मोदी की पाकिस्तान नीति, बदले वैश्विक समीकरण
Saif Khalid

कभी दुनिया में पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग थलग करने का दावा करने वाली भारत की नीति अब नए सवालों के घेरे में दिखाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका, चीन और खाड़ी देशों के लिए अहम साझेदार बनकर उभरा है। दूसरी ओर भारत और अमेरिका के रिश्तों में कुछ मुद्दों पर खिंचाव की चर्चा तेज हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दक्षिण एशिया की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही और भारत पाकिस्तान संबंधों को लेकर पुरानी रणनीतियां नए दौर में अलग असर दिखा रही हैं।
साल 2016 में उरी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा में कहा था कि भारत पाकिस्तान को दुनिया में अलग थलग करने में सफल रहा है और इस प्रयास को और तेज किया जाएगा। उस समय भारत की नीति साफ दिख रही थी। आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरना और वैश्विक समर्थन हासिल करना।
कई वर्षों तक ऐसा लगा भी कि भारत की रणनीति असर दिखा रही है। अमेरिका से लेकर यूरोपीय देशों तक पाकिस्तान पर दबाव बना। संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद के मुद्दे उठे। आर्थिक संकट और सुरक्षा चुनौतियों के बीच पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि कमजोर हुई। लेकिन बीते एक साल में हालात कुछ बदले हुए नजर आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद पाकिस्तान ने तेजी से अपनी कूटनीतिक स्थिति मजबूत की। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के नेतृत्व के बीच बढ़ती नजदीकियां चर्चा का विषय बनीं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की व्हाइट हाउस यात्राओं ने भी इस बहस को हवा दी कि क्या वॉशिंगटन फिर से इस्लामाबाद को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखने लगा है।
भारत पाकिस्तान युद्ध जैसे हालात पिछले साल उस समय बने जब जम्मू कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान की सीमा के भीतर कथित आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की। इसके बाद दोनों देशों के बीच मिसाइल, ड्रोन और लड़ाकू विमानों के इस्तेमाल तक हालात पहुंच गए। तनाव कई दिनों तक जारी रहा।
इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम संभव हो सका। पाकिस्तान ने खुलकर ट्रंप की भूमिका की सराहना की। वहीं भारत ने सार्वजनिक तौर पर इस दावे को स्वीकार नहीं किया और कहा कि संघर्ष विराम दोनों देशों के बीच बातचीत से हुआ।
यहीं से नई बहस शुरू हुई। कुछ विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अमेरिका के रिश्तों में इस मुद्दे ने असहजता पैदा की। हालांकि भारत लगातार यह दोहराता रहा कि कश्मीर और पाकिस्तान से जुड़े मामले द्विपक्षीय हैं और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार नहीं की जाएगी।
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप कई बार सार्वजनिक मंचों पर यह दोहरा चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष रोका। उन्होंने यहां तक कहा कि दक्षिण एशिया में बड़ा युद्ध टल गया। इस बयानबाजी ने नई दिल्ली को असहज किया क्योंकि भारत लंबे समय से कश्मीर पर किसी तीसरे देश की भूमिका से दूरी बनाकर चलता रहा है।
उधर पाकिस्तान ने इस मौके को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। चीन के साथ उसकी पुरानी रणनीतिक साझेदारी पहले से मजबूत थी। अब खाड़ी देशों और अमेरिका के साथ रिश्तों में भी तेजी दिखाई देने लगी। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सुरक्षा सहयोग को लेकर चर्चा तेज हुई। वहीं चीन ने पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को “अटूट” बताया।
विश्लेषकों का कहना है कि चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, रक्षा साझेदारी और क्षेत्रीय सुरक्षा ने दोनों देशों को और करीब ला दिया है। भारत पाकिस्तान तनाव के दौरान पाकिस्तान द्वारा चीनी रक्षा प्रणाली के इस्तेमाल ने भी दुनिया का ध्यान खींचा।
भारत की विदेश नीति पर चर्चा करते हुए कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि नई दिल्ली ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क को लगभग ठंडे बस्ते में डाल दिया। 2016 के बाद भारत ने पाकिस्तान की मेजबानी वाले शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया। इसके बाद से सार्क की बैठकें लगभग बंद हैं। भारत ने BIMSTEC जैसे मंचों को बढ़ावा देने की कोशिश की, लेकिन वह सार्क जैसा प्रभाव नहीं बना सका।
भारत के पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को लेकर भी बहस जारी है। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद पाकिस्तान और ढाका के बीच रिश्ते सुधरने की खबरें सामने आईं। मालदीव और कुछ अन्य पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों में भी उतार चढ़ाव देखने को मिला।
हालांकि दूसरी तरफ भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, बड़ी बाजार क्षमता और रणनीतिक महत्व अब भी उसे दुनिया की प्रमुख ताकतों के लिए अहम बनाते हैं। अमेरिका और भारत के बीच व्यापार 200 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है। रक्षा सहयोग, तकनीक, सेमीकंडक्टर और इंडो पैसिफिक रणनीति में दोनों देश साथ काम कर रहे हैं।
इसके बावजूद कुछ मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं। अमेरिकी टैरिफ नीति, रूस से तेल खरीद, ईरान से संबंध और व्यापार असंतुलन जैसे विषयों ने दोनों देशों के बीच बातचीत को जटिल बनाया। हाल के महीनों में अमेरिकी प्रशासन ने भारत पर व्यापारिक दबाव भी बढ़ाया।
एक और बड़ा बदलाव भारत की पश्चिम एशिया नीति में देखा गया। पहले भारत फिलिस्तीन के समर्थन के लिए जाना जाता था। लेकिन पिछले वर्षों में इजराइल के साथ उसके संबंध तेजी से मजबूत हुए। प्रधानमंत्री मोदी और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नजदीकी भी कई बार चर्चा में रही।
कुछ विश्लेषक मानते हैं कि गाजा युद्ध और ईरान संकट के दौर में भारत की यह नीति खाड़ी देशों के बीच संतुलन साधने की चुनौती लेकर आई। हालांकि भारत अब भी सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों के साथ मजबूत आर्थिक रिश्ते बनाए हुए है।
भारत के भीतर सामाजिक माहौल को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा होती रही है। अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दे, सांप्रदायिक तनाव और इस्लामोफोबिया की बहस कई बार वैश्विक सुर्खियों में आई। पाकिस्तान ने इन मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश की। इस्लामोफोबिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में अभियान भी इसी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना गया।
हालांकि भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि देश का लोकतंत्र मजबूत है और सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। नई दिल्ली का तर्क है कि बाहरी शक्तियां भारत के आंतरिक मामलों पर अनावश्यक टिप्पणी करती हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे अहम सवाल कश्मीर को लेकर बना हुआ है। सुरक्षा, राजनीतिक अधिकार और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे अब भी संवेदनशील बने हुए हैं। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद की कमी तनाव को और बढ़ाती है।
हाल के महीनों में कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों और कूटनीतिज्ञों की बैक चैनल बैठकों की खबरों ने उम्मीद जगाई है कि दोनों देशों के बीच बातचीत फिर शुरू हो सकती है। कुछ वरिष्ठ रणनीतिक विशेषज्ञों ने भी संवाद बहाल करने की जरूरत बताई है।
फिलहाल इतना साफ है कि दक्षिण एशिया की राजनीति तेजी से बदल रही है। भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी अपनी कूटनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में हैं। पाकिस्तान के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय संपर्क और भारत अमेरिका संबंधों में नए उतार चढ़ाव ने बहस को और गहरा कर दिया है।
लेकिन एक बात पर लगभग सभी विशेषज्ञ सहमत दिखते हैं। स्थायी शांति का रास्ता संवाद से होकर जाता है। भारत पाकिस्तान संबंधों में तनाव कम करना सिर्फ दोनों देशों के लिए नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए जरूरी माना जा रहा है।
Saif Khalid is Explainers Editor at aljazeera.com.
(यह लेखक के विचार हैं. मुस्लिम नाउ इसका समर्थन नहीं करता.)

