Culture

शहंशाह-ए-कव्वाली नुसरत फतेह अली खान: जिनकी आवाज़ सीमा और समय से परे गूंजती है

नौशाद अख्तर

16 अगस्त को संगीत दुनिया ने शहंशाह-ए-कव्वाली नुसरत फतेह अली खान को याद किया। उन्हें गुज़रे ढाई दशक से अधिक समय हो चुका है, लेकिन उनकी जादुई आवाज़ की गूंज आज भी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और पूरे विश्व में उसी शिद्दत से सुनाई देती है। संगीत की दुनिया तेजी से बदली है, लेकिन सूफी संगीत को आधुनिक युग के साथ जोड़ने का जो काम नुसरत साहब ने किया, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती।

फैसलाबाद से विश्व मंच तक का सफर

नुसरत फतेह अली खान का जन्म 13 अक्टूबर 1948 को पाकिस्तान के फैसलाबाद (तब ल्यालपुर) में हुआ था। उनके परिवार में कव्वाली की लगभग 600 साल पुरानी परंपरा चली आ रही थी। हालाँकि उनके पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर या इंजीनियर बनें, लेकिन नुसरत के भीतर संगीत की लगन इतनी गहरी थी कि उन्होंने इस रास्ते को चुना।

पिता के निधन के बाद उन्होंने परिवार के पुराने गानों और रिकॉर्डिंग्स का अध्ययन किया। अपने अनूठे सुर और ऊँचे स्केल (High Register) में गाने की क्षमता के बल पर वे जल्द ही अपनी पीढ़ी के सबसे बेहतरीन कव्वाल बन गए।

अंतरराष्ट्रीय पहचान और नए प्रयोग

1980 के दशक में नुसरत साहब ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शन करना शुरू किया। 1985 में ब्रिटेन में उनके कॉन्सर्ट के बाद उनकी प्रसिद्धि पूरी दुनिया में फैली। पश्चिमी संगीतकारों जैसे पीटर गेब्रियल (Peter Gabriel) और माइकल ब्रुक (Michael Brook) के साथ मिलकर उन्होंने सूफी संगीत को एक नए अंदाज में पेश किया।

उन्होंने कव्वाली में तेज़ी लाई और पश्चिमी तालमेल का इस्तेमाल किया, जिससे यह विधा दुनिया भर के युवाओं के बीच लोकप्रिय हुई। उनके नाम 125 से अधिक एल्बम रिकॉर्ड करने का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी दर्ज है।

बॉलीवुड से लेकर डिजिटल दौर तक मौजूदगी

भारत में नुसरत फतेह अली खान के प्रशंसकों की संख्या बेहद विशाल है। उनके कई प्रसिद्ध सूफी कलाम और कव्वालियों का इस्तेमाल बॉलीवुड की फिल्मों में भावनाओं को गहरा करने के लिए किया गया। ‘कोक स्टूडियो’ हो या आज का रील्स और टिकटॉक का दौर, युवा पीढ़ी आज भी दिल के दर्द या आध्यात्मिक जुड़ाव को महसूस करने के लिए उनके गानों का सहारा लेती है।

16 अगस्त 1997 को मात्र 48 वर्ष की आयु में लंदन में इलाज के दौरान उनका अचानक निधन हो गया था। उनके जाने के बाद राहत फतेह अली खान जैसे कई कलाकारों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया, लेकिन नुसरत साहब की मौलिक गायकी और मंच पर उनकी रूहानी ऊर्जा की जगह आज भी खाली है।

कव्वाली संगीत का संक्षिप्त परिचय

कव्वाली मूल रूप से सूफी मुस्लिम कविता का एक संगीतमय प्रदर्शन है, जिसका उद्देश्य श्रोताओं को एक आध्यात्मिक और रूहानी अनुभव की ओर ले जाना होता है।

  • उत्पत्ति: यह शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘कौल’ (Qaul) से बना है, जिसका अर्थ होता है ‘कहना’।
  • प्रस्तुति शैली: इसमें मुख्य गायक के साथ कोरस गायक, हारमोनियम और तबला या ढोलक की संगत होती है।
  • संगीत संरचना: कव्वाली में मुख्य रूप से तालियों की लय, दोहराव और उच्च स्वर की गायकी का प्रयोग किया जाता है।

पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से तुलनात्मक अवलोकन

जहाँ कव्वाली सूफी परंपरा की मौखिक और भावुक अभिव्यक्ति है, वहीं पश्चिमी शास्त्रीय संगीत (Western Classical Music) एक विस्तृत और लिखित परंपरा पर आधारित है।

विशेषतासूफी कव्वाली (Qawwali)पश्चिमी शास्त्रीय संगीत (Western Classical Music)
मुख्य उद्देश्यआध्यात्मिक आनंद और ईश्वर से जुड़ावशास्त्रीय रचना, तकनीकी दक्षता और बौद्धिक अभिव्यक्ति
प्रमुख वाद्य यंत्रहारमोनियम, तबला, ढोलकपियानो, वायलिन, सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा
गायन शैलीस्वर-विस्तार (Improvisation) और ऊँचा स्केललिखित स्वरलिपि (Staff Notation) का सख्त पालन
प्रसिद्ध हस्तियांनुसरत फतेह अली खान, अज़ीज़ मियाँबाख (Bach), मोज़ार्ट (Mozart), बीथोवेन (Beethoven)

नुसरत फतेह अली खान ने साबित किया कि सच्चा संगीत सीमाओं में नहीं बंधता। उनकी आवाज़ आज भी दुनिया भर के लोगों को जोड़ने का एक मजबूत जरिया बनी हुई है।

Nusrat Fateh Ali Khan Shaam Savere

यह वीडियो नुसरत फतेह अली खान की प्रसिद्ध सूफी कव्वाली का एक सुंदर उदाहरण है, जो उनकी अनूठी गायकी और आध्यात्मिक प्रभाव को दर्शाता है।

Shaam Savere Nain Bicha Kar (Lyric Video) | Nusrat Fateh Ali Khan | Heart Touching Qawwali

Oriental Star Agencies Ltd · 27K views

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *