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बशर अल असद को मौत की सजा, सीरिया में शुरू हुआ हिसाब

दमिश्क।

सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल असद के लिए 11 अगस्त 2026 का दिन उनके लंबे राजनीतिक शासन के अंत के बाद एक और बड़े मोड़ के रूप में सामने आया। दमिश्क की एक आपराधिक अदालत ने बशर अल असद को मानवता के खिलाफ अपराध और युद्ध अपराधों के मामले में मौत की सजा सुनाई। उनके छोटे भाई माहिर अल असद को भी मौत की सजा दी गई। दोनों रूस में हैं और अदालत में मौजूद नहीं थे। इसलिए उनके खिलाफ फैसला उनकी गैरमौजूदगी में सुनाया गया।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि असद परिवार के करीब पांच दशक लंबे शासन के खत्म होने के करीब 20 महीने बाद पहली बार बशर अल असद या उनके बेहद करीबी लोगों के खिलाफ सीरिया में इतना बड़ा आपराधिक फैसला आया है। अदालत का फैसला उन घटनाओं से जुड़ा है, जिन्होंने 2011 में शुरू हुए जन आंदोलन को गृहयुद्ध में बदल दिया था। करीब 14 साल चले इस संघर्ष में लगभग पांच लाख लोगों की जान जाने का अनुमान है।

बशर अल असद को किस मामले में मौत की सजा मिली?

दमिश्क की चौथी आपराधिक अदालत ने बशर अल असद को जानबूझकर हत्या, यातना, मनमानी गिरफ्तारी और मानवता के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराया। अदालत के अनुसार, उनके शासन के दौरान सरकारी संस्थाओं और सुरक्षा तंत्र का इस्तेमाल गंभीर अपराधों को अंजाम देने के लिए किया गया।

अदालत में फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश फखरेद्दीन अल एरियान ने कहा कि बशर अल असद ने युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध करने के लिए राज्य की एजेंसियों का इस्तेमाल किया।

यह फैसला सीरिया में न्याय और जवाबदेही की बहस को एक नए चरण में ले गया है। असद शासन के दौरान हुई गिरफ्तारियों, यातना, हिरासत में मौत और नागरिकों पर कार्रवाई के मामले लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की चिंता का विषय रहे हैं।

माहिर अल असद पर भी अदालत का बड़ा फैसला

बशर अल असद के छोटे भाई माहिर अल असद को भी मौत की सजा सुनाई गई है। वह सीरियाई सेना की चौथी बख्तरबंद डिवीजन के पूर्व कमांडर रहे हैं। विपक्षी कार्यकर्ताओं ने इस सैन्य इकाई पर नागरिकों की हत्या, यातना, जबरन वसूली और हिरासत केंद्र चलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे।

माहिर भी अदालत में मौजूद नहीं थे। दिसंबर 2024 में असद सरकार के पतन के बाद बशर और माहिर दोनों सीरिया से निकलकर रूस चले गए थे। रूस ने उन्हें राजनीतिक शरण दी। सीरिया की नई सत्ता लगातार रूस से दोनों को सौंपने की मांग करती रही है।

इस वजह से अदालत का फैसला सुनाए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि मौत की सजा आखिर लागू कैसे होगी। जब तक बशर और माहिर रूस में हैं, सीरियाई अदालत का फैसला व्यवहार में लागू करना आसान नहीं होगा।

कौन हैं अतेफ नजीब और क्यों मिली मौत की सजा?

इस मामले में बशर अल असद के रिश्तेदार अतेफ नजीब को भी मौत की सजा सुनाई गई। वह अदालत में मौजूद थे और फैसला सुनाए जाने के समय सुरक्षा घेरे में कैदियों के लिए बनाए गए स्थान पर खड़े थे।

नजीब वर्ष 2011 में दक्षिणी सीरिया के दारा प्रांत में राजनीतिक सुरक्षा शाखा के प्रमुख थे। इसी इलाके को सीरिया के विद्रोह की शुरुआती जमीन माना जाता है।

2011 में दारा के एक स्कूल की दीवार पर सरकार विरोधी नारे लिखने वाले कुछ किशोरों को गिरफ्तार किया गया था। उनके साथ कथित यातना और दुर्व्यवहार की खबरों ने इलाके में गुस्सा बढ़ा दिया। इसके बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने हालात को और बिगाड़ दिया। देखते ही देखते स्थानीय प्रदर्शन व्यापक आंदोलन में बदल गए।

यही आंदोलन आगे चलकर सीरियाई गृहयुद्ध का आधार बना।

अतेफ नजीब को 2025 में गिरफ्तार किया गया था। वह इस मामले में अदालत के सामने पेश होने वाले प्रमुख पूर्व असद शासन अधिकारियों में शामिल हैं। उनके मामले में अपील का रास्ता भी मौजूद है।

दारा के पीड़ितों के लिए यह फैसला क्यों अहम है?

दमिश्क की अदालत के बाहर फैसले के समय लोगों की भीड़ जमा थी। दारा से जुड़े कुछ पीड़ित भी अदालत पहुंचे थे। उनमें वे लोग भी शामिल थे जो 2011 में किशोर थे और उस समय गिरफ्तार किए गए थे।

मुआविया सयासनेह ने कहा कि अब उन्हें लगता है कि उस दौर में मारे गए लोगों का खून बेकार नहीं गया। उनके लिए अतेफ नजीब को मौत की सजा मिलना 15 साल पुराने दर्द के बाद एक बड़ी घटना है।

नायफ अबाजेद भी अदालत में मौजूद थे। उन्हें 2011 में केवल 13 वर्ष की उम्र में गिरफ्तार किया गया था। फैसले पर संतोष जताते हुए उन्होंने कहा कि उनके लिए सबसे बड़ी खुशी उस समय होगी जब बशर अल असद को भी सजा मिलेगी।

इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि सीरिया में यह मामला सिर्फ अदालत का मामला नहीं है। यह उन परिवारों के लिए भी न्याय का सवाल है, जिन्होंने वर्षों तक अपने परिजनों की मौत, गिरफ्तारी और गुमशुदगी का दर्द झेला है।

असद परिवार का पांच दशक का शासन कैसे खत्म हुआ?

बशर अल असद वर्ष 2000 में सीरिया के राष्ट्रपति बने थे। उन्होंने अपने पिता हाफिज अल असद से सत्ता संभाली थी। इसके बाद असद परिवार का शासन जारी रहा।

2011 में अरब दुनिया में उठे जन आंदोलनों का असर सीरिया पर भी पड़ा। दारा में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन धीरे धीरे पूरे देश में फैल गए। सरकारी कार्रवाई, विद्रोही गुटों का उभार और बाद में विदेशी शक्तियों की सैन्य भागीदारी ने सीरिया को लंबे गृहयुद्ध में धकेल दिया।

रूस और ईरान असद सरकार के प्रमुख सहयोगियों में रहे। दूसरी तरफ अमेरिका, तुर्की और पश्चिमी देशों की भूमिका अलग रही। इस संघर्ष में इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठन भी उभरे।

दिसंबर 2024 में विद्रोही हमले के बाद बशर अल असद की सत्ता अचानक खत्म हो गई। असद परिवार का दशकों पुराना शासन टूट गया और बशर रूस चले गए।

क्या मौत की सजा से सीरिया में न्याय पूरा हो जाएगा?

यह सवाल अब सबसे महत्वपूर्ण है।

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने फैसले को लेकर मौत की सजा पर आपत्ति जताई है। संगठन की सीरिया शोधकर्ता हिबा जायादिन के अनुसार, मौत की सजा क्रूर और अपरिवर्तनीय है। उन्होंने यह भी कहा कि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना जरूरी है। अतेफ नजीब को अपील का अधिकार है और अपील की प्रक्रिया भी निष्पक्ष होनी चाहिए।

यही सीरिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। असद शासन के दौरान हुए अपराधों के लिए जिम्मेदारी तय करना जरूरी है। लेकिन न्याय की प्रक्रिया ऐसी भी होनी चाहिए जिस पर पीड़ितों, आरोपियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भरोसा हो।

आगे क्या होगा?

बशर अल असद और माहिर अल असद की मौत की सजा फिलहाल अदालत के फैसले तक सीमित है क्योंकि दोनों रूस में हैं। सीरिया के लिए अगली बड़ी चुनौती उन्हें न्याय के लिए वापस लाना होगी।

दूसरी ओर अतेफ नजीब के मामले में अपील की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। इस मुकदमे से सीरिया में संक्रमणकालीन न्याय की दिशा भी तय हो सकती है।

दमिश्क का यह फैसला सिर्फ तीन पूर्व अधिकारियों की सजा नहीं है। इसके पीछे 2011 से अब तक की पूरी सीरियाई त्रासदी खड़ी है। हजारों परिवारों की तबाही है। जेलों में बिताए गए साल हैं। विस्थापन है। लापता लोगों की तलाश है। और उन लोगों की उम्मीद है जो चाहते हैं कि सत्ता बदलने के बाद न्याय भी बदले।

सीरिया में असद शासन भले ही खत्म हो चुका है, लेकिन उसके दौर के अपराधों का हिसाब अभी बाकी है। दमिश्क की अदालत का यह फैसला उस लंबे हिसाब की पहली बड़ी कानूनी कड़ी बन गया है।

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