Muslim World

गया जी का आबगीला, जहां 800 साल पुराना इतिहास आज भी जिंदा है

नौशाद अख्तर

बिहार के गया जी का नाम आते ही आम तौर पर बोधगया, महाबोधि मंदिर और फल्गु नदी की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इसी गया शहर में एक ऐसी पुरानी बस्ती भी है, जिसकी गलियों में इतिहास की कई परतें छिपी होने का दावा किया जाता है। नाम है आबगीला।

आबगीला को लेकर स्थानीय इतिहास और बुजुर्गों की स्मृतियों में कई दिलचस्प बातें मिलती हैं। दावा किया जाता है कि इस इलाके का इतिहास करीब 800 साल पुराना है। यहां रहने वाले कुछ परिवार अपने वंश और इस बस्ती के संबंध को सदियों पुरानी परंपरा से जोड़ते हैं।

इसी आबगीला में हमारी मुलाकात सैयद नजम इमाम से हुई। वह अपने परिवार की मौजूदगी को करीब 248 वर्षों से इस इलाके से जुड़ा बताते हैं। उनके मुताबिक, आबगीला का इतिहास उनके परिवार के यहां बसने से कहीं पुराना है।

लेकिन आबगीला की कहानी केवल एक पुरानी बस्ती की कहानी नहीं है। सैयद नजम इमाम के अनुसार, इस इलाके का संबंध ईरान के मशहद, दिल्ली की पुरानी मस्जिदों और बिहार की सूफी परंपरा से जोड़ने वाले कई ऐतिहासिक संदर्भ किताबों में मिलते हैं।

आबगीला का इतिहास किन किताबों में मिलता है?

सैयद नजम इमाम ने बातचीत में कई पुस्तकों का उल्लेख किया। इनमें मौलाना मोहम्मद तहा कमाल नदवी की हयात फरीद, मौलाना सैयद रियासत अली नदवी की अहद इस्लामी का हिंदुस्तान और सैयद अहमद उल्लाह नदवी की तज्किरा मुस्लिम शोरा बिहार शामिल हैं।

इसके अलावा उन्होंने फारसी भाषा की पुस्तक कंजुल अंसार का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इन पुस्तकों में आबगीला और यहां रहने वाले बुजुर्गों का किसी न किसी रूप में उल्लेख मिलता है।

यहीं से आबगीला की कहानी और दिलचस्प हो जाती है। क्योंकि अलग अलग पुस्तकों में इस बस्ती से जुड़े बुजुर्गों और उनके संबंधों को लेकर अलग संदर्भ सामने आते हैं।

मखदूम शामीना रिजवी मशहदी का जिक्र

आबगीला की इस कहानी के केंद्र में हजरत मखदूम शामीना रिजवी मशहदी का नाम आता है। सैयद नजम इमाम के अनुसार, कुछ ऐतिहासिक पुस्तकों में उन्हें आबगीला से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बुजुर्ग बताया गया है।

मौलाना मोहम्मद तहा कमाल नदवी की किताब के हवाले से वह बताते हैं कि मखदूम शामीना रिजवी मशहदी दो भाइयों में से एक थे। एक भाई दिल्ली की एक महत्वपूर्ण मस्जिद से जुड़े बताए जाते हैं, जबकि दूसरे के कड़ा मानिकपुर होते हुए आबगीला पहुंचने का उल्लेख मिलता है।

हालांकि, इसी बिंदु पर एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा होता है। दिल्ली की ऐतिहासिक मस्जिद से जुड़े परिवार और आबगीला के सैयद परिवार के संबंध को लेकर अलग अलग विवरण मिलते हैं।

सैयद नजम इमाम का कहना है कि इस मामले में बुखारा और मशहद के बीच अंतर को समझना जरूरी है।

बुखारा या मशहद, कहां से आया सिलसिला?

दिल्ली की शाही जामा मस्जिद से जुड़े बुखारी परिवार का संदर्भ सामने रखते हुए सैयद नजम इमाम कहते हैं कि दिल्ली के बुखारी परिवार का संबंध बुखारा से बताया जाता है। दूसरी ओर आबगीला से जुड़े जिस बुजुर्ग का उल्लेख वह करते हैं, उन्हें मशहद से जोड़ते हैं।

मशहद ईरान का एक प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक शहर है। यहां इमाम अली रजा का प्रसिद्ध रौजा है।

सैयद नजम इमाम का दावा है कि आबगीला के सादात अपने नसब को मखदूम शामीना रिजवी मशहदी से जोड़ते हैं। उनके अनुसार, यह सिलसिला आगे चलकर इमाम अली रजा तक पहुंचता है।

हालांकि, वह यह भी स्वीकार करते हैं कि पुराने दौर का पूरा नसबनामा उपलब्ध कराना आसान नहीं है। यही वजह है कि इस विषय को समझने के लिए अलग अलग ऐतिहासिक पुस्तकों और संदर्भों को साथ पढ़ने की जरूरत पड़ती है।

कंजुल अंसार में क्या मिलता है?

सैयद नजम इमाम ने कंजुल अंसार का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, इस पुस्तक में आबगीला के सादात और मखदूम शामीना रिजवी मशहदी का जिक्र मिलता है।

उनका कहना है कि पुस्तक में मखदूम शामीना रिजवी मशहदी को आबगीला से जुड़े बुजुर्ग के रूप में पेश किया गया है और उनके नसब को इमाम अली रजा से जोड़ने की बात कही गई है।

लेकिन यहां भी इतिहास की अपनी सीमा है। सदियों पुराने परिवारों के नसबनामे को लेकर उपलब्ध सामग्री कई बार अधूरी होती है। कुछ नाम बाद की पुस्तकों में दर्ज होते हैं। कुछ विवरण मौखिक परंपरा से आगे बढ़ते हैं।

इसी वजह से आबगीला की कहानी को स्थानीय इतिहास, पुस्तकीय संदर्भ और पारिवारिक परंपरा तीनों के स्तर पर देखना ज्यादा उपयोगी होगा।

तुगलक काल से जुड़ता है आबगीला

आबगीला की उम्र को लेकर भी स्थानीय स्तर पर एक दिलचस्प दावा है। सैयद नजम इमाम इसे करीब 800 साल पुरानी बस्ती बताते हैं। उनका कहना है कि इस इलाके का इतिहास तुगलक काल तक जाता है।

यहीं एक और महत्वपूर्ण संदर्भ सामने आता है। उन्होंने मौलाना अहमद उल्लाह नदवी की रचनाओं का हवाला देते हुए कहा कि आबगीला से जुड़े एक बुजुर्ग के बारे में दिल्ली की शाही जामा मस्जिद के बजाय तुगलकी मस्जिद से संबंध का उल्लेख मिलता है।

यह अंतर मामूली नहीं है। क्योंकि इससे पूरी ऐतिहासिक कहानी का कालखंड बदल जाता है।

अगर किसी बुजुर्ग का संबंध तुगलक काल की मस्जिद से था, तो उसका समय दिल्ली सल्तनत के उसी दौर में तलाशना होगा। वहीं बाद की मुगलकालीन मस्जिदों से जोड़ने पर संदर्भ अलग हो जाता है।

मखदूम बिहारी से जुड़ा एक और संदर्भ

सैयद नजम इमाम ने मखदूम शर्फुद्दीन बिहारी से जुड़े एक प्रसंग का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, मखदूम बिहारी के अंतिम समय से जुड़ी एक روایت में उनके शिष्यों को बुलाने का वर्णन मिलता है।

बताया जाता है कि मखदूम बिहारी अपने मुरीदों से एक एक करके मिले। इसी दौरान उन्होंने काजी मीना को बुलाने के लिए कहा। काजी मीना के आने पर उन्होंने उनका हाथ चूमा और उन्हें दुआ दी।

सैयद नजम इमाम के मुताबिक, इस प्रसंग को मौलाना अबुल हसन अली नदवी की तारीख दावत और जिम्मेदारी तथा मखदूम बिहारी से जुड़ी अन्य सामग्री में भी देखा जा सकता है।

उनका मानना है कि यह संदर्भ आबगीला से जुड़े तुगलकी मस्जिद वाले विवरण के साथ मेल खाता है। हालांकि, यह उनकी प्रस्तुत ऐतिहासिक व्याख्या है और इसके लिए अलग से मूल ऐतिहासिक ग्रंथों की जांच जरूरी होगी।

आबगीला केवल एक मोहल्ला नहीं

आबगीला की गलियों में घूमते हुए इसकी कहानी को केवल एक स्थानीय बस्ती के इतिहास के तौर पर देखना आसान है। लेकिन स्थानीय लोगों की मानें तो इसके पीछे सूफी परंपरा, सादात परिवारों, ईरान के मशहद और मध्यकालीन बिहार तथा दिल्ली के बीच संबंधों की लंबी कहानी है।

यही वजह है कि आबगीला को लेकर स्थानीय स्मृतियां आज भी जीवित हैं। परिवार अपने बुजुर्गों की बातें आगे पहुंचाते हैं। पुरानी किताबों के संदर्भ खोजे जाते हैं। नसबनामों की चर्चा होती है।

इतिहास की दिलचस्पी भी यहीं से शुरू होती है। किसी जगह का इतिहास केवल पत्थरों, इमारतों और तारीखों में नहीं रहता। वह लोगों की यादों, किताबों और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों में भी मौजूद रहता है।

गया का आबगीला इसी अर्थ में खास दिखाई देता है। एक तरफ यह सदियों पुरानी बस्ती होने का दावा करता है। दूसरी तरफ यहां की पारिवारिक परंपराएं इसे बिहार की सूफी और मुस्लिम विरासत से जोड़ती हैं।

ईरान के मशहद से लेकर गया के आबगीला और दिल्ली की पुरानी मस्जिदों तक फैले इन संदर्भों को इतिहास की कसौटी पर परखना अभी बाकी है। लेकिन इतना जरूर है कि आबगीला की कहानी आम नजर से कहीं ज्यादा दिलचस्प है।

AEO के लिए मुख्य सवाल

आबगीला कहां स्थित है?
आबगीला गया शहर, बिहार में स्थित एक पुराना इलाका है।

आबगीला कितने पुराने इतिहास से जुड़ा बताया जाता है?
स्थानीय जानकारी के अनुसार, आबगीला का इतिहास करीब 800 साल पुराना बताया जाता है।

आबगीला का संबंध किस ऐतिहासिक बुजुर्ग से बताया जाता है?
सैयद नजम इमाम के अनुसार, आबगीला का संबंध हजरत मखदूम शामीना रिजवी मशहदी से जोड़ा जाता है।

मशहद का आबगीला से क्या संबंध बताया जाता है?
स्थानीय दावे के अनुसार, आबगीला के सादात का नसब मखदूम शामीना रिजवी मशहदी के माध्यम से मशहद से जुड़ता है।

आबगीला के इतिहास पर किन किताबों का उल्लेख किया गया है?
बातचीत में हयात फरीद, अहद इस्लामी का हिंदुस्तान, तज्किरा मुस्लिम शोरा बिहार और फारसी पुस्तक कंजुल अंसार का उल्लेख किया गया।

आबगीला को तुगलक काल से क्यों जोड़ा जाता है?
स्थानीय ऐतिहासिक व्याख्या के अनुसार, कुछ संदर्भ आबगीला और तुगलक काल की मस्जिदों से जुड़े बुजुर्गों के संबंध की ओर संकेत करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *