ईरान- अमेरिका तनाव में पाकिस्तान की दूसरी बार मध्यस्थता, क्या बनेगी बात?
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नौशाद अख्तर
इस्लामाबाद।
पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका में दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन रजा नकवी का तेहरान दौरा इसी कोशिश की एक अहम कड़ी माना जा रहा है। सवाल यह है कि क्या इस बार पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने में सफल हो पाएगा?
ईरानी सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के अनुसार, मोहसिन रजा नकवी मंगलवार 11 अगस्त को तेहरान पहुंचे। उनके दौरे का मकसद दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की कोशिशों के साथ द्विपक्षीय रिश्तों और आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करना बताया गया है।
हालांकि, नकवी के दौरे को लेकर पाकिस्तान और ईरान की ओर से तत्काल कोई विस्तृत आधिकारिक घोषणा नहीं की गई। इसके बावजूद इस यात्रा को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है, जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव फिर बढ़ गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट गहरा रहा है। लाल सागर और बाब अल मन्देब में हूती हमले भी क्षेत्रीय तनाव को और खतरनाक बना रहे हैं।
क्या पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनेगा?
यह पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत कराने की कोशिश की है। पाकिस्तान पहले भी दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचाने और तनाव कम करने की कोशिश करता रहा है।
इस बार हालात कहीं ज्यादा पेचीदा हैं। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव सिर्फ परमाणु कार्यक्रम या कूटनीतिक मतभेद तक सीमित नहीं रहा। इसमें सैन्य कार्रवाई, समुद्री रास्तों की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे सवाल भी जुड़ गए हैं।
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि उसके ईरान के साथ लंबे समय से सीमा और सुरक्षा संबंध हैं। दूसरी ओर अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं। ऐसे में इस्लामाबाद के लिए दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखना आसान काम नहीं है।
मोहसिन रजा नकवी का तेहरान दौरा इसी संतुलन की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
पाकिस्तान की कोशिश में सऊदी अरब की भूमिका क्या है?
ईरान अमेरिका तनाव के बीच सऊदी अरब की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। पाकिस्तान के लिए यह एक और चुनौती है।
मक्का समझौते के बाद पाकिस्तान और सऊदी अरब के रिश्तों में एक नया अध्याय खुला है। लेकिन मौजूदा संकट में रियाद की अपनी सुरक्षा चिंताएं हैं। ईरान और उसके सहयोगी हूती संगठन के बीच बढ़ता तनाव सऊदी अरब को सीधे प्रभावित करता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट और लाल सागर में जहाजों पर हमले से सऊदी अरब की तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार की सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा है।
इसलिए पाकिस्तान अगर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करता है तो उसे ईरान के साथ बातचीत के साथ सऊदी अरब की चिंताओं को भी ध्यान में रखना होगा।
मोहसिन नकवी तेहरान क्यों गए?
IRNA ने एक राजनयिक सूत्र के हवाले से बताया कि नकवी मंगलवार सुबह तेहरान के लिए रवाना हुए। उनके कार्यक्रम में द्विपक्षीय संबंधों और पारस्परिक हितों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत शामिल थी।
नकवी का दौरा ईरान के गृह मंत्री एस्कंदर मोमेनी की इस्लामाबाद यात्रा के करीब एक महीने बाद हुआ है। उस समय दोनों पक्षों के बीच सुरक्षा और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर बातचीत हुई थी।
पाकिस्तान इस समय कतर जैसे खाड़ी देशों के सहयोग से अमेरिका और ईरान के बीच संवाद का रास्ता तलाश रहा है। लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है।
सबसे बड़ी अड़चन होर्मुज जलडमरूमध्य बनी हुई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?
होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है। फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला यह जलमार्ग वैश्विक तेल कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
ईरान ने 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और समुद्री व्यापार को लेकर चिंता बढ़ गई।
युद्ध से पहले दुनिया की करीब पांचवीं तेल आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती थी। इसलिए होर्मुज में किसी भी लंबे व्यवधान का असर सिर्फ ईरान और अमेरिका पर नहीं पड़ेगा। इसका असर एशिया, यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकता है।
ईरान का कहना है कि अमेरिका को ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी खत्म करनी होगी और उसकी दूसरी मांगें भी माननी होंगी। तभी तेहरान होर्मुज को दोबारा खोलने पर विचार कर सकता है।
यही वह बिंदु है जहां बातचीत सबसे ज्यादा अटक सकती है।
बाब अल मन्देब में हूती हमले ने बढ़ाई चिंता
इधर यमन से आई खबरों ने संकट को और गंभीर बना दिया है।
यमनी अधिकारियों के अनुसार, ईरान समर्थित हूतियों ने बाब अल मन्देब जलडमरूमध्य में एक जहाज को निशाना बनाया। हमले में कई लोगों के मारे जाने की खबर सामने आई है। अधिकारियों के अनुसार मृतकों में पाकिस्तानी और इंडोनेशियाई नागरिक भी शामिल थे।
यमन के परिवहन मंत्रालय के अनुसार, एक वाणिज्यिक जहाज पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं।
यह हमला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बाब अल मन्देब लाल सागर और अरब सागर के बीच समुद्री यातायात के लिए बेहद अहम रास्ता है। होर्मुज संकट के बाद अब दुनिया की नजर इस जलडमरूमध्य पर भी टिक गई है।
अगर यहां जहाजों पर हमले बढ़ते हैं तो वैश्विक शिपिंग और तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
हूतियों ने मोखा और मारिब को भी बनाया निशाना
यमन में तनाव केवल समुद्र तक सीमित नहीं है। यमनी सेना के अनुसार, हूतियों ने लाल सागर के सरकारी नियंत्रण वाले बंदरगाह शहर मोखा और मध्य यमन के मारिब प्रांत पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए।
मारिब और हद्रामौत में पिछले सप्ताह भी हमले हुए थे। इनमें सरकारी सैनिकों और आम नागरिकों के मारे जाने की खबरें आई थीं।
मोखा यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के नियंत्रण वाला महत्वपूर्ण बंदरगाह है। होदेदा बंदरगाह हूतियों के नियंत्रण में होने के कारण मोखा का महत्व और बढ़ गया है।
अगर मोखा पर हमले बढ़ते हैं तो यमन के समुद्री व्यापार पर भी असर पड़ सकता है।
क्या यमन में फिर शुरू हो सकता है बड़ा युद्ध?
यमन में 2022 के संघर्षविराम के बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई में कमी आई थी। लेकिन हाल के हमलों ने उस स्थिति को बदलने की आशंका पैदा कर दी है।
हूती संगठन के मुख्य वार्ताकार और प्रवक्ता मोहम्मद अब्दुल सलाम ने सऊदी अरब पर आरोप लगाया कि उसने 2015 से लागू हवाई और समुद्री नाकाबंदी को और कड़ा करने के लिए संघर्षविराम का फायदा उठाया।
उन्होंने बातचीत के लिए तैयार होने की बात कही है। लेकिन हूतियों की एक प्रमुख मांग नाकाबंदी हटाना है।
यही वजह है कि यमन का संकट ईरान अमेरिका तनाव से अलग होकर नहीं देखा जा सकता।
ईरान अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका और इजराइल के खिलाफ जारी संघर्ष में ईरान की क्षमता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि ईरान ने अपनी ताकत साबित की है।
तेहरान का रुख साफ है। वह अमेरिका से अपनी प्रमुख मांगें मनवाए बिना पीछे हटने के लिए तैयार नहीं दिख रहा।
ईरान चाहता है कि उसके बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकाबंदी हटे। इसके साथ ही वह सुरक्षा और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी आश्वासन चाहता है।
दूसरी ओर अमेरिका के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाना और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है।
यहीं से पाकिस्तान की मध्यस्थता की असली परीक्षा शुरू होती है।
क्या पाकिस्तान की कोशिश सफल होगी?
इस सवाल का जवाब अभी साफ नहीं है।
पाकिस्तान के पास ईरान से बातचीत का अपना अनुभव है। सऊदी अरब के साथ भी उसके करीबी रिश्ते हैं। अमेरिका के साथ उसके लंबे समय से राजनयिक संबंध हैं। इसलिए इस्लामाबाद के पास बातचीत के लिए जरूरी संपर्क मौजूद हैं।
लेकिन मध्यस्थता तभी सफल होगी जब तेहरान और वाशिंगटन दोनों किसी समझौते के लिए तैयार हों।
फिलहाल दोनों पक्ष अपनी शर्तों पर कायम हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद है। बाब अल मन्देब में जहाजों पर हमले हो रहे हैं। यमन में फिर से लड़ाई बढ़ने का खतरा है। सऊदी अरब अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है।
ऐसे माहौल में मोहसिन नकवी की तेहरान यात्रा सिर्फ एक सामान्य राजनयिक दौरा नहीं है। यह पाकिस्तान की उस कोशिश का हिस्सा है जिसमें वह पश्चिम एशिया के एक बड़े संकट को बातचीत की मेज तक लाने की भूमिका तलाश रहा है।
अगर इस प्रयास से अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता शुरू होती है तो पाकिस्तान की कूटनीतिक हैसियत मजबूत होगी। लेकिन अगर होर्मुज और बाब अल मन्देब का संकट बढ़ता गया तो मध्यस्थता की राह और कठिन होती जाएगी।
फिलहाल दुनिया की नजर तेहरान पर है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पाकिस्तान क्या संदेश लेकर गया है। बड़ा सवाल यह है कि क्या ईरान उस संदेश को सुनने के लिए तैयार है और क्या अमेरिका भी बातचीत की उसी मेज पर लौटेगा?
यही आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

