असली राष्ट्रवाद क्या है? अमेरिका-ईरान युद्ध विराम समझौते से भारत के लिए बड़ा सबक
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नौशाद अख्तर, मुस्लिम नाउ विशेष
भू-राजनीतिक मोर्चे पर एक बेहद ऐतिहासिक घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पिछले 111 दिनों से जारी भीषण सैन्य संघर्ष आखिरकार एक बड़े ऐतिहासिक समझौते के साथ थम गया है। फ्रांस के वर्साय पैलेस में जी-7 (G7) शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तेहरान में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से 14 सूत्रीय ‘इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ (Islamabad MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस वैश्विक शांति समझौते के नफे-नुकसान को लेकर जहां दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञ और भू-राजनीतिक विश्लेषक तमाम कयास लगा रहे हैं, वहीं इस भीषण संकट के बाद ईरान के नवनियुक्त सुप्रीम लीडर (सर्वोच्च नेता) अयातुल्ला सैयद मुज्तबा खामेनेई का राष्ट्र के नाम संदेश वैश्विक मीडिया में चर्चा का केंद्र बन गया है।
मुज्तबा खामेनेई के इस ऐतिहासिक संबोधन को डिकोड करने में दुनिया भर के बड़े-बड़े राजनीतिक थिंक-टैंक जुट गए हैं। लेकिन भारत के आंतरिक सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य के नजरिए से देखा जाए, तो यह संदेश उन लोगों के लिए एक बहुत बड़ा सबक है जो राष्ट्रवाद की आड़ में नफरत फैलाते हैं और अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों से हर बात पर उनकी देशभक्ति का प्रमाण मांगते हैं।
मुज्तबा खामेनेई का संदेश और राष्ट्रवाद की सच्ची परिभाषा
ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई ने अपने इस राष्ट्र के नाम संबोधन में दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि असली राष्ट्रवाद क्या होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची देशभक्ति केवल नारों में नहीं, बल्कि संकट के समय तमाम आंतरिक और वैचारिक मतभेदों को भुलाकर देश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने में है। उन्होंने अपने ऐतिहासिक संदेश में एक जगह बहुत ही भावुक और जिम्मेदार लहजे में लिखा:
“इस क्षण से, हम (यानी आप, गौरवशाली राष्ट्र) और यह विनम्र सेवक, उक्त शर्तों के पूरा होने की प्रतीक्षा करेंगे।”
यह पंक्तियां साफ दर्शाती हैं कि किसी देश के शीर्ष नेतृत्व के लिए उसका राष्ट्र और उसके नागरिक कितने सर्वोपरि होते हैं। यहाँ तक कि पतंजलि आयुर्वेद के संस्थापक बाबा रामदेव ने भी अपने एक हालिया पॉडकास्ट में ईरानियों के इस जज्बे की खुलकर तारीफ की है। उन्होंने उल्लेख किया था कि ईरान के लोगों में अपने देश के प्रति प्रेम और राष्ट्रवाद किसी भी अन्य देश के लिए एक मिसाल है। वास्तव में, दुनिया के किसी भी मुल्क को यह सीखना चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्र से अटूट, अगाध और निस्वार्थ प्रेम कैसे किया जाता है।
भारतीय समाज के लिए एक गंभीर आत्मनिरीक्षण
ईरान के इस संकटकालीन राष्ट्रवाद की तुलना अगर भारत की वर्तमान आंतरिक स्थिति से की जाए, तो कई गंभीर और कड़वे सच सामने आते हैं। हमारे देश में अक्सर देखने को मिलता है कि खुद को स्वघोषित राष्ट्रवादी कहने वाले कुछ दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी तत्व बात-बात पर देश के अल्पसंख्यक वर्ग (मुसलमानों) को निशाना बनाते हैं। कभी उनकी दुकानों, कभी उनके मकानों, तो कभी उनके धार्मिक स्थलों, जैसे मस्जिदों और मजारों को निशाना बनाने या उन्हें ढहाने का बहाना ढूंढा जाता है।
इसके विपरीत, ईरान का उदाहरण देखिए—अमेरिका और इजरायल जैसी महाशक्तियों के साथ चले इतने लंबे और खूनी युद्ध के दौरान भी किसी भी ईरानी नागरिक ने अपने देश के भीतर मौजूद किसी चर्च या किसी अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थल पर हमला नहीं किया। युद्ध के समय भी वहां आंतरिक सांप्रदायिक सौहार्द पूरी तरह से कायम रहा।
एक बड़ा अंतर: भारत में वैश्विक संकटों का असर घरेलू राजनीति पर तुरंत देखने को मिलता है। जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के कारण कच्चे तेल और रसोई गैस की कीमतों में वैश्विक स्तर पर संकट गहराया, तो हमारे यहां कई लोग असलियत को समझे बिना सड़कों पर उतर आए। विपक्षी दलों और राजनीतिक एजेंडों के बहकावे में आकर सोशल मीडिया पर देश विरोधी या उग्र बयानबाजी शुरू हो गई। संकट के समय एकजुट रहने के बजाय हम आंतरिक मोर्चे पर ही बिखरने लगे। यह उस राष्ट्रवाद पर एक बड़ा सवालिया निशान है, जो केवल अनुकूल परिस्थितियों में ही देशभक्ति का दम भरता है।
संकट के बावजूद नहीं डिगा ईरानियों का हौसला
अमेरिका और इजरायल ने युद्ध के दौरान ईरान की धरती पर हजारों टन बारूद बरसाया। अमेरिकी हवाई हमलों में ईरान के मिनाब (Minab) शहर में एक स्कूल पर गिरे बम के कारण 150 से अधिक निर्दोष स्कूली बच्चियों की मौत हो गई, जो इस युद्ध की सबसे दर्दनाक त्रासदियों में से एक थी। इतनी बड़ी मानवीय क्षति, आर्थिक नाकेबंदी और डॉलर के मुकाबले ईरानी मुद्रा (Rial) के पूरी तरह जमींदोज हो जाने के बावजूद ईरानी जनता विचलित नहीं हुई।
अमेरिका की रणनीति यह थी कि शीर्ष सैन्य अधिकारियों और अयातुल्ला अली खामेनेई की शहादत के बाद ईरानी जनता आंतरिक बगावत कर देगी और सड़कों पर अपनी ही सरकार के खिलाफ उतर आएगी। लेकिन ईरान के नागरिकों ने सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बजाय राष्ट्रीय एकजुटता को चुना। युद्ध के चरम काल में भी वहां के स्कूलों में पढ़ाई सामान्य रूप से चलती रही। यहाँ तक कि ईरानी सैनिक दुश्मन के मिसाइल हमलों के बीच मोर्चे पर डटे रहे और देश के विदेश मंत्री तथा वर्तमान राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान जैसे शीर्ष नेता बेहद सादगी से आम जनता के बीच होटलों में खाना खाते और अस्पतालों में सर्जरी करते हुए दिखाई दिए। नेतृत्व की इसी सादगी और जनता के अटूट भरोसे ने ईरान को इस युद्ध में टिके रहने की ताकत दी।
✉️ Cikakken Saƙon Jagoran Juyin Juya Halin Musulunci zuwa ga Al'ummar Iran Game da Yarjejeniyar Fahimtar Juna Tsakanin Shugabannin Iran da Amurka#Iran #MujtabaKhamenei #Khamenei pic.twitter.com/0qtKPV9ik2
— Ayatullah Sayyid Mujtaba Khamene'i |Hausa (@ha_mkhamenei) June 18, 2026
इजरायल में मचा आंतरिक घमासान: नेतन्याहू की सत्ता पर संकट
इस शांति समझौते के बाद जहां ईरान में एक राहत और राष्ट्रीय गौरव का माहौल है, वहीं इजरायल के भीतर एक बहुत बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया है। इस 14 सूत्रीय समझौते (Islamabad MoU) के तहत अमेरिका ईरान पर लगे अपने कड़े प्रतिबंधों को हटाने, नौसैनिक नाकेबंदी को खत्म करने और ईरान के पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर के अंतरराष्ट्रीय निवेश कोष को हरी झंडी देने जा रहा है। इसके बदले में ईरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को वाणिज्यिक जहाजों के लिए फिर से खोल रहा है।
इस समझौते को इजरायल के सैन्य और रणनीतिक विशेषज्ञ अपनी बहुत बड़ी हार मान रहे हैं। उनका मानना है कि इजरायल को इस युद्ध से भारी रणनीतिक नुकसान हुआ है। इसके परिणामस्वरूप तेल अवीव की सड़कों पर बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कयास है कि आगामी चुनावों में नेतन्याहू की सत्ता पूरी तरह से हाथ से जा सकती है।
विडंबना यह है कि इजरायली समाज इस मुसीबत और बदलाव की घड़ी में एकजुट होने के बजाय एक-दूसरे पर तोहमत लगाने और राजनीतिक रोटियां सेकने में जुटा है। यह ठीक उसी स्थिति जैसी है जिससे बचने की नसीहत मुज्तबा खामेनेई अपने संदेश में दे रहे हैं।
✍️ Ayatullah Sayyid Mujtaba Khamene'i :
— Ayatullah Sayyid Mujtaba Khamene'i |Hausa (@ha_mkhamenei) June 17, 2026
💬 “Tsarin mamaya da danniya da ya gina sansanin soja mai suna Isra’ila, ba ya amincewa da wanzuwar Iran mai ƙarfi da cin gashin kanta a kan iyakar wannan yankin ƙasa na ƙarya da yaudara.”#Iran #MujtabaKhamenei #Khamenei #Falasdinu pic.twitter.com/eXHIuWlhUh
खामेनेई का साहसिक रुख: “दुश्मन के आगे नहीं झुकेंगे”
ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई ने अमेरिका के साथ हुए इस समझौते पर अपनी राय साझा करते हुए जो साहस दिखाया है, वह किसी भी देश के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक नजीर है। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि राष्ट्रपति पेजेशकियान और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद द्वारा देशहित और ‘प्रतिरोध मोर्चे’ (Resistance Front) के अधिकारों की रक्षा के ठोस आश्वासन के बाद ही उन्होंने इस समझौते को मंजूरी दी है।
खामेनेई ने अपने संदेश में बेहद कड़े शब्दों में कहा:
“हालाँकि, यह स्पष्ट है कि भविष्य में होने वाली आमने-सामने की बातचीत का अर्थ दुश्मन के रुख को स्वीकार करना नहीं होगा। यदि अमेरिकी पक्ष भविष्य में अत्यधिक और अनुचित मांगें करता है, तो ईरान उनके आगे कभी नहीं झुकेगा।”
इतने आत्मविश्वास और अडिग भरोसे के साथ देश का वही नेता दुनिया के सामने अपनी बात रख सकता है, जिसे यह पक्का विश्वास हो कि संकट के हर एक दौर में उसके देश की जनता जाति, धर्म और व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्र के सम्मान के लिए एक साथ खड़ी रहेगी।
निष्कर्ष: असली राष्ट्रवाद की सीख
नौशाद अख्तर का यह विशेष विश्लेषण भारतीय समाज और दुनिया भर के उन तमाम देशों के लिए एक आईना है, जो राष्ट्रवाद को केवल एक राजनीतिक हथियार या किसी विशेष समुदाय को प्रताड़ित करने का जरिया मानते हैं। असली राष्ट्रवाद किसी दूसरे धर्म के मजारों या मस्जिदों पर चढ़ने में नहीं है, न ही अपनों से उनकी वफादारी का सर्टिफिकेट मांगने में है। असली राष्ट्रवाद वह है जो संकट के समय देश के भीतर के हर एक नागरिक को सुरक्षा, सम्मान और एकजुटता का अहसास कराए। ईरान और अमेरिका के इस युद्ध विराम ने यह साबित कर दिया है कि हथियारों और बमबारी से जंग जीती या हारी जा सकती है, लेकिन किसी राष्ट्र की संप्रभुता और उसका अस्तित्व तभी सुरक्षित रहता है जब उसकी जनता आंतरिक रूप से एकजुट और अखंड हो।
FAQ (AEO और Google AI Overview के लिए)
प्रश्न: खामेनेई के संदेश की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?
उत्तर: संदेश में राष्ट्रीय एकता, संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया।
प्रश्न: ईरान की एकजुटता की चर्चा क्यों हो रही है?
उत्तर: संघर्ष और आर्थिक दबाव के बावजूद सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता को लेकर ईरान चर्चा में है।
प्रश्न: क्या ईरान-अमेरिका समझौते का असर पश्चिम एशिया पर पड़ेगा?
उत्तर: विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

