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ईरान अमेरिका समझौते पर सस्पेंस, ट्रंप ने जताई उम्मीद

वॉशिंगटन/दुबई

करीब तीन महीने से जारी ईरान अमेरिका संघर्ष के बीच एक बड़े कूटनीतिक घटनाक्रम ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता बहुत जल्द हो सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि सप्ताहांत तक दोनों देश एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं जिससे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दोबारा पूरी तरह खुल जाएगा।

हालांकि ट्रंप के इस दावे के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने साफ कर दिया कि अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। तेहरान का कहना है कि बातचीत में काफी प्रगति हुई है, लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी भी विचार चल रहा है।

अगर यह समझौता होता है तो इसे हाल के वर्षों की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जाएगा। इससे न केवल मध्य पूर्व में जारी तनाव कम हो सकता है बल्कि वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि वार्ता के दस्तावेज का बड़ा हिस्सा तैयार हो चुका है। कई बिंदुओं पर सहमति भी बन गई है। लेकिन ईरान अपनी मूल शर्तों से पीछे नहीं हटेगा।

उन्होंने कहा कि यह बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामला है। इस पर अभी संबंधित संस्थाएं विचार कर रही हैं। अंतिम निर्णय होने तक किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

दूसरी तरफ व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने काफी आत्मविश्वास दिखाया। उन्होंने कहा कि युद्ध को समाप्त करने के लिए एक शानदार समझौता तैयार हो चुका है। उनके अनुसार समझौते पर हस्ताक्षर होते ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज आधिकारिक रूप से व्यापारिक जहाजों के लिए पूरी तरह खोल दिया जाएगा।

ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है तो उन्होंने कहा कि उन्हें मिली जानकारी के अनुसार जवाब सकारात्मक है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता रहा है। फरवरी के अंत में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में संघर्ष तेज हो गया था। इसके बाद दोनों पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ कई सैन्य कार्रवाई की।

युद्ध का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। हजारों लोगों की जान गई। तेल की कीमतों में भारी उछाल आया। दुनिया भर में ऊर्जा संकट की आशंकाएं बढ़ीं। कई देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ा।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस पूरे संकट का सबसे अहम केंद्र बन गया। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। जब भी यहां तनाव बढ़ता है, वैश्विक बाजारों में हलचल मच जाती है। निवेशक चिंतित हो जाते हैं और तेल के दाम बढ़ने लगते हैं।

इसी वजह से ट्रंप प्रशासन इस मार्ग को सुरक्षित और खुला रखने को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहा है।

हालांकि समझौते की राह अभी आसान नहीं दिख रही। अमेरिका लगातार यह मांग करता रहा है कि ईरान किसी भी हालत में परमाणु हथियार विकसित न करे। ट्रंप ने एक बार फिर दोहराया कि प्रस्तावित समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।

ईरान लंबे समय से इस आरोप को खारिज करता रहा है। उसका कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उपयोग के लिए है।

ईरान की मांगें भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। तेहरान चाहता है कि उस पर लगाए गए अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं। विदेशों में जमे अरबों डॉलर की ईरानी संपत्तियां वापस की जाएं। साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसके अधिकार और सुरक्षा हितों को भी स्वीकार किया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि यही वे मुद्दे हैं जिन पर अंतिम सहमति बनना सबसे कठिन है।

इस बीच युद्ध पूरी तरह रुका नहीं है। हाल के दिनों में दोनों पक्षों के बीच हमले और जवाबी हमले जारी रहे हैं। अमेरिकी सेना ने दावा किया कि उसने होर्मुज क्षेत्र में ईरानी ड्रोन को मार गिराया। इसके जवाब में ईरान समर्थित बलों ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया।

बहरीन के अधिकारियों के अनुसार ईरानी ड्रोन के मलबे के गिरने से एक बच्ची घायल हो गई और कई मकानों को नुकसान पहुंचा। इससे स्पष्ट है कि संघर्ष का प्रभाव पूरे खाड़ी क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है।

अमेरिका के भीतर भी यह युद्ध राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। बढ़ती तेल कीमतों और महंगे ईंधन से आम अमेरिकी मतदाता नाराज हैं। कई सर्वेक्षणों में ट्रंप की लोकप्रियता पर असर दिखाई दिया है। रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं को डर है कि यदि युद्ध लंबा खिंचा तो आगामी मध्यावधि चुनावों में इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

दूसरी ओर ट्रंप पर अपनी ही पार्टी के उन नेताओं का दबाव भी है जो ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की मांग करते हैं। वे चाहते हैं कि किसी भी समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पूरी तरह रोक सुनिश्चित की जाए।

इजराइल की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण बनी हुई है। ट्रंप ने दावा किया है कि क्षेत्र के कई देशों ने इस समझौते को समर्थन दिया है। इनमें इजराइल, सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।

हालांकि इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने स्पष्ट किया कि इजराइल इस समझौते का प्रत्यक्ष पक्ष नहीं है। फिर भी नेतन्याहू ने ट्रंप के उस प्रयास की सराहना की है जिसमें ईरान की परमाणु क्षमता, मिसाइल उत्पादन और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने की बात शामिल है।

मध्य पूर्व के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह समझौता सफल होता है तो इससे पूरे क्षेत्र की राजनीति बदल सकती है। तेल बाजार स्थिर हो सकता है। निवेशकों का भरोसा लौट सकता है। साथ ही कई महीनों से जारी सैन्य तनाव में भी कमी आ सकती है।

फिलहाल दुनिया की निगाहें तेहरान और वॉशिंगटन पर टिकी हैं। ट्रंप इसे लगभग तय समझौता बता रहे हैं। वहीं ईरान अंतिम मंजूरी से पहले सतर्क रुख अपनाए हुए है।

आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह केवल कूटनीतिक उम्मीद है या वास्तव में मध्य पूर्व को नई दिशा देने वाला ऐतिहासिक समझौता।

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