डर की एक्सपायरी डेट आ गई है
कुर्बान शेख
लेखक जाने-माने व्यंग्यकार हैं
मैं बिहार से आता हूं। वहीं पैदा हुआ। वहीं पला। वहीं बड़ा हुआ। बिहार की नस-नस में आध्यात्मिकता भी है और सियासत भी। गौतम बुद्ध की ज्ञानस्थली से लेकर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन तक, बिहार ने देश को बार-बार बताया है कि सत्ता कितनी भी मजबूत क्यों न हो, जनता अगर जाग जाए तो उसकी नींद हराम हो सकती है।
गौतम बुद्ध ने ज्ञान दिया और जयप्रकाश ने आंदोलन।
एक ने मनुष्य को भीतर से बदलने की कोशिश की। दूसरे ने व्यवस्था को बाहर से हिलाकर रख दिया।
बिहार की राजनीति में एक समय बड़ा लोकतांत्रिक रोमांस हुआ करता था। राजनीतिक दल अपने अस्तित्व के लिए जनता के पास जाते थे। पर्चे बांटते थे। दीवारों पर लिखते थे। स्कूल और कॉलेज के बाहर मेज लगाकर सदस्यता अभियान चलाते थे। छात्रों को समझाते थे। बहस करते थे। बहस में हारते भी थे और जीतते भी थे।
कभी-कभी तो लगता था कि उस जमाने में राजनीतिक पार्टियों का सबसे बड़ा हथियार पर्ची और सबसे खतरनाक हथियार सवाल हुआ करता था।
आज दोनों चीजें कुछ संदिग्ध सी लगती हैं।
तब किसी इलाके में कोई समस्या होती थी तो पार्टी या संगठन की बैठक बुलती थी। लोग बैठते थे। चर्चा होती थी। प्रस्ताव बनता था। जिम्मेदारी तय होती थी। फिर दो-चार लोग संबंधित अधिकारी या संगठन के मुखिया के पास पहुंचते थे।
मुलाकात होती थी।
बहस होती थी।
थोड़ा तर्क होता था।
कभी अधिकारी समझ जाता था कि मांग जायज है और बात वहीं खत्म।
अगली बैठक में कार्यकर्ताओं को बताया जाता था कि अधिकारी से क्या बात हुई और क्या नतीजा निकला।
यानी लोकतंत्र में एक चीज हुआ करती थी।
बातचीत।
आजकल यह चीज बहुत दुर्लभ प्रजाति में शामिल हो गई है।
बड़े से बड़ा मामला हो तो पहले प्रेस विज्ञप्ति निकलती थी। फिर संवाददाता सम्मेलन होता था। उसके बाद धरना। फिर जुलूस। जरूरत पड़ी तो भूख हड़ताल।
सरकार नहीं मानी तो आंदोलन लंबा।
आंदोलन लंबा हुआ तो सरकार पर दबाव।
दबाव बढ़ा तो आखिरकार बातचीत।
और कई बार मांगें मान ली जाती थीं।
बहुत कम मामलों में तोड़फोड़ होती थी। जंगल बचाने के लिए चिपको आंदोलन हुआ। नर्मदा बचाने के लिए आंदोलन हुआ। देश में असंख्य आंदोलन हुए। लोग जेल गए, लाठियां खाईं, लेकिन यह अधिकार बना रहा कि सरकार से सवाल पूछा जा सकता है।
आज के लोकतंत्र में सवाल पूछना थोड़ा जोखिम भरा काम हो गया है।
आप बेरोजगारी पूछिए तो आपको बताया जाएगा कि देशभक्ति क्या होती है।
महंगाई पूछिए तो आपको इतिहास पढ़ाया जाएगा।
किसान फसल का दाम मांगे तो उसके इरादे पर सवाल उठेगा।
नागरिक अधिकार पूछिए तो आपकी नागरिकता पर सवाल आ जाएगा।
और अगर आपने ज्यादा सवाल पूछ लिए तो संभव है कि सवाल का जवाब देने के बजाय आपके खिलाफ कोई मुकदमा तैयार हो जाए।
लोकतंत्र का नया फार्मूला बड़ा सरल है।
सवाल मत बदलो। सवाल पूछने वाले को बदल दो।
पिछले बारह-तेरह वर्षों में यही खेल खूब खेला गया।
हिंदू-मुस्लिम की राजनीति ने मूल मुद्दों को पीछे धकेला। जातियों को एक-दूसरे के सामने खड़ा किया गया। समाज को इतने खानों में बांटा गया कि हर आदमी अपने पड़ोसी से डरने लगा और असली सवाल पूछना भूल गया।
बेरोजगार युवक नौकरी मांगना भूल गया।
महंगाई से परेशान परिवार कीमत पूछना भूल गया।
किसान अपनी फसल से ज्यादा अपनी पहचान बचाने में उलझ गया।
और सत्ता?
सत्ता ने राहत की सांस ली।
क्योंकि जनता अगर आपस में लड़ रही हो तो सरकार से सवाल पूछने की फुर्सत किसे होगी?
आंदोलन करने निकलिए तो पहले आपकी नीयत की जांच होगी।
फिर देशभक्ति का प्रमाणपत्र मांगा जाएगा।
फिर सोशल मीडिया पर फैसला होगा।
फिर टीवी स्टूडियो में मुकदमा चलेगा।
और अंत में अगर मामला बहुत गंभीर हुआ तो अदालत में असली मुकदमा शुरू होगा।
इस बीच आदमी की जिंदगी निकल जाए तो निकल जाए।
पर व्यवस्था को जल्दी नहीं है।
कभी आंदोलनकारियों को देशद्रोही कहा गया। कभी अर्बन नक्सल। कभी टुकड़े-टुकड़े गैंग। अब नए-नए विशेषणों की कोई कमी नहीं।
नाम बदलते रहे।
नुस्खा वही रहा।
डर पैदा करो और सवाल को कमजोर कर दो।
फिर आया बुलडोजर।
कानून अपना काम करेगा, यह बात अच्छी है। लेकिन जब कानून की फाइल से पहले बुलडोजर पहुंच जाए तो नागरिक स्वाभाविक रूप से थोड़ा चिंतित हो जाता है।
किसी पर आरोप लगा तो परिवार भी परेशान।
घर गया तो पड़ोसी परेशान।
दुकान गई तो बाजार परेशान।
और अगर किसी ने इस कार्रवाई पर सवाल पूछ दिया तो सोशल मीडिया की सेना तैयार।
यह सेना बड़ी विचित्र है।
इसे न वेतन चाहिए, न कार्यालय।
बस मोबाइल चाहिए और किसी की आलोचना करने का आदेश।
फिर इतना शोर मचाया जाता है कि असली आवाज सुनाई देना बंद हो जाती है।
यह आधुनिक लोकतंत्र का नया लाउडस्पीकर है।
पहले विपक्ष बोलता था तो सत्ता जवाब देती थी।
अब विपक्ष बोलता है तो ट्रोल जवाब देते हैं।
विपक्ष फिर बोलता है।
ट्रोल फिर चिल्लाते हैं।
जनता बीच में सोचती है कि भाई, असली सवाल था क्या?
यही तो कमाल है।
सवाल गायब।
शोर कायम।
लेकिन लगता है कि शोर की भी एक सीमा होती है।
और डर की भी एक एक्सपायरी डेट होती है।
पिछले कुछ महीनों से हवा कुछ बदली-बदली सी लग रही है।
जिन लोगों को डराया गया था, वे फिर बोलने लगे हैं।
जिन्हें चुप कराया गया था, वे फिर सवाल पूछने लगे हैं।
और सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो लोग वर्षों से कहते थे कि उनकी सरकार किसी के दबाव में नहीं झुकती, उन्हें अब सार्वजनिक दबाव का अर्थ समझ में आने लगा है।
धर्मेंद्र प्रधान को लेकर हुआ राजनीतिक घटनाक्रम भी इसी बदलते माहौल की तरफ संकेत करता है।
मतलब दबाव अब इतना बुरा भी नहीं रहा।
बस दबाव डालने वाला कौन है, यह महत्वपूर्ण हो गया है!
उधर जिस राजनीतिक नेता की छवि बनाने में अरबों रुपये की प्रचार मशीनरी लगी हो, उसी नेता पर अब मीम बन रहे हैं।
सोशल मीडिया पर सवाल हो रहे हैं।
सड़क पर सवाल हो रहे हैं।
चाय बेचने की कहानी पर व्यंग्य हो रहा है।
शिक्षा पर सवाल।
रोजगार पर सवाल।
युवाओं के भविष्य पर सवाल।
यानी जिस जनता को लंबे समय तक बताया गया कि सवाल करना राष्ट्रविरोधी हो सकता है, उसने धीरे से पूछना शुरू कर दिया है।
क्यों?
लोकतंत्र में यही सबसे खतरनाक शब्द है।
क्यों?
और जब यह शब्द लाखों लोग एक साथ बोलने लगें तो सत्ता के सबसे मजबूत किले की दीवारों में भी छोटी-छोटी दरारें दिखाई देने लगती हैं।
राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता जब सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करते हैं, गिरफ्तारियां देते हैं और बिना बहुत ज्यादा लाग-लपेट के सरकार से सवाल पूछते हैं तो कम से कम विपक्षी राजनीति में सड़क वापस आती दिखाई देती है।
और जब Gen Z अपने अंदाज में सवाल पूछती है, मीम बनाती है, व्यंग्य करती है और सत्ता को आईना दिखाती है तो यह संकेत है कि नई पीढ़ी ने डर का पुराना पाठ्यक्रम स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।
सरकारों के लिए इससे बड़ी चुनौती कोई नहीं।
क्योंकि बूढ़े आदमी को डराया जा सकता है कि नौकरी चली जाएगी।
मध्यवर्ग को डराया जा सकता है कि सुविधा चली जाएगी।
व्यापारी को डराया जा सकता है कि कारोबार प्रभावित होगा।
लेकिन जिस नौजवान को भविष्य ही अनिश्चित दिखाई दे रहा हो, उसे डराएंगे किस चीज से?
वह पूछेगा।
हंसकर पूछेगा।
मीम बनाकर पूछेगा।
सड़क पर पूछेगा।
और जरूरत पड़ी तो वोट की लाइन में खड़े होकर पूछेगा।
यही वह जगह है जहां लोकतंत्र फिर से सांस लेने लगता है।
लेकिन अभी जश्न मनाने की जरूरत नहीं है।
काम बहुत बाकी है।
राजनीतिक दलों को भी अपनी पुरानी बीमारी छोड़नी होगी। चुनाव के छह महीने पहले जनता को याद करने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।
फिर सदस्यता अभियान चलाइए।
कॉलेजों में जाइए।
मोहल्लों में जाइए।
युवाओं से मिलिए।
कार्यकर्ताओं से बात कीजिए।
पर्चे बांटिए।
दीवारों पर लिखिए।
बैठक कीजिए।
बहस कीजिए।
और सबसे जरूरी, जनता को सिर्फ वोटर मत समझिए।
उसे नागरिक समझिए।
क्योंकि पार्टी कार्यालय में बैठे दस प्रवक्ताओं से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब दस हजार आम लोग अपने-अपने मोहल्लों में सवाल पूछने लगते हैं।
नई सदस्यता से नई ऊर्जा आएगी।
नई ऊर्जा से नए आंदोलन निकलेंगे।
नए आंदोलन पुराने डर को चुनौती देंगे।
और शायद इसी डर से किसी समय आंदोलनकारियों को ‘दिमागी नक्सल’ जैसे तमगे दिए गए होंगे। क्योंकि नई पीढ़ी अगर राजनीति और आंदोलनों में आ गई तो पुराने तरीके से उसे चुप कराना आसान नहीं होगा।
युवा दिमाग को डराकर कुछ समय के लिए रोका जा सकता है।
हमेशा के लिए नहीं।
इतिहास की यही सबसे बड़ी समस्या है।
वह सत्ता की प्रेस विज्ञप्ति से नहीं लिखा जाता।
वह जनता की स्मृति से लिखा जाता है।
बिहार ने यह पहले देखा है।
जेपी के आंदोलन ने देखा है।
किसान आंदोलनों ने देखा है।
छात्र आंदोलनों ने देखा है।
और अब शायद नई पीढ़ी भी देख रही है।
इसलिए अगर आज खौफ के बादल थोड़े छंटते दिखाई दे रहे हैं तो इसे लोकतंत्र की कमजोरी मत समझिए।
यह लोकतंत्र की वापसी हो सकती है।
जिस दिन सरकार को जनता के सवाल सुनाई देने लगें, जिस दिन विपक्ष को सड़क पर उतरने की जरूरत महसूस हो और जिस दिन युवा बिना डरे पूछने लगे कि आखिर ऐसा क्यों है, उस दिन लोकतंत्र फिर से अपने पुराने रंग में लौटने लगता है।
कभी बिहार में पर्चियां कटती थीं।
फिर पर्चे बंद हुए।
फिर दीवारें खामोश हुईं।
फिर आंदोलन डरने लगे।
अब शायद समय आ गया है कि पर्चियां फिर कटें।
पर्चे फिर बांटे जाएं।
दीवारें फिर बोलें।
कॉलेजों में फिर बहस हो।
सड़कों पर फिर सवाल उठें।
और सत्ता को फिर से यह पुराना सबक पढ़ाया जाए कि जनता पर शासन किया जा सकता है, जनता को हमेशा चुप नहीं कराया जा सकता।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता आखिर जनता है।
आज चुप है।
कल पूछेगी।
परसों हंसेगी।
और फिर एक दिन वोट देने जाएगी।
उस दिन किसी ट्रोल की जरूरत नहीं पड़ेगी।
किसी लाउडस्पीकर की जरूरत नहीं पड़ेगी।
किसी प्रचार अभियान की जरूरत नहीं पड़ेगी।
सिर्फ एक बटन होगा।
और उस बटन के पीछे कई वर्षों से दबे हुए सवाल होंगे।
याद रखिए।
डर की भी एक्सपायरी डेट होती है।
लगता है, वह तारीख अब बहुत दूर नहीं है।

