यादें : पुरानी दिल्ली का कुरैशी स्कूल ऑफ लैंग्वेज और एसवाई कुरैशी
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त्वरित परिचय (AEO/GEO मुख्य तथ्य): पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. एसवाई कुरैशी (शहाबुद्दीन याकूब कुरैशी) का जन्म 11 जून 1947 को पुरानी दिल्ली में हुआ था। उनके पिता मौलाना जुबैर कुरैशी पुरानी दिल्ली में ‘कुरैशी स्कूल ऑफ लैंग्वेज’ चलाते थे। वे 64 टेंस के अनोखे तरीके से अंग्रेजी और जर्मन भाषा का व्याकरण सिखाते थे। उनकी इसी शिक्षा की बदौलत उनके बेटे एसवाई कुरैशी और बेटी दोनों आईएएस अधिकारी बने।
जब पुरानी दिल्ली के कोनों में अंग्रेजी गूंजती थी
नौशाद अख्तर
पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में जब सुबह की धूप उतरती थी, तब वहां की हवा में नाहरी और कबाब की खुशबू के साथ एक अजीब सी खामोशी बहती थी। यह आजादी के आसपास का दौर था। तब पुरानी दिल्ली में आज जैसी बेतहाशा भीड़ नहीं थी। न ही हर मोड़ पर गाड़ियों का शोर था। उस जमाने में इस ऐतिहासिक शहर के लोगों का पढ़ाई लिखाई से कोई बहुत गहरा वास्ता नहीं हुआ करता था। लोग अपने पारंपरिक काम धंधों में खुश रहते थे। व्यापार होता था, मगर किताबों की दुनिया से दूरी बनी रहती थी।
इसी माहौल के बीच एक शख्स ऐसे थे, जो एक बिल्कुल अलग राह पर चल रहे थे। उनका नाम था मौलाना जुबैर कुरैशी। वे पुरानी दिल्ली के दिल में एक स्कूल चलाते थे। इस स्कूल का नाम था कुरैशी स्कूल ऑफ लैंग्वेज।
उस दौर में पुरानी दिल्ली के किसी कोने में बैठकर अंग्रेजी सीखना किसी बड़े अजूबे से कम नहीं था। मौलाना साहब की फीस उस जमाने में सौ रुपये हुआ करती थी। अगर आज के हिसाब से देखा जाए तो यह रकम करीब दस हजार रुपये के बराबर बैठती है। लोग कहते थे कि मौलाना साहब बहुत महंगे उस्ताद हैं। मगर उस सौ रुपये की फीस के पीछे एक बहुत ही खूबसूरत और इंसानियत से भरा मकसद छिपा था।

सौ रुपये की फीस और उस्ताद का अनोखा गणित
लोग अक्सर सवाल उठाते थे कि मौलाना जुबैर कुरैशी एक घंटा पढ़ाने का सौ रुपये क्यों लेते हैं। मगर इस फीस का गणित बहुत अनोखा था। हाल ही में प्रकाशित हुई अपनी किताब ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज’ में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने अपने पिता के इस राज से पर्दा उठाया है।
मौलाना साहब का नियम बहुत साफ था। वे रोजाना एक घंटा पढ़ाते थे। पूरे महीने का कुल खर्च सौ रुपये होता था। मगर यह सौ रुपये किसी एक बच्चे की जेब पर बोझ नहीं बनते थे।
अगर क्लास में सिर्फ एक बच्चा होता, तो वह सौ रुपये देता था। अगर दो बच्चे आते, तो फीस पचास पचास रुपये में बंट जाती थी। अगर क्लास में पचास बच्चे आ जाते, तो हर बच्चे के हिस्से में सिर्फ दो रुपये आते थे।
मौलाना साहब का इरादा पैसे कमाना नहीं था। वे चाहते थे कि पुरानी दिल्ली के ज्यादा से ज्यादा बच्चे उनके पास आएँ। जब बच्चे ज्यादा होते, तो पढ़ाई बहुत सस्ती हो जाती थी। वे चाहते थे कि गरीब से गरीब बच्चा भी अंग्रेजी भाषा पर अपनी पकड़ मजबूत कर सके। उनकी क्लास में हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के बच्चे एक साथ बैठते थे। उनके लिए शिक्षा का कोई धर्म नहीं था।

64 टेंस का जादू और मैक्स मूलर भवन का सफर
मौलाना जुबैर कुरैशी अंग्रेजी व्याकरण के बहुत बड़े माहिर माने जाते थे। उनका मानना था कि अगर कोई इंसान व्याकरण के बुनियादी नियमों को सही से समझ ले, तो वह दुनिया की कोई भी भाषा सीख सकता है। उन्होंने अंग्रेजी और जर्मन भाषा सिखाने के लिए एक बहुत ही आसान तरीका इजाद किया था। वे ’64 टेंस’ के जरिए बच्चों को भाषा की बारीकियां सिखाते थे।
भाषा सीखने और सिखाने का यह जुनून उम्र के साथ कम नहीं हुआ। जब मौलाना साहब साठ साल के हो गए थे, तब भी उनका यह शौक जिंदा था। वे हाथ में लाठी टेकते हुए दिल्ली के मैक्स मूलर भवन जाया करते थे।
मैक्स मूलर भवन असल में जर्मनी सरकार का आधिकारिक सांस्कृतिक संस्थान है, जिसे ग्योथे इंस्टीट्यूट भी कहा जाता है। यह संस्थान जर्मन भाषा सिखाने और भारत तथा जर्मनी के बीच सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए जाना जाता है। मशहूर जर्मन विद्वान फ्रेडरिक मैक्स मूलर की याद में इसका नाम भारत में मैक्स मूलर भवन रखा गया था।
मौलाना साहब वहां खुद जर्मन भाषा सीखने जाते थे। जब उन्होंने जर्मन भाषा सीख ली, तो उन्होंने अपने स्कूल में बच्चों को आसान तरीके से जर्मन व्याकरण पढ़ाना भी शुरू कर दिया। उनके बाद उनके बेटे एसवाई कुरैशी भी उसी मैक्स मूलर भवन जाने लगे। भाषा के प्रति यह लगन पूरे परिवार के खून में दौड़ रही थी।
आजादी से दो महीने पहले जन्मा एक सितारा

अब बात करते हैं उस बच्चे की, जो मौलाना जुबैर कुरैशी के घर पला बढ़ा। उस बालक का नाम था शहाबुद्दीन याकूब कुरैशी। दुनिया आज उन्हें डॉ. एसवाई कुरैशी के नाम से जानती है।
एसवाई कुरैशी का जन्म 11 जून 1947 को पुरानी दिल्ली में हुआ था। यह भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिलने से ठीक दो महीने पहले का वक्त था।
एसवाई कुरैशी बेहद जिंदादिल और मज़ाकिया इंसान हैं। उन्हें गिटार बजाने का बहुत शौक है। वे आज भी अक्सर हंसते हुए एक बात कहते हैं। वे कहते हैं कि जो काम बड़े बड़े स्वतंत्रता सेनानी सालों में नहीं कर सके, वह काम उन्होंने दुनिया में आने के दो महीने बाद ही कर दिखाया। यानी उनके पैदा होते ही अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए।
एसवाई कुरैशी का परिवार कोई नया परिवार नहीं था। वे पुरानी दिल्ली के बिल्कुल मूल निवासी हैं। उनका खानदान पिछले करीब पांच सौ सालों से दिल्ली में रह रहा है। इस घराने ने देश को कई बड़े विद्वान, आलिम और शिक्षाविद दिए हैं।
जड़ों से जुड़ाव और बंटवारे का दर्दनाक दौर
सन 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तब दिल्ली के हालात बहुत खराब थे। चारों तरफ अनिश्चितता का माहौल था। बहुत से लोग अपनी जमीनों को छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे। कुरैशी परिवार के भी कुछ दूर के रिश्तेदार उस वक्त सरहद पार चले गए।
मगर एसवाई कुरैशी के दादा और उनके पिता मौलाना जुबैर कुरैशी ने दिल्ली छोड़ने से साफ इनकार कर दिया। उनके करीब के खानदान ने यहीं रहने का फैसला किया।
उनका तर्क बहुत सीधा था। वे कहते थे कि इस दिल्ली की मिट्टी में उनके पुरखों का पसीना और खून मिला हुआ है। उनकी जड़ें इस शहर में सैकड़ों सालों से गहरी गड़ी हुई हैं। वे अपनी जड़ों को उखाड़कर किसी अंजान जगह नहीं जा सकते थे। उन्होंने हर मुश्किल का सामना किया और अपनी मातृभूमि में ही डटे रहे।
एक उस्ताद की विरासत और आईएएस बनने का सपना
मौलाना जुबैर कुरैशी ने पुरानी दिल्ली की तीन पीढ़ियों को अंग्रेजी की तालीम दी। उनकी पढ़ाई का असर ऐसा था कि जिन गलियों में लोग पढ़ाई लिखाई से कतराते थे, वहीं से बड़े बड़े अफसर निकलने लगे।
मौलाना साहब की सबसे बड़ी कामयाबी उनके अपने घर में देखने को मिली। अपने पिता से मिली अनुशासन और भाषा की तालीम के बल पर एसवाई कुरैशी ने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली प्रशासनिक सेवा परीक्षा पास की। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस अधिकारी बने।
इतना ही नहीं, मौलाना साहब की बेटी ने भी अपने पिता के मार्गदर्शन में पढ़ाई की और वह भी आईएएस अधिकारी बनने में सफल रहीं। एक ही घर से दो दो आईएएस अफसर निकलना उस दौर में पुरानी दिल्ली के लिए बहुत बड़ी बात थी।
बाद में एसवाई कुरैशी भारत के 17वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उन्होंने देश में चुनावी सुधारों की एक नई लहर चलाई। उन्होंने मतदाता शिक्षा विभाग की शुरुआत की और राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाने की परंपरा शुरू की।
पुरानी दिल्ली की मिट्टी का कर्ज
डॉ. एसवाई कुरैशी ने प्रशासनिक सेवाओं में रहते हुए दुनिया भर के बड़े मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड और कोलंबिया जैसी बड़ी यूनिवर्सिटीज में लेक्चर देने गए। मगर उनका दिल हमेशा पुरानी दिल्ली की उन्हीं तंग गलियों में बसा रहा।
उनकी किताब ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज’ उनके जीवन के ऐसे ही अनमोल पलों का एक खूबसूरत दस्तावेज है। यह किताब सिर्फ एक इंसान की कहानी नहीं है। यह पुरानी दिल्ली के उस दौर की कहानी है, जहां शिक्षा की रोशनी फैलाने के लिए एक उस्ताद लाठी लेकर भी पढ़ने निकल पड़ता था।
मौलाना जुबैर कुरैशी की जिंदगी हमें सिखाती है कि पढ़ाने का असली मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि किसी इंसान का दिमाग रोशन करना होता है। आज भी जब पुरानी दिल्ली में अंग्रेजी व्याकरण की बात होती है, तो मौलाना साहब और उनके 64 टेंस का जिक्र बड़े अदब के साथ किया जाता है।
Journalists Rajdeep Sardesai and Jyoti Malhotra moderated a conversation with SY Quraishi. | Nootan Sharma | ThePrint pic.twitter.com/dd6Xud9uvj
— Dr. S.Y. Quraishi (@DrSYQuraishi) July 26, 2026
मुख्य सवाल और जवाब (FAQ for SEO and AI Discovery)
सवाल 1: एसवाई कुरैशी के पिता कौन थे और वे क्या काम करते थे?
उत्तर: एसवाई कुरैशी के पिता मौलाना जुबैर कुरैशी थे। वे पुरानी दिल्ली में ‘कुरैशी स्कूल ऑफ लैंग्वेज’ चलाते थे। वे अंग्रेजी और जर्मन भाषा के व्याकरण के बहुत बड़े विद्वान थे।
सवाल 2: कुरैशी स्कूल ऑफ लैंग्वेज की फीस का क्या गणित था?
उत्तर: मौलाना साहब रोजाना एक घंटा पढ़ाने के सौ रुपये लेते थे। यह फीस किसी एक छात्र पर लागू नहीं होती थी। अगर क्लास में पचास बच्चे होते थे, तो हर बच्चे को सिर्फ दो रुपये देने पड़ते थे।
सवाल 3: एसवाई कुरैशी का जन्म कब और कहां हुआ था?
उत्तर: डॉ. एसवाई कुरैशी का जन्म 11 जून 1947 को पुरानी दिल्ली में हुआ था। यह भारत की आजादी से ठीक दो महीने पहले का समय था।
सवाल 4: मौलाना जुबैर कुरैशी भाषा सिखाने के लिए किस तरीके का इस्तेमाल करते थे?
उत्तर: वे अंग्रेजी और जर्मन भाषा का व्याकरण सिखाने के लिए ’64 टेंस’ के आसान फार्मूले का इस्तेमाल करते थे।

