कश्मीर में ईद की नमाज रोकने पर मीरवाइज नाराज़
श्रीनगर:
कश्मीर में ईद की नमाज को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में शुक्रवार के खुत्बे के दौरान मीरवाइज ए कश्मीर डॉ. मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने ईदगाह और जामा मस्जिद में ईद की नमाज पर लगातार लग रही पाबंदियों को लेकर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, बल्कि यह है कि लोग इन हालात को सामान्य मानने लगें।
शुक्रवार को बड़ी संख्या में नमाजियों को संबोधित करते हुए मीरवाइज ने कहा कि इस साल भी, पिछले वर्षों की तरह, श्रीनगर ईदगाह और जामा मस्जिद में ईद की सामूहिक नमाज की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक आयोजन का सवाल नहीं है, बल्कि लोगों की धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक परंपराओं और सामूहिक अस्तित्व का भी मुद्दा है।
मीरवाइज ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी समाज के लिए सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है, जब असामान्य चीजें धीरे धीरे सामान्य दिखाई देने लगती हैं। उन्होंने कहा कि अगर साल दर साल लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होकर इबादत करने का अधिकार नहीं मिलता, तो नई पीढ़ी इसे सामान्य समझने लगती है। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ईद की सुबह एक ऐतिहासिक ईदगाह का खामोश रहना सामान्य नहीं है। एक ऐसी जामा मस्जिद का बंद रहना, जहां सदियों से इबादत होती रही हो, सामान्य नहीं कहा जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि किसी समुदाय को उसकी पुरानी धार्मिक परंपराओं से दूर करना एक गंभीर विषय है, जिस पर सोचने की जरूरत है।
कश्मीर में ईद की नमाज पर पाबंदी का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। खासकर श्रीनगर की जामा मस्जिद और ईदगाह में सामूहिक नमाज की अनुमति को लेकर हर साल बहस छिड़ती रही है। सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई बार प्रशासन ने बड़ी धार्मिक सभाओं पर रोक लगाई है। लेकिन दूसरी तरफ धार्मिक संगठनों और स्थानीय लोगों का कहना रहा है कि यह लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता और आस्था से जुड़ा विषय है।
.@MirwaizKashmir Raises Concern Over Growing Normalisation of Restrictions on Religious Rights
— Mirwaiz Manzil-Office of Mirwaiz-e-Kashmir (@mirwaizmanzil) May 29, 2026
Says Elected Govt Cannot Remain Silent Spectators When People’s Rights And Institutions Are Under Assault
Asks What Course a People Must Chart When Their Faith, Traditions and… pic.twitter.com/y9xbIU0ylM
अपने बयान में मीरवाइज ने केवल प्रतिबंधों पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि बढ़ती खामोशी को भी चिंता का कारण बताया। उन्होंने कहा कि लोगों की अभिव्यक्ति के रास्ते पहले से सीमित हैं। डर, गिरफ्तारियां, पाबंदियां और दबाव जैसी परिस्थितियां मौजूद हैं। इसके बावजूद पूरी तरह चुप रहना कोई समाधान नहीं हो सकता।
उन्होंने विशेष रूप से उन जनप्रतिनिधियों का जिक्र किया जिन्हें जनता ने चुना है। मीरवाइज ने कहा कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार या प्रतिनिधि केवल दर्शक बनकर नहीं बैठ सकते। अगर धार्मिक संस्थाओं और लोगों के अधिकारों पर सवाल उठ रहे हैं, तो उन्हें अपनी आवाज उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल मजबूरी जताना पर्याप्त नहीं है।
उनका कहना था कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली परीक्षा तब होती है, जब बुनियादी अधिकारों और जनता की गहरी भावनाओं से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं। आसान विषयों पर प्रतिक्रिया देना अलग बात है, लेकिन जब धार्मिक स्वतंत्रता, पहचान और परंपराओं की बात हो, तब संस्थाओं की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
मीरवाइज ने कहा कि लगातार ईद की नमाज पर लगने वाली रोक केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है। यह लोगों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्या किसी समाज की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान का सम्मान किया जाएगा, या उससे उम्मीद की जाएगी कि वह हर नई पाबंदी को चुपचाप स्वीकार करता रहे।
उन्होंने कहा कि यह मामला केवल नमाज का नहीं, बल्कि “हमारे एक समाज के रूप में अस्तित्व” का भी है। यही कारण है कि इस पर गंभीर चर्चा और सामूहिक सोच की जरूरत है। उन्होंने लोगों के सामने सवाल रखा कि ऐसे हालात में आगे का रास्ता क्या होना चाहिए।
हालांकि, अपने पूरे संबोधन में मीरवाइज ने संयम और धैर्य की बात भी की। उन्होंने लोगों से कहा कि निराशा को हावी न होने दें। इस्लाम उम्मीद और सब्र का संदेश देता है। मुश्किल हालात में भी भरोसा और समझदारी बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि कश्मीर की धरती का इतिहास इस बात का गवाह है कि यहां कई मुश्किल दौर आए, लेकिन लोगों ने अपनी धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं को अपने दिलों में जिंदा रखा। यही वजह है कि तमाम चुनौतियों के बावजूद पहचान और परंपराएं खत्म नहीं हुईं।
मीरवाइज ने कहा कि जब तक लोगों के भीतर आस्था जिंदा है, तब तक कोई भी पाबंदी उसे मिटा नहीं सकती। उन्होंने अपील की कि लोग अपनी धार्मिक परंपराओं, मूल्यों और संस्थाओं को समझदारी और धैर्य के साथ सुरक्षित रखने की कोशिश करें।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कश्मीर में धार्मिक स्वतंत्रता, जामा मस्जिद श्रीनगर, ईदगाह नमाज, मीरवाइज उमर फारूक बयान, कश्मीर धार्मिक अधिकार और ईद नमाज पाबंदी जैसे मुद्दे फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी इस बयान को गंभीरता से देखा जा रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में धार्मिक आयोजनों से जुड़े फैसले अक्सर सामाजिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में संवाद, विश्वास और संवेदनशीलता को बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।
अपने संबोधन के अंत में मीरवाइज ने लोगों के लिए दुआ की। उन्होंने कहा कि अल्लाह लोगों को सही रास्ता दिखाए, उन्हें मजबूती दे और उनके ईमान, मूल्यों और संस्थाओं की हिफाजत करने की तौफीक अता करे। उन्होंने कहा कि कठिन समय में भी उम्मीद और एकता ही सबसे बड़ी ताकत होती है।

