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लोकतंत्र से शोकतंत्र की ओर : क्या ऐसे चुनाव आयोग की देश को ज़रूरत है?

विशेष विचार

जीनियस पत्रकार रीतिका चोपड़ा ने आज इंडियन एक्सप्रेस में केवल एक ख़बर नहीं लिखी है। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की उस बंद खिड़की को खोल दिया है, जिसके भीतर से पिछले दस महीनों से लगातार आवाज़ें आ रही थीं। लेकिन बाहर बैठा नागरिक उन्हें सुन नहीं पा रहा था और बहरा बना हुआ था। कई राज्यों में वोट नहीं, सरकारों की सरकारें चोरी हो रही थीं।

पत्रकारिता की असली शक्ति यही है। वह सत्ता के प्रेसनोट को ख़बर नहीं मानती; वह फ़ाइलों के भीतर जाती है। वह किसी संस्था की प्रतिष्ठा से आतंकित नहीं होती; वह उसके निर्णयों की वैधानिकता पूछती है। वह यह नहीं देखती कि सामने सरकार है, न्यायपालिका है या निर्वाचन आयोग; उसका प्रश्न सिर्फ़ इतना होता है, जो किया गया, वह कानून के अनुसार किया गया या नहीं? और अगर नहीं, तो किसके अधिकार से किया गया?

रीतिका चोपड़ा की यह खोजी रिपोर्टिंग इसलिए असाधारण है कि इस बार निर्वाचन आयोग पर सवाल विपक्षी दलों की प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं उठ रहे। सवाल निर्वाचन आयोग के भीतर बैठे तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों की लिखित आपत्तियों से निकल रहे हैं। सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के भीतर औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज कीं। कुछ फैसलों के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें जानकारी नहीं दी गई; कुछ प्रक्रियाओं की वैधानिकता पर प्रश्न उठाया; Form 6 में बदलाव को लेकर “unauthorised” और “illegal” जैसे शब्द खुद आयोग के भीतर से आए; और मतदाता डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण पर चेतावनी दर्ज की गई।

यही वह क्षण है जहाँ मामला किसी राजनीतिक दल की हार-जीत से बहुत बड़ा हो जाता है। लोकतंत्र मतदान मशीन से शुरू नहीं होता। वह मतदाता सूची से शुरू होता है। आपके पास संविधान हो, संसद हो, राजनीतिक दल हों, उम्मीदवार हों, ईवीएम हो, मतदान केंद्र हो; लेकिन आपका नाम मतदाता सूची में नहीं है तो नागरिक के रूप में आपकी सारी राजनीतिक संप्रभुता मतदान केंद्र के दरवाज़े पर समाप्त हो जाती है। इसलिए वोटर लिस्ट कोई सरकारी डेटाबेस भर नहीं है। वह नागरिक की राजनीतिक उपस्थिति का दस्तावेज़ है। और इसी बिंदु पर रीतिका चौपड़ा की खोज बेचैन करने लगती है।

Form 6 नया मतदाता बनने का वैधानिक रास्ता है। लेकिन उसमें ऐसा प्रावधान जोड़ दिया गया जिसमें आवेदक को बताना था कि पिछले SIR की मतदाता सूची में उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम था या नहीं। विकल्प को औपचारिक रूप से मेंडेटरी नहीं बताया गया, मगर जवाब दिए बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ता था। यहाँ प्रश्न केवल UX या वेबसाइट डिजाइन का नहीं था। विवेक जोशी ने 16 मई को फ़ाइल पर आपत्ति की कि Form 6 एक statutory form है और उसे इस तरह प्रशासनिक निर्देश से नहीं बदला जा सकता; यदि बदलाव आवश्यक है तो विधिसम्मत नियम-संशोधन की प्रक्रिया अपनानी होगी। सुखबीर सिंह संधु ने इस राय का समर्थन किया। बाद में संधु ने परिवर्तन को अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए हटाने को कहा। फिर भी वह व्यवस्था बनी रही।

यहाँ लोकतंत्र के लिए मूल प्रश्न खड़ा होता है: तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था के दो सदस्य कह रहे हों कि यह बदलाव विधिसम्मत नहीं है तो फिर वह बदलाव किस संस्थागत अधिकार से जीवित रहा? किसी पहली बार वोट देने वाले बीस वर्षीय युवक से यह पूछना कि तुम्हारे माता-पिता या दादा-दादी किसी पुरानी मतदाता सूची में थे या नहीं, कोई मामूली bureaucratic checkbox नहीं है। मताधिकार को पारिवारिक वंशावली की भूलभुलैया में डाल देने का प्रत्येक प्रयास असाधारण सावधानी, स्पष्ट कानून और पारदर्शी प्रक्रिया माँगता है।

और तो और, कंप्यूटर कानून से बड़ा होने लगा। इस पूरी खोज का शायद सबसे गंभीर पक्ष Form 6 भी नहीं है। वह है मतदाता डेटाबेस का केंद्रीकरण। भारत में मतदाता सूची की व्यवस्था जान-बूझकर विकेंद्रीकृत रखी गई है। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का Electoral Registration Officer यानी ERO कानून के तहत सूची तैयार करने, दावे-आपत्तियाँ सुनने और नाम जोड़ने अथवा हटाने के लिए उत्तरदायी है। लेकिन यदि वैधानिक अधिकारी के सामने बैठा नागरिक पात्र है, अधिकारी उसे पात्र मान भी ले, और दिल्ली में नियंत्रित सॉफ्टवेयर उस अधिकारी को “हाँ” दर्ज करने का विकल्प ही न दे तो शासन कानून से हो रहा है या कोड से?

गोवा में 97 मतदाताओं के साथ यही समस्या सामने आई। संबंधित ERO ने दस्तावेज़ देखकर उन्हें योग्य पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में पुराने deletion को reverse करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी और वे अंतिम सूची से बाहर रह गए। 97 छोटी संख्या है। लेकिन लोकतंत्र में एक वैध मतदाता भी छोटी संख्या नहीं होता। क्योंकि अधिकारों का गणित बहुमत से नहीं चलता। संविधान नागरिक को इकाई में पहचानता है। समस्या अचानक जुलाई 2026 में पैदा नहीं हुई। 4 नवंबर 2025 को संधु के निर्देश पर Deputy Election Commissioner संजय कुमार ने आयोग के IT अधिकारियों को लिखा कि ERO, DEO और CEO के statutory functions उन्हीं अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने चाहिए और IT system को कानून के अनुरूप होना चाहिए।

2 जनवरी 2026 को फिर चेताया गया कि सॉफ्टवेयर इस तरह बनाया जाए कि ERO का वैधानिक विवेक बाधित न हो। फिर 22 जनवरी को ECINet लॉन्च हुआ। 40 से अधिक चुनावी apps और portals को एकीकृत करने वाला विशाल डिजिटल ढाँचा। आयोग ने इसे transparency और credibility बढ़ाने वाला कदम बताया। लेकिन 16 अप्रैल को संधु ने दर्ज किया कि आयोग के नाम से कई communications जा रहे हैं जिनके लिए पूर्ण आयोग की मंजूरी नहीं ली गई। आठ दिन बाद जोशी ने भी इसी तरह की आपत्ति दर्ज की।

29 मई को जोशी ने इससे भी गंभीर शब्दों में मतदाता डेटाबेस के “gradual centralisation” पर चिंता जताई और बाहरी विशेषज्ञों; इयहाँ तक कि IIT विशेषज्ञों के माध्यम से audit की व्यवस्था सुझाई, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि संबंधित statutory authorities के अतिरिक्त कोई व्यक्ति मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने की credentials नहीं रखता। संधु ने बाद में इस प्रस्ताव का समर्थन किया। यदि किसी लोकतंत्र का मतदाता डेटाबेस लगभग एक अरब लोगों की राजनीतिक पहचान का दरवाज़ा है, तो उसका स्वतंत्र audit कोई तकनीकी विलासिता नहीं होना चाहिए। वह लोकतांत्रिक hygiene है।

28 जुलाई को वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष गर्ग को आयोग के Administration Division का अतिरिक्त प्रभार मिला। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार कुछ ही घंटों में work allocation बदलकर संजय कुमार को DG-IT की निगरानी वाली भूमिका से हटा दिया गया। अगले दिन जो हुआ, वही इस पूरी कहानी की गंभीरता समझाने के लिए पर्याप्त है। 29 जुलाई को सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को पत्र लिखा। उन्होंने उस आदेश को आयोग को संचालित करने वाले कानून का स्पष्ट उल्लंघन बताया और कार्रवाई की मांग की। अगले दिन दोनों आयुक्तों ने मिलकर आदेश पलट दिया और पुराने work allocation को बहाल करने को कहा।

देश के निर्वाचन आयोग के तीन सदस्यों में से दो सदस्यों को अपने ही आयोग के भीतर की प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ देश के कैबिनेट सचिव तक जाना पड़ा। यह सामान्य कार्यालयी असहमति नहीं कही जा सकती। क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त कोई सम्राट नहीं है। यहीं भारतीय चुनाव व्यवस्था का वह तथ्य याद रखना चाहिए जिसे अक्सर “Chief” शब्द ढक देता है। मुख्य चुनाव आयुक्त प्रशासनिक अर्थों में अध्यक्ष हो सकते हैं, लेकिन किसी तीन सदस्यीय आयोग में उनकी राय अपने-आप दो अन्य आयुक्तों की राय से बड़ी नहीं हो जाती।

2023 के कानून की धारा 18 साफ़ है। आयोग का काम जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए; और मतभेद होने पर निर्णय बहुमत की राय से होगा। कामकाज की प्रक्रिया और Commissioners के बीच business allocation तय करने के लिए तो unanimous decision की व्यवस्था है। इसका साधारण अंकगणित है: तीन में दो, बहुमत हैं। इसलिए किसी मामले में यदि संधु और जोशी की विधिवत दर्ज राय एक तरफ हो और CEC की राय दूसरी तरफ, तथा मामला वास्तव में आयोग के निर्णय के लिए मतभेद के रूप में सामने आया हो, तो कानून बहुमत को निर्णायक बनाता है। यही कारण है कि ये फ़ाइल-नोटिंग्स इतनी महत्वपूर्ण हैं।

बंगाल का प्रश्न और भी विचलित करता है। पश्चिम बंगाल में SIR के बाद 27.16 लाख नाम हटे। उनमें से 22.21 लाख लोगों ने अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए अपील की। साथ ही 16.10 लाख अपीलें ऐसे लोगों को हटाने के लिए दायर हुईं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने सूची में शामिल किया था। कुल लंबित appeals 38.31 लाख बताई गईं।यहीं संधु ने एक अत्यंत बुनियादी प्रश्न पूछा: इन 16.10 लाख appeals को ECI की ओर से दाखिल करने की अनुमति किसने दी? रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने यह भी दर्ज किया कि उन्हें, विवेक जोशी को और पश्चिम बंगाल के मौजूदा Chief Electoral Officer को प्रक्रिया का आधार नहीं बताया गया था। पश्चिम बंगाल की वर्तमान CEO नीलम मीणा हैं।

जब मतदाता को हटाने की लाखों अपीलों में यह तक अस्पष्ट हो जाए कि उन्हें अधिकृत किसने किया, तब पारदर्शिता कोई प्रशासनिक शिष्टाचार नहीं रह जाती—वह चुनाव की वैधता की बुनियादी शर्त बन जाती है। जून 2025 में बिहार से शुरू हुई SIR प्रक्रिया बाद में 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुँची। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इन प्रक्रियाओं में 13 करोड़ से अधिक नाम draft electoral rolls से बाहर हुए। यहाँ भाषा में सावधानी ज़रूरी है: draft list से बाहर होना हर मामले में स्थायी disenfranchisement नहीं है। दावे, आपत्तियाँ और पुनःसमावेशन की प्रक्रियाएँ होती हैं। लेकिन 13 करोड़ का पैमाना स्वयं बताता है कि ऐसी प्रक्रिया में छोटी-सी procedural illegality भी छोटी नहीं रहती। वह करोड़ों नागरिकों तक गुणा होकर पहुँच सकती है।

यही लोकतांत्रिक संस्थाओं की त्रासदी है: रेल की पटरी एक मिलीमीटर गलत हो तो स्टेशन पर दुर्घटना नहीं होती; सैकड़ों किलोमीटर बाद ट्रेन रास्ते से उतरती है। रीतिका चोपड़ा की पत्रकारिता का महत्व यहीं है। आज पत्रकारिता के बड़े हिस्से ने “किसने क्या कहा” को रिपोर्टिंग समझ लिया है। रीतिका चोपड़ा ने इसके उलट काम किया है। उन्होंने किसने फ़ाइल पर क्या लिखा, यह खोजा। किस तारीख को किस अधिकारी ने चेताया; किस आदेश के बाद किस आयुक्त ने आपत्ति दर्ज की; statutory form किस तरह बदला; software permissions कहाँ केंद्रीकृत हुईं; audit किसने माँगा; किस आदेश के खिलाफ दोनों आयुक्त कैबिनेट सचिव तक गए। यह पत्रकारिता प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, institutional archaeology है।

और लोकतंत्र को ऐसी पत्रकारिता की सबसे अधिक आवश्यकता उसी समय होती है जब संस्थाएँ अपने भीतर के काग़ज़ नागरिकों से छिपाकर रखना चाहती हैं। आयोग का जवाब भी दर्ज होना चाहिए। निष्पक्षता के लिए निर्वाचन आयोग की आज की प्रतिक्रिया भी उतनी ही स्पष्टता से दर्ज की जानी चाहिए।आयोग ने कहा है कि संस्थाओं के भीतर अलग-अलग observations सामान्य deliberative process का हिस्सा हैं; चुनीदा internal notes को अलग करके देखने से अधूरी तस्वीर बनती है। उसका दावा है कि पिछले एक वर्ष में SIR सहित अंतिम निर्णय पूर्ण आयोग ने सर्वसम्मति से लिए।

लेकिन इससे अगला प्रश्न समाप्त नहीं होता बल्कि और स्पष्ट हो जाता है। यदि अंतिम निर्णय सर्वसम्मत थे तो वे minutes, approvals और decision records सार्वजनिक कर दिए जाने चाहिए जिनसे स्पष्ट हो कि Form 6 पर दो आयुक्तों की लिखित कानूनी आपत्ति का समाधान कैसे हुआ; centralisation की आशंकाओं पर क्या निर्णय हुआ; audit प्रस्ताव का क्या हुआ; और वे 16.10 लाख appeals किस वैधानिक authorization से दाखिल हुईं। विश्वास प्रेस विज्ञप्ति से नहीं बनता। विश्वास verifiability से बनता है। लोकतंत्र की मृत्यु हमेशा टैंकों की आवाज़ में नहीं होती। कभी-कभी वह एक dropdown menu में होती है। कभी एक disabled software option में। कभी ऐसे statutory form में जिसे बदलने पर संस्था के अपने सदस्य आपत्ति कर रहे हों।

कभी ऐसे login में, जिसके पीछे लाखों मतदाताओं की किस्मत बदल सकती हो। और कभी एक ऐसी फ़ाइल में, जिस पर तीन में से दो संवैधानिक पदाधिकारी लिख रहे हों, हमें बताया नहीं गया। यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे शोकतंत्र में बदल सकता है, जहाँ चुनाव तो होते रहें, लेकिन नागरिक यह शोक मनाने लगे कि उसका नाम किसने हटाया, किसने अपील की, किसने सॉफ्टवेयर बंद किया और निर्णय आखिर लिया किसने। निर्वाचन आयोग की प्रतिष्ठा बचाने का रास्ता इन प्रश्नों को दबाना नहीं है। रास्ता है उनके उत्तर देना; minutes खोलना; audit कराना; statutory authorities को पूर्ण अधिकार देना; और यह स्थापित करना कि भारत में मतदाता सूची किसी व्यक्ति, किसी IT division, किसी algorithm अथवा किसी एक पदाधिकारी की संपत्ति नहीं है।

वह नागरिक की है।

रीतिका चोपड़ा की आज की रिपोर्ट का सबसे बड़ा योगदान यही है: उसने बहस को “चुनाव आयोग पर विश्वास कीजिए” और “चुनाव आयोग पर विश्वास मत कीजिए” की राजनीतिक द्वंद्वात्मकता से निकालकर अधिक सभ्य और अधिक कठोर प्रश्न के सामने खड़ा कर दिया है : हमें विश्वास क्यों करना चाहिए? दस्तावेज़ दिखाइए। लोकतंत्र में इससे अधिक वैध माँग शायद कोई नहीं होती। @RitikaChopra_

त्रिभुवन ऑफिशियल के फेसबुक वाल से

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