मेजर हमजा आरिफ को इंदौर ने नम आंखों से दी अंतिम विदाई
Table of Contents
इंदौर
इंदौर के रहने वाले मेजर हमजा आरिफ अब अपने शहर लौटे तो जरूर, लेकिन तिरंगे में लिपटकर। जैसलमेर में ड्यूटी से लौटते समय हुए सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी। रविवार को सेना के जवान उनका पार्थिव शरीर इंदौर लेकर पहुंचे। इसके बाद पूरे सैन्य सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई।
सैफी नगर से इमली बाजार स्थित शिया दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान तक निकली उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में शहरवासी शामिल हुए। रास्ते में घरों और दुकानों के बाहर लोग खड़े रहे। कई लोगों ने हाथ जोड़कर श्रद्धांजलि दी। कई ने सैल्यूट कर मेजर हमजा आरिफ को आखिरी सलाम किया।
राजबाड़ा पहुंचते ही माहौल और भावुक हो गया। सेना का वाहन वहां पहुंचा तो बड़ी संख्या में लोग पहले से मौजूद थे। लोगों ने भारत माता की जय और मेजर हमजा आरिफ अमर रहें के नारे लगाए। इसके बाद सैन्य वाहन अंतिम यात्रा लेकर इमली बाजार स्थित कब्रिस्तान पहुंचा।
कब्रिस्तान में सेना की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। धार्मिक रीति रिवाज के अनुसार नमाज और अन्य रस्मों के बाद मेजर हमजा आरिफ को सुपुर्द ए खाक किया गया।
एक महीने पहले ही हुई थी शादी
मेजर हमजा आरिफ की शादी करीब एक महीने पहले हुई थी। शादी की खुशियां अभी पूरी तरह थमी भी नहीं थीं कि परिवार में मातम छा गया।
उनके पिता फकरुद्दीन ने बताया कि 31 वर्षीय हमजा ने शादी के बाद कुछ दिन की छुट्टी बिताई थी। इसके बाद वह ड्यूटी पर लौट गए थे। करीब नौ साल से वह भारतीय सेना में सेवा दे रहे थे।
उन्होंने लेफ्टिनेंट के रूप में सैन्य सेवा शुरू की। इसके बाद कैप्टन बने और फिर मेजर के पद तक पहुंचे।
परिवार के लिए यह हादसा इसलिए भी ज्यादा पीड़ादायक है क्योंकि बेटे की शादी को अभी एक महीना ही हुआ था। घर में जिस जगह कुछ दिन पहले शादी की खुशियां थीं, वहां रविवार को लोगों की भीड़ और मातम था।
जैसलमेर में सड़क हादसे ने ली जान
मेजर हमजा आरिफ जैसलमेर में ड्यूटी पूरी करने के बाद दो अन्य अधिकारियों के साथ सैन्य वाहन से लौट रहे थे। देर रात थैयात सैन्य क्षेत्र के पास अचानक सड़क पर एक ऊंट आ गया।
बताया गया कि सेना की टाटा सफारी ऊंट से टकरा गई। टक्कर के बाद वाहन का संतुलन बिगड़ गया। गाड़ी सड़क पर काफी दूर तक घिसटती रही और कई बार पलट गई।
हादसा इतना गंभीर था कि मेजर हमजा आरिफ की जान चली गई। उनके साथ मौजूद दो लेफ्टिनेंट भी गंभीर रूप से घायल हुए। दोनों का सैन्य अस्पताल में उपचार चल रहा है।
इस हादसे में ऊंट की भी मौत हो गई।
हादसे की खबर इंदौर पहुंचते ही परिवार और परिचितों में शोक की लहर दौड़ गई। रविवार को जब तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर घर पहुंचा तो वहां मौजूद लोग भावुक हो गए।
सैफी नगर से शुरू हुई अंतिम यात्रा
मेजर हमजा आरिफ के पार्थिव शरीर को सबसे पहले सैफी नगर लाया गया। यहां धार्मिक रीति रिवाज के अनुसार नमाज अदा की गई।
इसके बाद सेना के वाहन में उनका पार्थिव शरीर अंतिम यात्रा के लिए रवाना हुआ। सैफी नगर से शुरू हुई यात्रा माणिकबाग पुल, कलेक्टर चौराहा, राजबाड़ा और सदर बाजार होते हुए इमली बाजार स्थित शिया दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान पहुंची।
अंतिम यात्रा के रास्ते में लोगों की भीड़ दिखाई दी। कुछ लोग घरों की छत और बालकनी से भी अंतिम दर्शन करते नजर आए। कई दुकानदारों ने अपनी दुकान के बाहर खड़े होकर उन्हें अंतिम सलाम किया।
किसी के हाथ में तिरंगा था तो कोई हाथ जोड़कर खड़ा था। सैन्य वाहन के गुजरते ही लोग सम्मान में सिर झुका रहे थे।
यह दृश्य इंदौर के लोगों के लिए भी भावुक करने वाला था।
राजबाड़ा पर गूंजे देशभक्ति के नारे
राजबाड़ा पर बड़ी संख्या में लोग मेजर हमजा आरिफ की अंतिम यात्रा का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही सेना का वाहन वहां पहुंचा, माहौल बदल गया।
भारत माता की जय और मेजर हमजा आरिफ अमर रहें के नारे गूंजने लगे। लोगों ने हाथ जोड़कर श्रद्धांजलि दी। कई लोगों ने सैन्य वाहन की ओर देखकर सैल्यूट किया।
इसके बाद अंतिम यात्रा इमली बाजार की ओर रवाना हुई।
मेजर हमजा आरिफ का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा था। उनके साथ सेना के जवान मौजूद थे। सैन्य अनुशासन और नागरिकों की भावनाओं के बीच यह अंतिम यात्रा आगे बढ़ती रही।
पत्नी ने तिरंगे को सीने से लगाया
मेजर हमजा आरिफ की अंतिम विदाई का सबसे भावुक पल उनकी पत्नी ज्योति अरोरा के पहुंचने पर आया।
ज्योति अपने पति को अंतिम बार देखने पहुंचीं। तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर के सामने खड़े होकर उन्होंने श्रद्धांजलि दी। उन्होंने सैन्य सम्मान में सलामी भी दी।
लेकिन भावनाएं उन पर भारी पड़ गईं। वह खुद को संभाल नहीं सकीं और फूट फूटकर रोने लगीं।
गार्ड ऑफ ऑनर के बाद सेना के अधिकारियों ने वह तिरंगा ज्योति अरोरा को सौंपा, जिसमें लिपटकर मेजर हमजा आरिफ आखिरी बार अपने घर लौटे थे।
ज्योति ने तिरंगे को अपने सीने से लगा लिया। वहां मौजूद लोगों के लिए यह बेहद भावुक क्षण था।
कुछ ही समय पहले इसी घर में शादी की खुशियां थीं। अब उसी घर से मेजर हमजा की अंतिम यात्रा निकली थी।
सेना के अधिकारियों ने दी श्रद्धांजलि
मेजर हमजा आरिफ की अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार में राजस्थान और मध्य प्रदेश से सेना के कई अधिकारी शामिल हुए।
कर्नल, लेफ्टिनेंट और मेजर रैंक के सैन्य अधिकारियों के अलावा बड़ी संख्या में बोहरा समुदाय के लोग, शहरवासी, रिश्तेदार और दोस्त भी मौजूद थे।
सेना के जवानों ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी। कब्रिस्तान में गार्ड ऑफ ऑनर के बाद धार्मिक परंपरा के अनुसार उन्हें सुपुर्द ए खाक किया गया।
इंजीनियरिंग के बाद चुनी सेना की राह
मेजर हमजा आरिफ के दोस्त हार्दिक ने उनकी पुरानी यादों को साझा किया। उन्होंने कहा कि जिस दोस्त के साथ कॉलेज के दिनों में पढ़ाई की, उसे इस तरह अंतिम विदाई देना बेहद दुखद है।
हार्दिक के मुताबिक, हमजा पढ़ाई में शुरू से ही तेज थे। उन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की थी। इसके बाद उनके पास करियर के कई रास्ते थे। लेकिन उन्होंने देश सेवा को चुना और भारतीय सेना में शामिल हो गए।
दोस्तों के समूह में वह सबसे पहले सेना की नौकरी में गए। उनकी मेहनत और अनुशासन को दोस्त लंबे समय से जानते थे।
हार्दिक ने कहा कि फ्रेंडशिप डे के दिन दोस्त की अंतिम विदाई देना उनके लिए बेहद पीड़ादायक है।
नौ साल की सैन्य सेवा के बाद जिंदगी का सफर थमा
मेजर हमजा आरिफ ने करीब नौ साल भारतीय सेना में सेवा की। लेफ्टिनेंट से शुरू हुआ उनका सैन्य सफर कैप्टन और फिर मेजर के पद तक पहुंचा।
उनके परिवार के लिए यह केवल एक बेटे या पति को खोने का दुख नहीं है। यह उस जवान को खोने का दर्द भी है जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा देश की सेवा में लगाया।
31 साल की उम्र में उनकी जिंदगी का सफर अचानक खत्म हो गया।
जैसलमेर में हुई सड़क दुर्घटना ने एक परिवार की खुशियां छीन लीं। इंदौर में रविवार को जब उनकी अंतिम यात्रा निकली तो यह केवल परिवार की विदाई नहीं थी। शहर के लोगों ने भी बड़ी संख्या में इसमें शामिल होकर अपने जवान को सम्मान दिया।
सैफी नगर से राजबाड़ा और फिर इमली बाजार तक रास्ते में खड़े लोगों की आंखों में दुख था। तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर आगे बढ़ता रहा। लोग सलाम करते रहे।
मेजर हमजा आरिफ अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी करीब नौ साल की सैन्य सेवा, देश के लिए चुना गया रास्ता और इंदौर में मिली अंतिम विदाई लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में रहेगी।
इंदौर शहर में उस समय सबकी आंखे गमगीन हो गई, जब शहीद मेजर हमज़ा आरिफ को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। मेजर हमज़ा आरिफ़ अभी एक महीने पहले ही शादी के बंधन में बंधे थे। कर्तव्य पथ पर अपना सर्वोच्च न्योछावर करने वाले मेजर हमज़ा आरिफ को सलाम। pic.twitter.com/mcHP3lrFgB
— Dr.Meraj Hussain (@drmerajhusain) August 3, 2026
मेजर हमजा आरिफ की कहानी एक नजर में
नाम: मेजर हमजा आरिफ
उम्र: 31 वर्ष
निवास: इंदौर, मध्य प्रदेश
सेवा: भारतीय सेना
सैन्य सेवा: करीब 9 वर्ष
पद: मेजर
शैक्षणिक योग्यता: इंजीनियरिंग
हादसा: जैसलमेर में सैन्य वाहन दुर्घटना
हादसे का कारण: सड़क पर अचानक ऊंट आने के बाद वाहन की टक्कर
परिवार: पत्नी ज्योति अरोरा और पिता फकरुद्दीन
शादी: हादसे से करीब एक महीने पहले
अंतिम यात्रा: सैफी नगर से इमली बाजार
अंतिम संस्कार: शिया दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान, इमली बाजार
सम्मान: पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई और गार्ड ऑफ ऑनर
सवाल जवाब
मेजर हमजा आरिफ कौन थे?
मेजर हमजा आरिफ इंदौर के रहने वाले भारतीय सेना के अधिकारी थे। उन्होंने करीब नौ साल सेना में सेवा की और लेफ्टिनेंट से मेजर के पद तक पहुंचे।
मेजर हमजा आरिफ की मौत कैसे हुई?
जैसलमेर में ड्यूटी से लौटते समय उनकी सैन्य टाटा सफारी सड़क पर अचानक आए ऊंट से टकरा गई। इसके बाद वाहन कई बार पलट गया। हादसे में मेजर हमजा आरिफ की मौत हो गई।
मेजर हमजा आरिफ की अंतिम यात्रा कहां से निकली?
अंतिम यात्रा सैफी नगर से शुरू हुई और माणिकबाग पुल, कलेक्टर चौराहा, राजबाड़ा तथा सदर बाजार होते हुए इमली बाजार स्थित शिया दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान पहुंची।
मेजर हमजा आरिफ की शादी कब हुई थी?
उनके पिता के मुताबिक, उनकी शादी हादसे से करीब एक महीने पहले ज्योति अरोरा से हुई थी।
मेजर हमजा आरिफ को अंतिम विदाई कैसे दी गई?
सेना ने उन्हें पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी। कब्रिस्तान में गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और इसके बाद धार्मिक रीति रिवाज के अनुसार उन्हें सुपुर्द ए खाक किया गया।
अंतिम विदाई में कितने लोग शामिल हुए?
अंतिम यात्रा में सेना के अधिकारियों के अलावा बड़ी संख्या में इंदौर के नागरिक, बोहरा समुदाय के लोग, रिश्तेदार और मेजर हमजा के दोस्त शामिल हुए।
मेजर हमजा आरिफ की पत्नी का नाम क्या है?
मेजर हमजा आरिफ की पत्नी का नाम ज्योति अरोरा है। अंतिम विदाई के दौरान उन्होंने तिरंगे में लिपटे अपने पति के पार्थिव शरीर को सलामी दी और सेना से मिला तिरंगा अपने सीने से लगा लिया।

