शालीमार बाग मस्जिद कार्रवाई पर जमाअत ने उठाए सवाल
Table of Contents
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
दिल्ली के शालीमार बाग में मदीना मस्जिद के एक हिस्से को देर रात हटाए जाने की कार्रवाई को लेकर विवाद बढ़ गया है। जमाअत ए इस्लामी हिंद ने इस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। संगठन के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने कहा है कि जब मस्जिद से जुड़ा मामला कानूनी प्रक्रिया में था, तब तोड़फोड़ की कार्रवाई क्यों की गई, इसकी पारदर्शी जांच होनी चाहिए।
मलिक मोतसिम खान ने अपने बयान में दिल्ली नगर निगम यानी एमसीडी की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कार्रवाई का आदेश किस स्तर पर दिया गया था। उन्होंने यह भी पूछा कि कार्रवाई देर रात क्यों की गई और मस्जिद के किन हिस्सों को हटाने का फैसला लिया गया था।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक एमसीडी और प्रशासन की ओर से इस कार्रवाई को सड़क चौड़ीकरण और कथित अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। अधिकारियों के अनुसार, मैक्स हॉस्पिटल रोड को चौड़ा करने की परियोजना के तहत सड़क की सीमा में आने वाले ढांचों को हटाया गया। इस कार्रवाई में मदीना मस्जिद का कुछ हिस्सा और आसपास के कई मकान भी प्रभावित हुए।
ALSO READ
शरिया अभियान पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने उठाए सवाल
शरिया अभियान पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने उठाए सवाल
देर रात हुई कार्रवाई से बढ़ा विवाद
शालीमार बाग में मैक्स हॉस्पिटल रोड पर मंगलवार देर रात से बुधवार तड़के तक कार्रवाई चली। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद थे। बुलडोजर और अन्य मशीनों की मदद से मस्जिद के हिस्से और आसपास के कुछ ढांचों को हटाया गया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एमसीडी अधिकारियों का कहना था कि कार्रवाई सड़क चौड़ीकरण की योजना का हिस्सा थी और संबंधित संपत्तियों को लेकर पहले नोटिस जारी किए गए थे। दूसरी तरफ मस्जिद प्रबंधन और स्थानीय लोगों ने नोटिस की प्रक्रिया और कार्रवाई के समय को लेकर सवाल उठाए।
इसी विरोधाभास ने पूरे मामले को कानूनी और प्रशासनिक बहस का विषय बना दिया है। एक तरफ नगर निगम की ओर से सड़क चौड़ीकरण और अतिक्रमण हटाने का पक्ष सामने आया है। दूसरी तरफ मस्जिद से जुड़े लोगों का कहना है कि मामला कानूनी प्रक्रिया में था और उन्हें कार्रवाई से पहले पर्याप्त समय नहीं मिला।
मलिक मोतसिम खान ने क्या कहा
जमाअत ए इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने कहा कि मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई उस समय हुई, जब मामला अपीलेट ट्रिब्यूनल के सामने था। उनके मुताबिक, 15 सितंबर को ट्रिब्यूनल की ओर से अगली सुनवाई तक मस्जिद के ग्राउंड फ्लोर के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया गया था।
खान के बयान के अनुसार, 21 सितंबर को वकीलों के काम से दूरी के कारण मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। इसके बाद अंतरिम व्यवस्था को 3 दिसंबर तक जारी रखने का निर्देश दिया गया था। उन्होंने इसी आधार पर सवाल उठाया कि जब मामला ट्रिब्यूनल के सामने था, तब नगर निगम ने कार्रवाई क्यों की।
इन कानूनी आदेशों के विवरण की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में उपलब्ध दस्तावेज के आधार पर नहीं की जा सकी है। एमसीडी के अपीलेट ट्रिब्यूनल की आधिकारिक वेबसाइट पर सितंबर 2026 के दैनिक आदेश उपलब्ध हैं, लेकिन संबंधित आदेश की पूरी सामग्री इस रिपोर्ट के लिए सीधे सत्यापित नहीं हो सकी।
कार्रवाई के समय पर भी सवाल
मलिक मोतसिम खान ने मस्जिद के हिस्से को हटाने के समय पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि 22 और 23 सितंबर की रात हुई कार्रवाई के तरीके की जांच होनी चाहिए।
उनका कहना है कि अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि तोड़फोड़ का आदेश किन हिस्सों के लिए था। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कार्रवाई के समय कानूनी प्रक्रिया की स्थिति क्या थी।
देर रात हुई कार्रवाई की पुष्टि कई मीडिया रिपोर्टों में हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, कार्रवाई मंगलवार देर रात शुरू हुई और बुधवार सुबह तक चली। रिपोर्ट में बताया गया कि पुलिस की भारी मौजूदगी के बीच मस्जिद के कुछ हिस्सों और कई मकानों को हटाया गया।
धार्मिक सामग्री हटाने का आरोप
जमाअत ए इस्लामी हिंद ने यह भी कहा है कि मस्जिद से जुड़े लोगों की ओर से आरोप लगाया गया कि तोड़फोड़ से पहले कुरआन और अन्य धार्मिक सामग्री हटाने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया।
यह आरोप गंभीर है। लेकिन इसे फिलहाल संबंधित लोगों का आरोप ही माना जाना चाहिए। स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं हुई है।
इसी तरह की बात AIMIM दिल्ली के अध्यक्ष शोएब जमई ने भी मौके पर पहुंचने के बाद कही थी। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने आरोप लगाया कि मस्जिद के इमाम को दस्तावेज और कुरआन की प्रतियां बाहर निकालने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया।
दूसरी ओर, नगर निगम से जुड़े अधिकारियों का कहना था कि संबंधित ढांचों को हटाने से पहले नोटिस दिए गए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में भी एमसीडी के सूत्रों के हवाले से कहा गया कि कार्रवाई से पहले नोटिस जारी किए गए थे।
सड़क चौड़ीकरण है कार्रवाई की वजह
इस मामले को समझने के लिए सड़क चौड़ीकरण की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। मैक्स हॉस्पिटल रोड को चौड़ा करने की परियोजना के तहत इस इलाके में पहले भी कुछ निर्माण हटाए गए थे।
इंडिया टुडे और अन्य मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मदीना मस्जिद और आसपास के कुछ मकान सड़क चौड़ीकरण की सीमा में आने वाले कथित अतिक्रमण के रूप में चिन्हित किए गए थे। नगर निगम ने इसी आधार पर कार्रवाई की।
दिल्ली हाईकोर्ट के अप्रैल 2026 के एक आदेश में भी शालीमार बाग इलाके में सड़क चौड़ीकरण से जुड़ा पुराना विवाद दर्ज है। अदालत के सामने रखे गए रिकॉर्ड में रोड नंबर 320 को 30 मीटर चौड़ा करने की प्रस्तावित योजना और उससे जुड़े भूमि विवाद का उल्लेख है। अदालत के दस्तावेज में यह भी दर्ज है कि पहले सड़क को इस तरह चौड़ा करने की योजना पर चर्चा हुई थी, जिससे वहां मौजूद लोगों के मकानों को प्रभावित न किया जाए।
इस पृष्ठभूमि से स्पष्ट है कि शालीमार बाग में सड़क चौड़ीकरण का मुद्दा नया नहीं है। हालांकि, मदीना मस्जिद पर हुई ताजा कार्रवाई को लेकर उठे कानूनी सवाल अलग से जांच का विषय हैं।
मस्जिद प्रबंधन ने भी प्रक्रिया पर सवाल उठाए
मीडिया रिपोर्टों में मदीना मस्जिद के प्रतिनिधियों के हवाले से कहा गया है कि उन्होंने कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने की कोशिश की थी। मस्जिद प्रबंधन ने नोटिसों के क्रम और कार्रवाई की जल्दबाजी पर सवाल उठाए।
आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, मस्जिद के प्रमुख मोविन खान ने दावा किया कि दस्तावेजों की स्पष्ट प्रतियां हासिल करने और जवाब तैयार करने के लिए आवेदन किया गया था। इसके बाद भी नगर निगम की ओर से लगातार नोटिस जारी किए गए।
इस दावे और एमसीडी के पक्ष के बीच अंतर है। इसलिए मामले की पूरी तस्वीर सामने आने के लिए संबंधित नोटिस, आदेश और ट्रिब्यूनल के रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे।
जमाअत ने पारदर्शी जांच की मांग की
मलिक मोतसिम खान ने कहा कि कार्रवाई की पारदर्शी जांच होनी चाहिए। उनका सवाल केवल मस्जिद के हिस्से को गिराए जाने तक सीमित नहीं है। वह यह भी जानना चाहते हैं कि कार्रवाई का निर्णय किस अधिकारी या संस्था ने लिया और उस समय कानूनी स्थिति क्या थी।
उन्होंने कहा कि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ा विवाद केवल प्रशासनिक कार्रवाई से खत्म नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
जमाअत ए इस्लामी हिंद ने यह भी कहा कि दिल्ली के मुसलमान अपने धार्मिक आस्था, पहचान, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को लेकर समझौता नहीं करेंगे।
आगे क्या हो सकता है
शालीमार बाग की मदीना मस्जिद का मामला अब केवल स्थानीय प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। एमसीडी की कार्रवाई, सड़क चौड़ीकरण, कथित अतिक्रमण, मस्जिद प्रबंधन के दावे और अपीलेट ट्रिब्यूनल की कथित अंतरिम व्यवस्था सभी जांच के दायरे में हैं।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि कार्रवाई के समय संबंधित कानूनी आदेशों की वास्तविक स्थिति क्या थी। इसके अलावा यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि नगर निगम के नोटिस में कौन से हिस्से हटाने का उल्लेख था और मौके पर वास्तव में क्या हटाया गया।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार मदीना मस्जिद का कुछ हिस्सा देर रात की एमसीडी कार्रवाई में हटाया गया है। प्रशासन इसे सड़क चौड़ीकरण और कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई बता रहा है। मस्जिद प्रबंधन और मुस्लिम संगठनों ने इसकी प्रक्रिया, समय और कानूनी स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
मलिक मोतसिम खान ने इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच की मांग की है। अब आगे की तस्वीर संबंधित प्रशासनिक रिकॉर्ड और अदालत या ट्रिब्यूनल की कार्यवाही से साफ होगी। यही रिकॉर्ड यह तय करने में मदद करेंगे कि शालीमार बाग में मदीना मस्जिद के खिलाफ हुई कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया का पालन किस हद तक हुआ।
बिना ₹1 खर्च किए ‘मुस्लिम नाउ’ को मजबूत बनाएं!
आज के दौर में निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता को ज़िंदा रखना एक बड़ी चुनौती है। आप बिना अपनी जेब से एक भी पैसा खर्च किए ‘मुस्लिम नाउ’ की आवाज़ को ताकत दे सकते हैं।
आप कैसे मदद कर सकते हैं? (3 आसान स्टेप्स)
- अमेज़न (Amazon) से शॉपिंग करने से ठीक पहले हमारी कोई भी खबर खोलें।
- खबर में दिख रहे अमेज़न के विज्ञापन (Shop Now) पर क्लिक करें।
- अमेज़न पर अपनी खरीदारी सामान्य तरीके से पूरी करें।

