Culture

यादें : ‘शापड़े की’ और ‘चंडू खाने की गप’ का पुराना दिल्ली कनेक्शन

नौशाद अख्तर

मुंबई की गलियों में कोई कह दे, ‘क्या छापड़ी के!’, तो वहां का आदमी मुस्कुराकर समझ जाता है कि बात किस लहजे में कही गई है। हरियाणा में ‘उरले-परले’ सुनते ही एक खास देसी अंदाज कानों में उतर आता है। बिहार में ‘मारम न’ जैसे शब्द अपनेपन का अहसास कराते हैं। ये महज शब्द नहीं होते। इनके भीतर किसी शहर, कस्बे, मोहल्ले और वहां के लोगों की जिंदगी का रंग छिपा होता है।

हर शहर की अपनी एक जुबान होती है। ऐसी जुबान जो किताबों में दर्ज नहीं होती। जिसका व्याकरण कोई नहीं बनाता। जिसे स्कूल में कोई नहीं पढ़ाता। वह गलियों में पैदा होती है, चाय की दुकानों पर पलती है, दोस्तों की महफिलों में जवान होती है और फिर पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों की बातचीत का हिस्सा बन जाती है।

पुरानी दिल्ली भी ऐसी ही जुबान का शहर है।

जामा मस्जिद की सीढ़ियों से लेकर चावड़ी बाजार की तंग गलियों तक, यहां बोलचाल में ऐसे शब्द और मुहावरे मिलते हैं जिनमें सदियों पुरानी दिल्ली की आवाज सुनाई देती है। इनमें दो वाक्य खास तौर पर दिलचस्प हैं।

‘अबे क्यों छोड़ रिया शापड़े की?’

और

‘चंडू खाने की गप छोड़ रहा है।’

आज पुरानी दिल्ली की नई पीढ़ी भी इनका इस्तेमाल करती है। फर्क सिर्फ इतना है कि शब्द जुबान पर हैं, लेकिन उनके पीछे की कहानी धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही है। शायद बहुत कम लोगों को मालूम है कि इन मुहावरों का रिश्ता पुरानी दिल्ली की उन जगहों से रहा है, जहां कभी चाय, सुल्फा, अफीम, अखबार, राजनीति और लंबी-लंबी गप्पें एक साथ बैठा करती थीं।

उर्दू के मशहूर पत्रकार शाहिद सिद्दीकी इन दिनों दिल्ली के ऐसे ही अनाम और अनलिखे पहलुओं को समेटने में लगे हैं। उन्होंने इन दोनों वाक्यों की तह तक जाने की कोशिश की है। उनकी पड़ताल दिलचस्प भी है और पुरानी दिल्ली के बदलते चेहरे की एक तस्वीर भी सामने रखती है।

एक मुहावरे के पीछे छिपी है चावड़ी बाजार की कहानी

जामा मस्जिद के पीछे से चावड़ी बाजार की तरफ निकलें तो पुरानी दिल्ली की गलियां अपने पुराने मिजाज में दिखाई देती हैं। इन्हीं रास्तों में से एक सड़क अजमेरी गेट की तरफ जाती है।

कभी इसी रास्ते पर एक विशाल बरगद का पेड़ हुआ करता था। उसके चबूतरे से लगी बड़शाह मुल्ला की मजार बताई जाती है। आज न वह बरगद दिखाई देता है और न वह चबूतरा। मजार का भी कोई साफ निशान बाकी नहीं है।

लेकिन कभी यह जगह पुरानी दिल्ली की एक खास मंडली का ठिकाना हुआ करती थी।

कहा जाता है कि चबूतरे के आसपास सुल्फा और अफीम पीने वालों की महफिल जमती थी। नशा चढ़ता तो कल्पनाओं के घोड़े भी दौड़ने लगते। कोई देश को आजाद कराने की योजना सुनाता, कोई देश का कर्ज माफ कराने की अपनी काबिलियत का किस्सा सुनाता। कोई दुनिया बदल देने का दावा करता तो कोई अपनी ऐसी ताकत के किस्से सुनाता, जिनका हकीकत से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता था।

सुनने वाले भी जानते थे कि सामने वाला हवा में बातें कर रहा है। लेकिन महफिल का मजा इसी में था।

धीरे-धीरे उस जगह की गप्पें इतनी मशहूर हुईं कि पुरानी दिल्ली की बोलचाल में किसी के बेसिर-पैर की बात करने पर लोग तंज कसते हुए कहने लगे,

‘अबे क्यों छोड़ रिया शापड़े की?’

यानी इतनी लंबी-चौड़ी और अविश्वसनीय बात क्यों हांक रहा है?

यही वह जगह है जहां भाषा सिर्फ भाषा नहीं रह जाती। वह अपने पीछे एक पूरा दृश्य छोड़ जाती है। एक बरगद। उसके नीचे चबूतरा। पास में मजार। नशे में डूबी महफिल। बड़े-बड़े दावे। और उन्हें सुनकर मुस्कुराते लोग।

आज वह दृश्य गायब है। लेकिन उसका एक टुकड़ा लोगों की जुबान में अब भी जिंदा है।

‘शापड़े’ आखिर आया कहां से?

पुरानी दिल्ली की बोलचाल की खासियत ही यही है कि वह शब्दों को अपने हिसाब से बदल लेती है। चावड़ी बाजार भी स्थानीय उच्चारण में बदलते-बदलते ‘शापड़े’ हो गया, ऐसा बताया जाता है।

पुरानी दिल्ली के लोग आज भी कई जगहों के नाम इसी तरह अपने अंदाज में बोलते हैं। यह कोई औपचारिक भाषा नहीं है। यह मोहल्ले की भाषा है। कान से सीखी गई भाषा है। दादा ने पोते से कही और पोते ने अपने दोस्तों के बीच दोहरा दी।

इसीलिए ‘शापड़े’ शब्द को सिर्फ एक बिगड़े हुए उच्चारण के रूप में देखना शायद इस कहानी को छोटा कर देना होगा। इसके भीतर पुरानी दिल्ली के उस सामाजिक जीवन की झलक है, जहां जगहों के नाम भी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत में अपना नया रूप ले लेते थे।

अब आते हैं ‘चंडू खाने की गप’ पर

दूसरी कहानी जामा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे से शुरू होती है।

किसी जमाने में यहां चाय का एक छोटा सा खोखा हुआ करता था। सुबह होते ही वहां मटरगश्तों का जमावड़ा लग जाता। चाय आती। लोग बैठते। अखबार आता। और फिर शुरू होती दुनिया जहान की चर्चा।

उस जमाने में उर्दू अखबार सुबह-सुबह वहां पहुंच जाते थे। अखबार का एक पन्ना किसी के हाथ में होता तो दूसरा किसी और के। थोड़ी देर में पूरा अखबार महफिल में बंट जाता।

फिर शुरू होती बहस।

देश की राजनीति से लेकर विदेश की सियासत तक। कौन सही है, कौन गलत है। सरकार को क्या करना चाहिए। दुनिया किस तरफ जा रही है। देश की अर्थव्यवस्था कैसे सुधर सकती है। किस मुल्क को किससे दोस्ती करनी चाहिए।

हर विषय पर राय मौजूद थी।

और अंदाज ऐसा जैसे दुनिया भर की सरकारें इन्हीं चाय पीते लोगों की सलाह पर चल रही हों।

यहीं से ‘चंडू खाने की गप’ का मुहावरा मशहूर होने की कहानी सामने आती है।

कोई जब जरूरत से ज्यादा बड़ी-बड़ी बातें करता या ऐसी बातें करता जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता, तो सामने वाला मुस्कुराकर कह देता,

‘क्यों चंडू खाने की गप छोड़ रहा है?’

बस, धीरे-धीरे यह वाक्य महफिल से निकलकर पुरानी दिल्ली की बोलचाल का हिस्सा बन गया।

और फिर पुरानी दिल्ली की गलियों से निकलकर पूरे देश की जुबान तक पहुंच गया।

चाय का खोखा और अखबारों की महफिल

इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद वह चाय का खोखा है।

आज हम चाय की दुकान को अक्सर सिर्फ चाय पीने की जगह समझते हैं। लेकिन पुराने शहरों में चाय की दुकानें कई बार छोटी-मोटी सार्वजनिक चौपाल होती थीं।

यहां खबर पहुंचती थी।

फिर खबर पर राय बनती थी।

फिर राय पर बहस होती थी।

और कई बार बहस इतनी लंबी चलती कि मूल खबर कहीं पीछे छूट जाती।

जामा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे का वह छोटा सा खोखा भी ऐसी ही जगह रहा होगा, जहां अखबार लोगों को जोड़ता था और चाय बातचीत को चलाती थी।

उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था। मोबाइल फोन नहीं थे। हर हाथ में इंटरनेट नहीं था। लेकिन लोगों के पास वक्त था और बातचीत का शौक था।

एक अखबार के पन्ने से पूरी महफिल में चर्चा फैल जाती थी।

किसी ने खबर पढ़ी।

दूसरे ने अपनी राय दी।

तीसरे ने कहा कि उसे असली बात पता है।

चौथे ने उससे भी बड़ी कहानी सुना दी।

और देखते ही देखते एक खबर गप में बदल जाती।

शायद इसी सामाजिक माहौल ने ‘चंडू खाने की गप’ को वह जमीन दी, जहां से यह मुहावरा आगे बढ़ा।

दोनों मुहावरों में फर्क भी है

दिलचस्प बात यह है कि दोनों वाक्य एक ही तरह की बात के लिए इस्तेमाल होते हैं, लेकिन उनकी अपनी अलग स्थानीय दुनिया है।

‘अबे क्यों छोड़ रिया शापड़े की’ आज भी मुख्य रूप से पुरानी दिल्ली की तंग गलियों की बोलचाल में सुनाई देता है। इसमें पुरानी दिल्ली का खास लहजा है। एक खास अंदाज है। एक खास अपनापन है।

दूसरी तरफ ‘चंडू खाने की गप’ पुरानी दिल्ली की गलियों से निकलकर देशभर में फैल गया।

आज भारत के कई हिस्सों में कोई व्यक्ति हवा में बातें करे, असंभव दावा करे या बिना आधार के कहानी सुनाए तो ‘चंडू खाने की गप’ कहना असामान्य नहीं लगता।

यानी एक मुहावरा अपनी स्थानीय मिट्टी में ज्यादा सुरक्षित रहा और दूसरा शहर की सीमाएं पार कर आम बोलचाल का हिस्सा बन गया।

मुहावरे शहर की स्मृति होते हैं

पुरानी दिल्ली की असली खूबसूरती शायद उसकी इमारतों में जितनी है, उसकी जुबान में उससे कम नहीं।

लाल किला, जामा मस्जिद, चांदनी चौक और चावड़ी बाजार को इतिहास की किताबों में जगह मिल गई। लेकिन उन जगहों पर रोजमर्रा की जिंदगी जीने वाले लोगों की छोटी-छोटी बातें कहां दर्ज हुईं?

किसने किस दुकान पर बैठकर क्या कहा?

किस चबूतरे पर कौन सी महफिल जमती थी?

किस चाय की दुकान पर सुबह कौन सा अखबार आता था?

किस मुहल्ले के लोग किसी शब्द को किस तरह बोलते थे?

ये इतिहास की किताबों में अक्सर नहीं मिलता।

लेकिन यही चीजें किसी शहर को शहर बनाती हैं।

मुहावरे दरअसल शहर की सामूहिक स्मृति होते हैं।

लोग बदल जाते हैं। दुकानें हट जाती हैं। पेड़ कट जाते हैं। चबूतरे टूट जाते हैं। मजारों और पुराने ठिकानों के निशान मिट जाते हैं। मगर कभी-कभी कोई पुराना वाक्य बच जाता है।

वह वाक्य अगली पीढ़ी की जुबान पर आ जाता है।

उसे बोलने वाला शायद नहीं जानता कि वह सैकड़ों साल पुरानी शहरी संस्कृति का एक छोटा सा टुकड़ा दोहरा रहा है।

पुरानी दिल्ली की जुबान में छिपी है एक पूरी दुनिया

आज जब पुरानी दिल्ली तेजी से बदल रही है, उसकी भाषा भी बदल रही है। नई पीढ़ी के शब्द आ रहे हैं। पुराने शब्द पीछे छूट रहे हैं। कई मुहावरे अब सिर्फ बुजुर्गों की बातचीत में सुनाई देते हैं।

ऐसे में ‘अबे क्यों छोड़ रिया शापड़े की’ और ‘चंडू खाने की गप’ जैसे वाक्य सिर्फ मनोरंजन की चीज नहीं हैं।

ये शहर के सामाजिक इतिहास के छोटे-छोटे दस्तावेज हैं।

एक के पीछे चावड़ी बाजार का बरगद और बड़शाह मुल्ला की मजार है। दूसरी के पीछे जामा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे का चाय का खोखा, सुबह के उर्दू अखबार और राजनीति पर घंटों बहस करती मंडली।

आज न वह बरगद है।

न वह चबूतरा।

न वह महफिल।

न वह चाय का खोखा।

लेकिन पुरानी दिल्ली के किसी नुक्कड़ पर अगर कोई दोस्त बहुत लंबी कहानी सुनाने लगे और दूसरा हंसते हुए कह दे,

‘अबे क्यों छोड़ रिया शापड़े की!’

तो समझिए, पुरानी दिल्ली का एक छोटा सा इतिहास अब भी सांस ले रहा है।

और जब कोई पूरे यकीन से ऐसी बात कहने लगे जिसका दुनिया की हकीकत से कोई लेना-देना न हो, तो कहीं न कहीं से आवाज आ ही जाती है,

‘चंडू खाने की गप छोड़ रहा है।’

शहर बदलते हैं। उनकी इमारतें बदलती हैं। उनकी गलियां बदलती हैं। मगर कुछ शब्द जाने कैसे वक्त की धूल झाड़कर हर नई पीढ़ी की जुबान पर चले आते हैं।

शायद यही किसी शहर की सबसे खूबसूरत विरासत है।

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