Culture

मॉब लिंचिंग इन इंडिया: 2010 से 2024 तक की पूरी कहानी

नौशाद अख्तर

भारत में मॉब लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा पीट पीटकर हत्या की घटनाओं को लेकर एक नई पुस्तक चर्चा में है। ‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया 2010 2024’ नाम की इस पुस्तक में देश में हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया है। पुस्तक के लेखक डॉ. जफरूल इस्लाम हैं। इसका औपचारिक विमोचन मंगलवार, 22 सितंबर को नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में किया जाएगा।

पुस्तक के प्रकाशन को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब देश में भीड़ हिंसा, कथित मॉब लिंचिंग और धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। पुस्तक का उद्देश्य 2010 से 2024 के बीच सामने आई घटनाओं को एक जगह दर्ज करना बताया गया है।

जमिअत उलेमा ए हिंद भी समय समय पर मुसलमानों के खिलाफ कथित उत्पीड़न और हिंसा से जुड़े मामलों को सोशल मीडिया तथा अन्य माध्यमों से सामने लाता रहा है। अब मॉब लिंचिंग पर एक पुस्तक के माध्यम से घटनाओं को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने की कोशिश की गई है।

2010 से 2024 तक की घटनाओं पर फोकस

‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया 2010 2024’ का मुख्य फोकस भारत में भीड़ हिंसा और मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर है। पुस्तक के विवरण के मुताबिक इसमें खास तौर पर 2014 से 2024 के बीच दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्रों और न्यूज पोर्टलों में सामने आई घटनाओं को आधार बनाया गया है।

पुस्तक के लेखक डॉ. जफरूल इस्लाम ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पुस्तक के विमोचन की जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, मंगलवार 22 सितंबर को दोपहर 3 बजे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में 2014 से 2024 के दौरान हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर विस्तृत अध्ययन और रिकॉर्ड जारी किया जाएगा।

उन्होंने मीडिया से इस कार्यक्रम में शामिल होने की अपील भी की है।

मॉब लिंचिंग पर दस्तावेजीकरण क्यों अहम

किसी घटना को तत्काल समाचार के रूप में पढ़ा जाता है। कुछ समय बाद वही घटना लोगों की याद से दूर हो सकती है। लेकिन जब घटनाओं को दस्तावेज, रिपोर्ट या पुस्तक के रूप में एक जगह दर्ज किया जाता है तो भविष्य में उनका अध्ययन करना आसान हो जाता है।

इसी नजरिए से इस पुस्तक का महत्व उसके समर्थकों द्वारा देखा जा रहा है। मॉब लिंचिंग पर अलग अलग समय में सामने आई घटनाएं देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़ी रही हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित, घटना का कारण, स्थान, पुलिस कार्रवाई और उसके बाद की स्थिति जैसे सवाल लगातार चर्चा में रहे हैं।

नई पुस्तक इन घटनाओं को एक विस्तृत रिकॉर्ड के रूप में प्रस्तुत करने का दावा करती है।

कार्यक्रम में कौन कौन होंगे मौजूद

नई दिल्ली में होने वाले पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में कई जानी मानी हस्तियों के शामिल होने की जानकारी दी गई है।

कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, शिक्षाविद और टिप्पणीकार अपूर्वानंद, अधिवक्ता अदित्या रामाकृष्णन, गल्फ देशों के मीडिया में लंबे समय तक महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके शाहीन नजर, लेखक और विचारक डॉ. जफरूल इस्लाम, जमात ए इस्लामी हिंद से जुड़े मलिक मोहतशिम खान और प्रशांत टंडन के शामिल होने की बात कही गई है।

कार्यक्रम में मॉब लिंचिंग, भीड़ हिंसा, कानून व्यवस्था, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत में बढ़ती सामाजिक हिंसा जैसे विषयों पर चर्चा की संभावना है।

हालांकि, कार्यक्रम में शामिल होने वाले सभी लोगों की ओर से पुस्तक के प्रत्येक निष्कर्ष का समर्थन किया गया है, ऐसा कहना उपलब्ध जानकारी के आधार पर उचित नहीं होगा। उनकी मौजूदगी को कार्यक्रम में भागीदारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

पुस्तक में क्या बताया गया है

पुस्तक के अमेजन विवरण में मॉब लिंचिंग को भारत में 21वीं सदी में उभरती भीड़ हिंसा के एक रूप के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। विवरण में कहा गया है कि भारत में भीड़ द्वारा हिंसा कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है। इसमें 1984 के सिख विरोधी दंगों और 2002 के गुजरात दंगों का संदर्भ भी दिया गया है।

पुस्तक का विवरण आगे दावा करता है कि 2014 के बाद मॉब लिंचिंग की घटनाओं ने एक अलग स्वरूप लिया और सोशल मीडिया पर ऐसी घटनाएं लगातार चर्चा में आने लगीं।

यह पुस्तक खास तौर पर 2014 से 2024 के दौरान सामने आई घटनाओं पर केंद्रित बताई गई है। इसके लिए दिल्ली आधारित अखबारों और समाचार पोर्टलों में प्रकाशित रिपोर्टों को आधार बनाने की बात कही गई है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अमेजन पर दिया गया विवरण पुस्तक और उसके लेखक या प्रकाशक की प्रस्तुति है। उसमें किए गए सभी व्यापक निष्कर्षों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

गोमांस से जुड़े विवाद से शुरू हुई बहस का दावा

पुस्तक के विवरण में कहा गया है कि भारत में हाल के वर्षों में मॉब लिंचिंग से जुड़े कई मामले गोमांस और कथित गोहत्या के आरोपों से जुड़े रहे हैं। इसके बाद लेखक का दावा है कि भीड़ हिंसा दूसरे विवादों और आरोपों तक भी फैलती गई।

ऐसे मामलों में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि किसी व्यक्ति पर आरोप लगने के बाद कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार भीड़ को किसने दिया। भारतीय कानून में अपराध के आरोप की जांच पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया के जरिए होती है। किसी आरोपी के खिलाफ हिंसा कानून की प्रक्रिया का विकल्प नहीं है।

यही वजह है कि मॉब लिंचिंग को लेकर कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया पर भी बहस होती रही है।

मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का मुद्दा

पुस्तक का एक प्रमुख फोकस मुसलमानों के खिलाफ कथित मॉब लिंचिंग और भीड़ हिंसा के मामलों पर है। लेखक के अनुसार, 2014 से 2024 के दौरान सामने आई कई घटनाओं में मुस्लिम पीड़ितों के मामले शामिल रहे हैं।

जमिअत उलेमा ए हिंद सहित कई मुस्लिम संगठनों ने भी समय समय पर ऐसे मामलों को उठाया है। इन संगठनों की ओर से मांग की जाती रही है कि हिंसा के मामलों में निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

मॉब लिंचिंग के मामलों में पीड़ित की पहचान, घटना का स्थान, आरोपों की प्रकृति, पुलिस की कार्रवाई और अदालत में मामले की स्थिति जैसे तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं। किसी भी घटना को समझने के लिए इन सभी पहलुओं को अलग अलग देखना जरूरी है।

सोशल मीडिया से पुस्तक तक पहुंचा दस्तावेजीकरण

आज के दौर में किसी घटना की शुरुआती जानकारी अक्सर सोशल मीडिया के जरिए सामने आती है। इसके बाद समाचार वेबसाइट और अखबार उस घटना को रिपोर्ट करते हैं। लेकिन सोशल मीडिया पोस्ट समय के साथ खोज पाना मुश्किल हो सकता है।

ऐसे में पुस्तकों और शोध रिपोर्टों के जरिए घटनाओं का रिकॉर्ड तैयार करना अलग महत्व रखता है। ‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया 2010 2024’ को इसी तरह के दस्तावेजी प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक के लेखक डॉ. जफरूल इस्लाम ने भी सोशल मीडिया पर इसके विमोचन की सूचना साझा की है। कार्यक्रम 22 सितंबर 2026 को दोपहर 3 बजे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में प्रस्तावित है।

भारत में मॉब लिंचिंग पर आगे की बहस

मॉब लिंचिंग केवल कानून व्यवस्था का विषय नहीं है। इससे जुड़े मामलों में सामाजिक तनाव, धार्मिक पहचान, अफवाह, सोशल मीडिया, पुलिस की भूमिका और न्यायिक प्रक्रिया जैसे कई पहलू सामने आते हैं।

इसी वजह से इन घटनाओं का दस्तावेजीकरण शोधकर्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि किसी भी संकलन को पढ़ते समय स्रोतों, घटनाओं के रिकॉर्ड और उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच भी जरूरी है।

‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया 2010 2024’ इसी बहस को एक पुस्तक के रूप में सामने लाने की कोशिश है। इसका विमोचन नई दिल्ली में होने जा रहा है। इसके बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुस्तक में दर्ज घटनाओं, आंकड़ों और निष्कर्षों पर सामाजिक संगठनों, शोधकर्ताओं, कानून विशेषज्ञों और अन्य पक्षों की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।

फिलहाल पुस्तक ने भारत में मॉब लिंचिंग, भीड़ हिंसा, मुस्लिमों के खिलाफ कथित हिंसा और 2014 से 2024 के दौरान दर्ज मामलों को लेकर एक नई सार्वजनिक चर्चा की जमीन तैयार कर दी है।

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