अमेरिका-ईरान जंग से किसे कितना नुकसान? GDP का पूरा हिसाब
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नौशाद अख्तर
मिडिल ईस्ट में अमेरिका और इज़राइल का ईरान के साथ संघर्ष लगातार जारी है। इस जंग की वजह से क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बेहद बुरा असर पड़ा है। गल्फ मीडिया में अक्सर दावा किया जाता है कि सबसे अधिक नुकसान ईरान को ही हुआ है। हालांकि आधिकारिक आंकड़ों से साफ होता है कि गल्फ देशों को भी भारी आर्थिक चपत लगी है।
ईरान के स्टैटिस्टिकल सेंटर द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार मार्च के अंत से जून के अंत तक ईरान की जीडीपी में 10.1% की सालाना गिरावट आई है। यह अवधि ईरान के फ़ारसी कैलेंडर की पहली तिमाही मानी जाती है। फरवरी के आखिर में शुरू हुए हमलों के बाद से ही ईरान की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा है।
हॉर्मुज की जलडमरूमध्य यानी स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही ठप होने से तेल निर्यात रुक गया। इसका सबसे बड़ा असर सिर्फ ईरान पर ही नहीं बल्कि कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब पर भी देखने को मिल रहा है।

मिडिल ईस्ट युद्ध का किस देश पर कितना असर?
| देश | जीडीपी में अनुमानित गिरावट | मुख्य वजह |
| ईरान | 10.1% से 15% | तेल निर्यात रुकना, तेल रिफाइनरी और इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान |
| कतर | 8.6% से 9% | एलएनजी (LNG) निर्यात पूरी तरह से ठप होना |
| संयुक्त अरब अमीरात (UAE) | 3% से 5% | व्यापार, विमानन सेक्टर और पर्यटन उद्योग प्रभावित होना |
| सऊदी अरब | 3% | क्षेत्रीय अस्थिरता और कच्चे तेल का काम बाधित होना |
| कुवैत | गंभीर मंदी | ऊर्जा उत्पादन पर अत्यधिक निर्भरता |
2.2 ट्रिलियन डॉलर का संभावित वैश्विक नुकसान
ग्लोबल पीस इंडेक्स 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह जंग दोबारा पूरी तरह से छिड़ जाती है तो दुनिया की अर्थव्यवस्था को 2.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
28 फरवरी 2026 को शुरू हुए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बाद जब ईरान ने मार्च की शुरुआत में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को बंद किया तो कच्चे तेल की आपूर्ति अचानक रुक गई। रोजाना लगभग 1.3 करोड़ बैरल तेल का निर्यात रुक गया। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इसे इतिहास की सबसे बड़ी ऊर्जा सुरक्षा चुनौती बताया।
अप्रैल और मई में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। आम तौर पर तेल की कीमत बढ़ने से उत्पादक देशों की कमाई बढ़ती है। मगर इस बार स्थिति अलग थी। गल्फ देश अपना तेल बाजार तक पहुंचा ही नहीं पाए। उत्पादक देशों को दोहरा नुकसान झेलना पड़ा। उनका निर्यात राजस्व घट गया और आयात लागत तेजी से बढ़ गई।

दुनिया भर में सप्लाई चेन और व्यापार पर प्रभाव
- शिपिंग रूट में बदलाव: जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से से होकर जाना पड़ रहा है। इससे डिलीवरी में लगभग दो हफ्ते का ज्यादा समय लग रहा है।
- बीमा और माल भाड़ा महंगा: शिपिंग रिस्क और इंश्योरेंस प्रीमियम 10 गुना तक बढ़ चुके हैं।
- खाद संकट का खतरा: गल्फ देश दुनिया का 45% सल्फर और 50% यूरिया सप्लाई करते हैं। इसकी किल्लत से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी।
- रेमिटेंस पर चोट: मिस्र, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों में विदेशों से आने वाले पैसे यानी रेमिटेंस में कमी आई है।
युद्ध खत्म करने और कूटनीतिक समाधान निकालने से दुनिया भर को आर्थिक मजबूती मिल सकती है। आर्थिक नुकसान की भरपाई में सालों लग सकते हैं।
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