उर्दू शायरी का सुनहरा सूरज डूबा, 91 साल की उम्र में डॉ. बशीर बद्र का निधन
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, भोपाल
उर्दू अदब के आसमान का एक बेहद चमकदार सितारा हमेशा के लिए खामोश हो गया है। अपनी मखमली आवाज और बेहद आसान लफ्जों से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने भोपाल स्थित अपने निवास ‘बशीर मंजिल’ में आखिरी सांस ली। बशीर साहब लंबे समय से डिमेंशिया यानी भूलने की बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने सोशल मीडिया पर इस दुखद खबर को साझा करते हुए लिखा कि ‘बशीर साहब लेफ्ट अस…प्रेयर्स’। उनके निधन की खबर से पूरी दुनिया में फैले उनके प्रशंसकों और साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
“उर्दू का एक दौर ख़ामोश हो गया….
— Aśif Khan (@AsifBinSajid) May 29, 2026
कुछ लोग बिछड़कर भी हमेशा ज़िंदा रहते हैं…”
बशीर बद्र(Basheer Badr)
जन्म: 15 फ़रवरी 1935, फ़ैज़ाबाद (अब अयोध्या), उत्तर प्रदेश
निधन: 28 मई 2026, भोपाल, मध्य प्रदेश
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में…” 🖤… pic.twitter.com/0HbbcLsWtk
अयोध्या से भोपाल तक का सफर
डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई इटावा और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पूरी हुई। उन्होंने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से ही अपनी पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष के रूप में लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं। नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद वह मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आ गए और यहीं फतेहगढ़ इलाके में ‘बशीर मंजिल’ बनाकर रहने लगे। जीवन के आखिरी पड़ाव तक भोपाल ही उनका आशियाना बना रहा।
जब बशीर साहब भूलने लगे थे अपने ही शेर
बीते कई सालों से बशीर बद्र साहब डिमेंशिया नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित थे। जिस शायर ने करीब 60 सालों तक देश और दुनिया के मुशायरों में अपनी शायरी का जादू बिखेरा, आखिरी दिनों में वही शायर अपनी बात पूरी करने के लिए शब्दों की तलाश करता था। डिमेंशिया की वजह से उनके लफ्ज जुबान का साथ छोड़ने लगे थे। वह अपनी ही लिखी गजलें और शेर भूलने लगे थे।
इस मुश्किल दौर में उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र और बेटे तैय्यब ने उनकी ढाल बनकर देखभाल की। वे बशीर साहब को उनके पुराने सुनहरे दिन याद दिलाने के लिए उनके कानों में उन्हीं के लिखे शेरों के मिसरे गुनगुनाते थे। कई बार इसे सुनकर बशीर साहब के चेहरे पर चमक आ जाती थी और वह खुद भी ‘वाह-वाह’ या ‘इरशाद’ बोल पड़ते थे। बीमारी के बावजूद उनके परिवार के समर्पण की वजह से वह 91 साल की उम्र तक हमारे बीच बने रहे।
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है,
— शब्द शक्ति 😊 (@gita_gyan07) May 28, 2026
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा ..!!
~ बसीर बद्र साहब 🌻
अलविदा प्रिय शायर ।। विनम्र श्रद्धांजलि 💐 pic.twitter.com/yOloy9bUKp
आम आदमी की जुबान बनी बशीर की शायरी
बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू शायरी को भारी-भरकम और मुश्किल शब्दों के जाल से बाहर निकाला। उन्होंने शायरी को आम बोलचाल की बेहद सरल और खूबसूरत हिंदुस्तानी भाषा से जोड़ा। यही वजह थी कि उनकी शायरी को समझने के लिए किसी बहुत बड़े साहित्यिक ज्ञान की जरूरत नहीं पड़ती थी।
उनकी गजलें कम उम्र के युवाओं की महफिलों, मोहब्बत की पहली धड़कनों, जुदाई के दर्द और उदास शामों का हिस्सा बन जाती थीं। समाज का कोई बेहद पढ़ा-लिखा व्यक्ति हो या कोई आम इंसान, बशीर साहब का कोई न कोई शेर हर किसी के दिल में उतर जाता था। उन्होंने अमीर और गरीब दोनों के जमीर को जगाने वाली शायरी की।
बशीर बद्र साहब तो कल दुनिया को अलविदा कह गए पर उसने एक बात कहा हिंदुस्तान के लिए जरूर सुनें। pic.twitter.com/kaIuD6Mhy8
— ROYAL Z (@MDaejazAlam1) May 29, 2026
सामाजिक सच और इंसानी रिश्तों के चितेरे
बशीर बद्र सिर्फ रूमानी शायरी के फनकार नहीं थे। उन्होंने समाज के कड़वे सच और दंगों के दर्द को भी अपनी शायरी में पिरोया। जब वह लिखते हैं कि ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’, तो यह शेर सीधे तौर पर नफरत की आग में जलने वाले मासूमों की चीख को बयां करता है। वह बड़े से बड़े सामाजिक सच को बहुत सादगी के साथ कह देते थे।
इसके साथ ही इंसानी रिश्तों की मजबूरियों को बयां करता उनका एक शेर आज भी हर जुबान पर रहता है, जिसमें वह कहते हैं कि ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता’।
साहित्यिक योगदान और बड़े सम्मान
साहित्य की दुनिया में बशीर बद्र के बेमिसाल योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्हें साल 1999 में उनके कविता संग्रह के लिए प्रतिष्ठित ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से भी नवाजा था। अभी कुछ समय पहले ही करीब 46 साल के लंबे इंतजार के बाद बशीर साहब को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से उनकी ओरिजिनल डिग्री भी सौंपी गई थी।
context- सन् 1987 में मेरठ दंगों के दौरान, मशहूर उर्दू शायर Bashir Badr साहब का घर जला दिया गया था। आग में उनकी सारी संपत्ति के साथ उनकी वर्षों से लिखी अप्रकाशित शायरी भी उन लपटों में हमेशा के लिए खो गई। #BashirBadr pic.twitter.com/7KsIexEtr4
— Farhan (@fnhindustani) May 28, 2026
साहित्य जगत ने जताया गहरा शोक
बशीर बद्र साहब के निधन पर साहित्य और गजल की दुनिया के दिग्गजों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने शोक जताते हुए कहा कि बशीर साहब के जाने से गजल की दुनिया में जो खालीपन आया है, उसे कभी भरा नहीं जा सकता। वह मेरे बहुत अजीज दोस्त थे। साल 1970 से लेकर जब तक वह सक्रिय रहे, हमने देश और विदेश के अनगिनत मुशायरों में एक साथ मंच साझा किया। अपनी बेहतरीन शायरी और अच्छे व्यवहार से उन्होंने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। आज हमारी गजल की दुनिया का एक बड़ा सितारा सो गया है।
वहीं मशहूर शायर अंजुम बाराबंकी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि नई गजल के हवाले से बशीर बद्र पूरी दुनिया के सबसे बड़े शायर थे। गजल के क्षेत्र में नए ट्रेंड स्थापित करने वालों में बशीर साहब का नाम सबसे ऊपर आता है।
बशीर बद्र के कुछ ऐसे शेर जो अमर हो गए
बशीर साहब आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादों के उजाले उनकी गजलों के रूप में हमेशा जिंदा रहेंगे। उनके कुछ बेहद लोकप्रिय शेर आज भी लोगों के दिलों में धड़कते हैं:
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों
अगर तलाश करूं कोई मिल ही जाएगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा
बशीर बद्र साहब सिर्फ़ एक शायर नहीं थे,वो मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और इंसानी एहसासों की आवाज़ थे, दिलों के अल्फ़ाज़ का ये मुसाफ़िर भले ही चला गया हो,मगर उसकी शायरी हमेशा ज़िंदा रहेगी, अलविदा बशीर बद्र साहब… 🌹
— Vikas Saxena-News18 (@vikasnews18) May 28, 2026
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी. pic.twitter.com/ItNBWn82c4
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
बशीर बद्र साहब की शायरी आने वाले हर दौर में मोहब्बत, मानवीय मूल्यों, तहजीब और इंसानियत की गवाही देती रहेगी। वह भले ही शारीरिक रूप से विदा हो गए हैं, लेकिन अपनी कालजयी रचनाओं के जरिए वह हमेशा अदब प्रेमियों के दिलों में जिंदा रहेंगे।

