दिल्ली दंगे: उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के लिए CJI को खुला पत्र
Table of Contents
नई दिल्ली।
साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के आरोप में जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला एक बार फिर गरमा गया है। देश के 110 से अधिक जाने-माने बुद्धिजीवियों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनेताओं और अधिवक्ताओं ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को एक खुला पत्र लिखा है। इस पत्र के जरिए चीफ जस्टिस से अपील की गई है कि वे दोनों युवा एक्टिविस्टों की पिछले छह साल से जारी अंडर-ट्रायल हिरासत में दखल दें और उनकी रिहाई सुनिश्चित करें।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने पत्र में कहा कि गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (UAPA) जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल असहमति जताने वालों के खिलाफ बिना ट्रायल के सालों तक जेल में रखने के लिए किया जा रहा है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत आजादी के मौलिक अधिकार का हनन करती है।
6 साल की जेल और 900 गवाह: ट्रायल पर उठे सवाल
खुले पत्र में देश की न्याय प्रणाली और मुकदमों की सुस्त रफ्तार पर चिंता जताई गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने ध्यान दिलाया कि दोनों आरोपी लगभग छह साल से जेल की सलाखों के पीछे हैं, लेकिन अभी तक उनका मुख्य ट्रायल शुरू भी नहीं हो सका है। अभियोजन पक्ष ने इस मामले में करीब 900 गवाहों की सूची बनाई है। इतने ज्यादा गवाहों की मौजूदगी में निकट भविष्य में केस पूरा होना संभव नहीं दिखता।
पत्र में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध K.A. नजीब मामले के फैसले का हवाला दिया गया है। उस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि अगर किसी मामले में लंबा वक्त बीत जाए और ट्रायल पूरा होने में देरी हो, तो UAPA जैसे सख्त कानूनों के बावजूद आरोपी को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जमानत दी जा सकती है।
न्यायिक फैसलों और सिद्धांतों का हवाला
पत्र में सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों के फैसलों का भी उल्लेख किया गया है। इसमें जनवरी 2026 में जमानत याचिकाएं खारिज होने और उसके बाद 18 मई 2026 को आए सैयद इफ़्तिखार अंद्राबी मामले के फैसले की बात कही गई है। बाद के फैसले में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने टिप्पणी की थी कि न्यायिक अनुशासन का पालन करते हुए छोटी बेंचों को बड़ी बेंचों के सिद्धांतों को मानना चाहिए।
हस्ताक्षर करने वालों ने CJI से आग्रह किया कि “जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद” का संवैधानिक सिद्धांत हर हाल में लागू होना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति सालों जेल में बिताने के बाद बरी भी होता है, तो उसकी जिंदगी के कीमती साल वापस नहीं लाए जा सकते। लोकतंत्र में असहमति की आवाज को जिंदा रखना बेहद जरूरी है।
प्रमुख हस्ताक्षरकर्ताओं की पूरी सूची (110 नाम):
- अरुंधति रॉय, लेखिका
- अमिताव घोष, पद्मश्री और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता लेखक
- प्रकाश राज, अभिनेता और निर्देशक
- रामचंद्र गुहा, इतिहासकार और लेखक
- आनंद पटवर्धन, फिल्म निर्माता
- मनोज कुमार झा, सांसद व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय
- राजा राम सिंह, सांसद (काराकाट, बिहार), भाकपा (माले) लिबरेशन
- अरुणा रॉय, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता (MKSS)
- योगेंद्र यादव, राष्ट्रीय संयोजक, भारत जोड़ो अभियान
- राणा अय्यूब, पत्रकार और कॉलमनिस्ट
- वरुण ग्रोवर, लेखक और निर्देशक
- स्वरा भास्कर, अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता
- राजमोहन गांधी, लेखक व पूर्व राज्यसभा सांसद
- जयति घोष, अर्थशास्त्री और प्रोफेसर
- गुरमेहर कौर, लेखिका और कार्यकर्ता
- हर्ष मंदर, लेखक और शांति कार्यकर्ता
- परकाला प्रभाकर, राजनीतिक अर्थशास्त्री और लेखक
- पार्थ चटर्जी, समाज वैज्ञानिक और इतिहासकार
- जिग्नेश मेवाणी, विधायक (वडगाम, गुजरात) व कार्यकर्ता
- जोया हसन, प्रोफेसर एमेरिटा, JNU
- मीना कंडासामी, लेखिका
- निवेदिता मेनन, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, JNU
- तानिका सरकार, इतिहासकार व प्रोफेसर
- उमा चक्रवर्ती, इतिहासकार
- नंदिनी सुंदर, प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय
- अपूर्वानंद, शिक्षाविद और लेखक
- मुकुल केशवन, लेखक
- गीता हरिहरन, लेखिका
- सैयदा हमीद, लेखिका और कार्यकर्ता
- प्रतीक सिन्हा, सह-संस्थापक व संपादक, ऑल्ट न्यूज़
- नेहा दीक्षित, स्वतंत्र पत्रकार
- सुशांत सिंह, अभिनेता
- तनुजा चंद्रा, फिल्म लेखिका और निर्देशिका
- एन. मनु चक्रवर्ती, प्रोफेसर व साहित्य समीक्षक
- शुद्धब्रत सेनगुप्ता, कलाकार और लेखक
- जे. देविका, इतिहासकार (केरल)
- आयशा किदवई, प्रोफेसर, JNU
- फराह नकवी, लेखिका और कार्यकर्ता
- शैबाल चटर्जी, फिल्म समीक्षक व पत्रकार
- नकुल सिंह साहनी, फिल्म निर्माता
- विंता नंदा, फिल्म निर्माता व संपादिका
- नंदिनी राव, नारीवादी कार्यकर्ता
- पुष्पेंद्र सिंह, फिल्म निर्माता (FTII पूर्व छात्र)
- गीतांजलि राव, एनीमेशन फिल्म निर्माता
- गज़ल धालीवाल, लेखिका
- हुसैन हैदरी, लेखक
- दाराब फारूकी, पटकथा लेखक
- अंजलि मोंटेरो, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता
- चित्रा जोशी, स्वतंत्र इतिहासकार
- नदीम खान, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स
- आमिर अजीज, कवि
- ललिता रामदास, शांति व मानवाधिकार कार्यकर्ता
- सुनिता विश्वनाथ, मानवाधिकार कार्यकर्ता (हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स)
- सुजैन विश्वनाथन, शिक्षाविद
- राधा कुमार, लेखिका
- पामेला फिलिपोज़, वरिष्ठ पत्रकार
- अम्मु अब्राहम, महिला अधिकार कार्यकर्ता
- माधुरी दाते, पत्रकार
- गज़ाला जमील, सहायक प्रोफेसर, JNU
- अदिति मेहता, सेवानिवृत्त IAS अधिकारी
- अपूर्व कुमार बरुआ, सेवानिवृत्त प्रोफेसर (NEHU, शिलांग)
- अनु सिंह, फिल्म निर्माता और लेखिका
- अनिर्बान भट्टाचार्य, शोधकर्ता और लेखक
- जयश्री सुब्रमण्यम, शिक्षाविद
- किरण भट्टी, शोधकर्ता
- राधिका देसाई, स्वतंत्र शोधकर्ता
- मैरियट कोरिया, स्वतंत्र शोधकर्ता
- मनोरमा शर्मा, सेवानिवृत्त प्रोफेसर (NEHU, गुवाहाटी)
- मैमूना मोल्लाह, महिला अधिकार कार्यकर्ता
- मंजुश्री अभिनव, पशु अधिकार कार्यकर्ता
- शिल्पा पार्थन, शोधकर्ता व शिक्षिका
- रश्मि गोस्वामी, मानवाधिकार कार्यकर्ता
- सीमा आजाद, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL)
- सागरी आर. रामदास, पशुचिकित्सा वैज्ञानिक
- वनिता मुखर्जी, सामाजिक कार्यकर्ता (ALIFA)
- शरण्या नायक, सामाजिक कार्यकर्ता (ओडिशा)
- निखिल डे, मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS)
- मुरलीधरन विश्वनाथन, महासचिव (NPRD)
- जो अथियाली, सेंटर फॉर फाइनेंशियल एकाउंटेबिलिटी
- अरुंधति घोष, स्वतंत्र सलाहकार
- डॉ. रवि शुक्ला, प्रौद्योगिकीविद व शिक्षाविद
- जॉनसन थॉमस, फिल्म समीक्षक व पत्रकार
- रोनी सेन, फिल्म निर्माता
- विक्रांत पवार, फिल्म निर्माता
- सुमित रॉय, लेखक और फिल्म निर्माता
- प्रतीक वत्स, लेखक-निर्देशक
- सबिका अब्बास, कवयित्री
- नुसरत एफ. जाफरी, सिनेमैटोग्राफर और लेखिका
- रीताश, लेखक (रंग फाउंडेशन)
- वर्णा श्री रमन, विकास अर्थशास्त्री
- अरुणेश मैयार, LGBTQI कार्यकर्ता
- नीलाद्रि भट्टाचार्य, इतिहासकार
- सबिता लहकर, स्वतंत्र पत्रकार (असम)
- राजश्री, नागरिक
- पी.ई. उषा, सामाजिक कार्यकर्ता (त्रिवेंद्रम)
- मुमताज बेगम टीएल, नागरिक
- निहत हेगड़े, काउंसलर
- कल्पना, नागरिक
- कविता सरीन, जागरूक नागरिक
- पूजा, जागरूक नागरिक
- सपना, फ्रीलांसर
- सलीम साबूवाला, सामाजिक कार्यकर्ता
- गौरव, जागरूक नागरिक
- क्रिश्चियन फर्नांडीस, नागरिक
- विदुर नौडियाल, भारतीय नागरिक
- वेदी सिन्हा, लेखिका व गायिका
- वी. गाडगिल, सेवानिवृत्त नागरिक
- भानुतेज एन., फ्रीलांस लेखक
- बी.एस. कृपाकर, लेखक
- अभिलाष दुरुगकर, विकास पेशेवर
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शीर्ष अदालत इस खुले पत्र और उठाई गई कानूनी दलीलों पर क्या रुख अपनाती है।
2020 के दिल्ली दंगों की FIR 59 का कानूनी ब्यौरा
FIR 59/2020 उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी सबसे अहम और चर्चित FIR है। यह मामला सिर्फ एक स्थान पर हुई हिंसा से संबंधित नहीं है, बल्कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इसे दंगों के पीछे रची गई “बड़ी साजिश” (Larger Conspiracy) के रूप में दर्ज किया था।
1. लीगल बैकग्राउंड (कानूनी पृष्ठभूमि)
- मामला की शुरुआत: 6 मार्च 2020 को स्पेशल सेल द्वारा FIR 59/2020 दर्ज की गई।
- आरोप: पुलिस का कहना है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और NRC के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों की आड़ में हिंसा भड़काने और सड़क जाम करने (“चक्का जाम”) की सोची-समझी योजना बनाई गई थी।
- चार्जशीट: दिल्ली पुलिस ने इस मामले में लगभग 17,000 पन्नों से अधिक की चार्जशीट दाखिल की। इसमें वॉट्सऐप ग्रुप्स की चैट, चंदा, विरोध स्थलों के प्रबंधन और भाषणों को मुख्य सबूत के रूप में पेश किया गया।
- प्रमुख आरोपी: उमर खालिद, शरजील इमाम, खालिद सैफी, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर और तसलीम अहमद सहित कुल 18 लोगों को आरोपी बनाया गया।
2. UAPA और अन्य कानूनी धाराएं
इस मामले में आतंकवाद विरोधी कड़े कानून UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) के साथ-साथ IPC और अन्य अधिनियमों की धाराएं लगाई गई हैं:
- UAPA की मुख्य धाराएं:
- धारा 13: गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए दंड।
- धारा 16: आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए दंड।
- धारा 17: आतंकवादी कृत्यों के लिए धन जुटाने (Funding) का आरोप।
- धारा 18: आतंकवादी कृत्य की साजिश रचने (Conspiracy) का आरोप।
- IPC एवं अन्य धाराएं:
- IPC धारा 120B: आपराधिक साजिश।
- IPC धारा 302 / 307: हत्या और हत्या का प्रयास।
- IPC धारा 153A: धर्म, नस्ल आदि के आधार पर दुश्मनी बढ़ाना।
- इसके अलावा: Arms Act और Public Property Damage Act की धाराएं लागू की गईं।
3. कानूनी स्थिति और विवाद की मुख्य वजह
FIR 59 में सबसे बड़ा कानूनी गतिरोध जमानत के प्रावधानों और मुकदमे की धीमी गति को लेकर है:
- UAPA की धारा 43D(5) की सख्ती: UAPA कानून के तहत यदि अदालत को पुलिस की सामग्री देख कर आरोप प्रथम दृष्टया सही (Prima Facie True) प्रतीत होते हैं, तो जमानत मिलना बेहद कठिन हो जाता है।
- धीमी अदालती प्रक्रिया: मामले में लगभग 900 से अधिक गवाह (Witnesses) बनाए गए हैं। गिरफ्तारी के 5 से 6 साल बीत जाने के बाद भी केस अभी आरोप तय (Charge Framing) होने के चरण में अटका हुआ है।
- जमानत बनाम मौलिक अधिकार (K.A. Najeeb केस): सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम K.A. नजीब मामले में तय किया था कि अगर बिना ट्रायल के बहुत लंबी हिरासत हो जाए, तो संविधान के अनुच्छेद 21 (तेजी से ट्रायल का अधिकार) के तहत सख्त UAPA मामलों में भी जमानत दी जा सकती है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता राहत की मांग करते आ रहे हैं।
FIR 59/2020 इस बात का बड़ा उदाहरण बन चुकी है कि आतंकवाद-रोधी कानूनों में “बिना ट्रायल के लंबी हिरासत” और “संवैधानिक स्वतंत्रता” के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
You can learn more about the constitutional debates surrounding Supreme Court bail rulings under UAPA by watching Supreme Court Reopens UAPA Bail Debate In Umar Khalid Delhi Riots Case.
This video provides important background coverage on the Supreme Court’s deliberations regarding prolonged pre-trial detention under UAPA in the Delhi Riots case.
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब (Union of India v. K.A. Najeeb, 2021) सुप्रीम कोर्ट का एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी फैसला है। यह मामला गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (UAPA) के कड़े प्रावधानों और संविधान द्वारा दिए गए अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के बीच संतुलन तय करता है।
1. K.A. Najeeb मामला क्या था?
- पृष्ठभूमि: के.ए. नजीब पर वर्ष 2010 में केरल में एक प्रोफेसर पर हुए हिंसक हमले का हिस्सा होने का आरोप था, जिसमें UAPA के तहत मामले दर्ज किए गए थे।
- लंबी हिरासत: नजीब को गिरफ्तार किया गया और वह करीब 5 साल तक जेल में अंडर-ट्रायल (बिना सजा तय हुए) बंद रहा। इस दौरान मुकदमे में 270 से अधिक गवाहों से पूछताछ होना बाकी थी, जिससे निकट भविष्य में केस पूरा होने की कोई उम्मीद नहीं थी।
- हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रुख: केरल हाईकोर्ट ने उसकी लंबी हिरासत को देखते हुए उसे जमानत दे दी। इसके खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA/केन्द्र सरकार) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि UAPA के तहत आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती।
2. सुप्रीम कोर्ट का फैसला
फरवरी 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा:
- अनुच्छेद 21 की सर्वोच्चता: संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को “त्वरित सुनवाई” (Speedy Trial) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है।
- सांविधिक रुकावट बनाम संवैधानिक अधिकार: भले ही UAPA कानून की धारा 43D(5) के तहत जमानत पाना बेहद कठिन है, लेकिन कोई भी कानून संविधान के अनुच्छेद 21 से बड़ा नहीं हो सकता।
- बिना सजा के अनिश्चितकालीन कैद नहीं: अगर किसी आरोपी का केस सालों तक शुरू नहीं होता है या उसके जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है, तो उसे अनिश्चितकाल तक जेल में रखना एक तरह से बिना दोष सिद्ध हुए सजा देने जैसा है।
3. UAPA बेल मामलों में इसका इस्तेमाल कैसे होता है?
UAPA की धारा 43D(5) में प्रावधान है कि अगर कोर्ट को प्रथम दृष्टया (Prima Facie) लगता है कि आरोप सच हो सकते हैं, तो जमानत खारिज कर दी जानी चाहिए। लेकिन K.A. Najeeb फैसले ने बचाव पक्ष (Accused) को जमानत मांगने का एक बड़ा संवैधानिक आधार दे दिया है:
- “अत्याधिक देरी” (Prolonged Incarceration) का तर्क: जब भी किसी UAPA केस में आरोपी कई सालों से जेल में होता है (जैसे 4-6 साल) और गवाहों की संख्या बहुत ज्यादा होती है, तो वकील इस फैसले का हवाला देकर कहते हैं कि केस खत्म होने में लंबा समय लगेगा, इसलिए जमानत दी जानी चाहिए।
- संवैधानिक अदालतों का विशेष अधिकार: इस फैसले ने साफ किया कि ट्रायल कोर्ट्स भले ही धारा 43D(5) से बंधी हों, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट (Constitutional Courts) मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए UAPA के कड़े नियमों को दरकिनार कर जमानत दे सकती हैं।
- संतुलन का सिद्धांत: अदालतों में जब राज्य की सुरक्षा (UAPA) और नागरिक की आजादी (Article 21) के बीच टकराव होता है, तब Najeeb फैसले के सिद्धांत का इस्तेमाल करके कोर्ट जमानत याचिका मंजूर करती हैं।
उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य UAPA आरोपियों के मामलों में वकील इसी फैसले को नजीर मानकर अदालत से गुहार लगाते हैं कि सालों तक बिना सजा के जेल में रखना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

