकामी? सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा
इस घटना के बाद इंटरनेट मीडिया पर बहस छिड़ गई है। मशहूर पत्रकार वसीम अकरम त्यागी ने ट्विटर (अब एक्स) पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को टैग करते हुए लिखा कि जब ईद-उल-अजहा की गजेटेड छुट्टी रहती है, तो फिर इस दिन परीक्षा क्यों रखी गई? शिक्षा मंत्रालय को इस पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए।
छात्रों और उनके परिजनों के बीच इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि हर साल किसी न किसी बहाने त्योहारों के वक्त ऐसा माहौल बनाया जाता है जिससे अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना पैदा हो। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने इसे मुसलमानों के खिलाफ चल रहे एक अदृश्य ‘सांस्कृतिक युद्ध’ का हिस्सा बताया, जिसका मकसद त्योहारों की खुशी को किरकिरा करना और युवाओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना है।
अभिभावकों का सवाल है कि जब देश के तमाम सरकारी दफ्तर, बैंक, स्कूल और अधिकांश शिक्षण संस्थान 28 मई को बंद थे, तो इन चुनिंदा विश्वविद्यालयों को परीक्षा कराने की इतनी जल्दी क्यों थी? क्या परीक्षाएं दो दिन आगे नहीं बढ़ाई जा सकती थीं?
क्या यूजीसी (UGC) यूनिवर्सिटीज के खिलाफ करेगी कार्रवाई?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के मुताबिक, केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों को केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित गजेटेड छुट्टियों का पालन करना अनिवार्य होता है। विशेषकर तब जब मामला किसी बड़े धार्मिक त्योहार से जुड़ा हो। ऐसे में इन विश्वविद्यालयों द्वारा नियमों की अनदेखी करना सीधे तौर पर यूजीसी के दिशानिर्देशों का उल्लंघन माना जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यूजीसी इन विश्वविद्यालयों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई करेगी? पीड़ित छात्रों की मांग है कि:
- इस लापरवाही या हठधर्मी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को चिन्हित कर उन पर कार्रवाई हो।
- जो छात्र त्योहार के कारण परीक्षा नहीं दे पाए, उनके लिए दोबारा परीक्षा (Re-exam) की व्यवस्था बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के की जाए।
- भविष्य के लिए एक सख्त गाइडलाइन जारी हो ताकि किसी भी धर्म के गजेटेड हॉलिडे के दिन परीक्षाएं न रखी जाएं।
निष्कर्ष: शिक्षा के भगवाकरण और ध्रुवीकरण के आरोप
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता और उनकी कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के फैसलों से कैंपस के भीतर सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ता है। जब यूनिवर्सिटी प्रशासन खुद ही अदालतों के आदेशों और सरकारी छुट्टियों का मखौल उड़ाने लगे, तो छात्रों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास की भावना पैदा होना स्वाभाविक है।
अब देखना यह होगा कि शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी इस संवेदनशील मामले पर क्या रुख अपनाते हैं, या फिर छात्रों की इस आवाज को कैंपस की चहारदीवारी के भीतर ही दबा दिया जाएगा।

