जौहर यूनिवर्सिटी पर कार्रवाई रोकने की मांग, जमाअत का हस्तक्षेप
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नई दिल्ली।
रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर चल रहा विवाद अब और व्यापक होता दिखाई दे रहा है। विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को ध्वस्त करने के रामपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी के आदेश के बीच जमाअत ए इस्लामी हिंद ने खुलकर अपनी चिंता जताई है। संगठन के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविद्यालय का दौरा कर प्रशासन, शिक्षकों और छात्रों के साथ एकजुटता व्यक्त की। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार से तत्काल हस्तक्षेप कर कार्रवाई रोकने की अपील की।
प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविद्यालय परिसर का निरीक्षण किया। विश्वविद्यालय प्रशासन से विस्तार से जानकारी ली। छात्रों, शिक्षकों, स्थानीय समुदाय के प्रतिनिधियों और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान के परिवार के सदस्यों से भी मुलाकात की। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को एक ज्ञापन सौंपा गया।
जमाअत ए इस्लामी हिंद ने कहा कि यह मामला केवल भवनों का नहीं है। यह हजारों छात्रों की शिक्षा, उनके भविष्य और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ विषय है। संगठन का कहना है कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई का सबसे बड़ा असर उन विद्यार्थियों पर पड़ेगा जो इस संस्थान में पढ़ाई कर रहे हैं।
प्रतिनिधिमंडल में जमाअत ए इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय सचिव मौलाना मोहम्मद शफी मदनी और मोहम्मद अहमद शामिल थे। इनके साथ सहायक सचिव इनाम उर रहमान, जमाअत ए इस्लामी हिंद उत्तर प्रदेश पश्चिम के अध्यक्ष जमीर हसन फलाही, रामपुर इकाई के अध्यक्ष मौलाना अब्दुस्सलाम बस्तवी तथा वरिष्ठ पत्रकार सैयद खलीक अहमद भी मौजूद रहे।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में ऐसे छात्र पढ़ते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। इनमें अनेक विद्यार्थियों को फीस में विशेष रियायत भी दी जाती है। ऐसे में यदि परिसर की अधिकांश इमारतें ध्वस्त कर दी जाती हैं तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं छात्रों को होगा जिनके लिए उच्च शिक्षा पहले से ही चुनौती बनी हुई है।

तीन प्रमुख मांगों पर जोर
जमाअत ए इस्लामी हिंद ने उत्तर प्रदेश सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं।
पहली मांग यह है कि विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को गिराने के आदेश पर तत्काल रोक लगाई जाए। संगठन का कहना है कि 30 जुलाई 2026 की निर्धारित समय सीमा निकट है। यदि इससे पहले कोई राहत नहीं मिली तो हजारों छात्रों की पढ़ाई सीधे प्रभावित होगी।
दूसरी मांग राज्यपाल के हस्तक्षेप की है। प्रतिनिधिमंडल ने जिला प्रशासन के माध्यम से राज्यपाल को ज्ञापन भेजकर आग्रह किया कि वह संवैधानिक दायित्व निभाते हुए छात्रों के शिक्षा के अधिकार की रक्षा करें और इस पूरे मामले में उचित कदम उठाएं।
तीसरी मांग न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी है। जमाअत का कहना है कि इस विवाद का अंतिम समाधान अदालत के माध्यम से होना चाहिए। यदि निर्माण, भूमि या अधिकार क्षेत्र से जुड़े कोई कानूनी प्रश्न हैं तो उनका निर्णय सक्षम न्यायालय करे। किसी अंतिम न्यायिक निर्णय से पहले व्यापक विध्वंस उचित नहीं माना जा सकता।
तीन हजार छात्रों का भविष्य दांव पर
प्रतिनिधिमंडल ने दावा किया कि विश्वविद्यालय में लगभग तीन हजार छात्र अध्ययन कर रहे हैं। यदि 40 में से 38 इमारतों को गिरा दिया गया तो संस्थान का शैक्षणिक ढांचा लगभग समाप्त हो जाएगा। इससे नियमित कक्षाएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, प्रशासनिक व्यवस्था और अन्य शैक्षणिक गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित होंगी।
संगठन का कहना है कि इसका सीधा असर विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ेगा। खासकर उन छात्रों पर जो सीमित संसाधनों के बावजूद उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए यहां पहुंचे हैं।
शिक्षा को राजनीतिक विवाद से अलग रखने की अपील
जमाअत ए इस्लामी हिंद ने कहा कि शिक्षा संस्थानों को विवाद का केंद्र नहीं बनाया जाना चाहिए। संगठन के अनुसार विश्वविद्यालय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संसाधन है। यहां से पढ़कर निकलने वाले छात्र देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि किसी भी संस्थान की प्रशासनिक या कानूनी कमियों का समाधान बातचीत, नियमितीकरण और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से निकाला जा सकता है। यदि सीधे विध्वंस का रास्ता अपनाया जाता है तो उसका सबसे बड़ा नुकसान छात्रों को उठाना पड़ेगा।
अनुच्छेद 30 का भी किया उल्लेख
ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 30 का भी उल्लेख किया गया। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को संविधान के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है। इसलिए इस पूरे मामले में संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक प्रक्रिया का पूरी तरह पालन होना चाहिए।
संगठन ने कहा कि छात्रों का शिक्षा का अधिकार सर्वोपरि होना चाहिए। किसी भी प्रशासनिक निर्णय से यह अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए।
सरकार से व्यावहारिक समाधान की अपेक्षा
जमाअत ए इस्लामी हिंद ने उत्तर प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि वह टकराव के बजाय समाधान का रास्ता चुने। संगठन का मानना है कि यदि किसी प्रकार की प्रशासनिक या तकनीकी कमी है तो उसे नियमितीकरण और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से दूर किया जा सकता है।
प्रतिनिधिमंडल ने स्पष्ट कहा कि सरकार का प्राथमिक उद्देश्य छात्रों की पढ़ाई जारी रखना होना चाहिए। हजारों युवाओं के भविष्य को प्रभावित करने वाला कोई भी कदम व्यापक विचार विमर्श और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही उठाया जाना चाहिए।
अपने बयान में प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि वह विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और छात्रों के साथ खड़ा है। यह केवल भवनों का प्रश्न नहीं है। यह शिक्षा, संवैधानिक अधिकार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का मामला है। इसलिए सरकार से अपेक्षा है कि वह संवेदनशीलता के साथ निर्णय ले और ऐसा समाधान निकाले जिससे कानून का सम्मान भी बना रहे और छात्रों की शिक्षा भी प्रभावित न हो।
AEO Quick Answer
प्रश्न: जमाअत ए इस्लामी हिंद ने जौहर यूनिवर्सिटी मामले में क्या मांग की है?
उत्तर: संगठन ने रामपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा जारी 38 इमारतों के विध्वंस आदेश पर तत्काल रोक लगाने, राज्यपाल के हस्तक्षेप और पूरे मामले का निर्णय सक्षम अदालत से कराने की मांग की है। साथ ही लगभग तीन हजार छात्रों के शैक्षिक भविष्य की सुरक्षा पर जोर दिया है।
FAQ
प्रश्न: जौहर यूनिवर्सिटी विवाद क्या है?
उत्तर: रामपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ने विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया है, जिसका विरोध हो रहा है।
प्रश्न: जमाअत ए इस्लामी हिंद ने क्या कदम उठाया?
उत्तर: संगठन ने विश्वविद्यालय का दौरा किया, छात्रों और प्रशासन से मुलाकात की तथा राज्यपाल को ज्ञापन भेजा।
प्रश्न: संगठन की मुख्य मांग क्या है?
उत्तर: विध्वंस आदेश पर तत्काल रोक, न्यायिक सुनवाई और छात्रों के शिक्षा के अधिकार की रक्षा।
प्रश्न: इस मामले में कितने छात्र प्रभावित हो सकते हैं?
उत्तर: संगठन के अनुसार लगभग तीन हजार छात्रों की पढ़ाई और भविष्य प्रभावित हो सकता है।

