मुसलमानों के हक की आवाज उठाने से क्यों रोक रहे उमेर इलियासी और शहाबुद्दीन बरेलवी ?
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
देश में मुसलमानों के सामने जब कोई बड़ा सवाल खड़ा होता है, तो समुदाय के भीतर से एक अहम आवाज उठती है। यह आवाज अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की होती है। लेकिन विडंबना देखिए कि कई बार इसी समुदाय के कुछ धार्मिक और राजनीतिक चेहरे युवाओं को अपने हक के लिए आवाज उठाने से रोकने लगते हैं। वे उन्हें आंदोलन के संभावित खतरों का डर दिखाते हैं, कानून का हवाला देते हैं और अमन तथा भाईचारे के नाम पर घरों में रहने की सलाह देते हैं।
सवाल यह है कि क्या अपने अधिकारों की मांग करना अमन के खिलाफ है? क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना कोई अपराध है? और अगर मुसलमानों के सामने गंभीर समस्याएं हैं, तो उनके समाधान के लिए आवाज कौन उठाएगा?
आज इन सवालों पर चर्चा जरूरी है। खासकर तब, जब 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन को लेकर कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने समुदाय के लोगों, विशेषकर युवाओं और मस्जिदों के इमामों से इसमें शामिल नहीं होने की अपील की है।
लंबी दाढ़ी, सिर पर टोपी, पेशानी पर नमाज के निशान और मौलानाओं जैसा लिबास किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान का हिस्सा हो सकता है। लेकिन केवल धार्मिक वेशभूषा के आधार पर किसी को पूरी कौम का शुभचिंतक मान लेना भी उचित नहीं है। किसी की असल पहचान इस बात से होनी चाहिए कि वह मुश्किल वक्त में अपने समुदाय के सवालों पर क्या रुख अपनाता है और उसके अधिकारों के लिए कितना खड़ा होता है।
इसी कसौटी पर आज इमाम उमेर अहमद इलियासी, मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी और असदुद्दीन ओवैसी जैसे चेहरों की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन लोगों के विचारों और बयानों से असहमत होने का अधिकार हर नागरिक को है। लोकतंत्र में किसी धार्मिक नेता या राजनीतिक प्रतिनिधि से सवाल करना न तो धार्मिक असम्मान है और न ही समुदाय के खिलाफ कोई कदम।
🚨Karnataka CM is exposing #VoteChori of BJP live on camera Just see how BJP planned to delete thousands and lakhs of Muslims voters in Karnataka.👇👇 Hats off to CM @DKShivakumar for exposing them and protecting the rights of our citizen 👏👏 https://t.co/yWZMyeBiri
— Chandan Sinha (@profAIPC) October 8, 2026
एसआईआर और वोट के अधिकार को लेकर चिंता
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर देश के कई हिस्सों में मतदाता सूची से नाम हटने की आशंकाएं और शिकायतें सामने आई हैं। मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से में यह चिंता भी है कि इस प्रक्रिया से उनके मताधिकार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
हालांकि, यह दावा कि हटाए गए 13 करोड़ नामों में अधिकांश मुसलमानों के हैं, आधिकारिक आंकड़ों से प्रमाणित किए बिना तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। मतदाता सूची में नाम हटने की वास्तविक संख्या, उसके कारण और प्रभावित लोगों की सामाजिक पहचान को लेकर प्रमाणित आंकड़ों की जरूरत है।
लेकिन एक बुनियादी सवाल अपनी जगह कायम है। यदि किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो उसके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? अगर किसी समुदाय को लगता है कि उसकी राजनीतिक भागीदारी प्रभावित हो रही है, तो क्या उसे अपनी चिंता सार्वजनिक रूप से रखने का अधिकार नहीं होना चाहिए?
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लोकतंत्र में विरोध का उद्देश्य केवल सरकार के खिलाफ नारे लगाना नहीं होता। इसका मकसद अपनी बात जिम्मेदार संस्थाओं तक पहुंचाना, गलतियों को उजागर करना और अधिकारों की रक्षा के लिए दबाव बनाना भी होता है।
इसी संदर्भ में 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन को लेकर जारी अपीलों पर सवाल उठ रहे हैं। समुदाय के एक हिस्से का मानना है कि युवाओं को आंदोलन से दूर रहने की सलाह देने के बजाय उन्हें अपने अधिकारों, कानूनी प्रक्रियाओं और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक भागीदारी के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
VIDEO | Delhi: Chief Imam of the All India Imam Organisation, Imam Umer Ahmed Ilyasi says, "I am making an appeal and request to all the Muslims and especially to the Imams of the mosques. You know what the situation is going on in the country at present. Some anti-national forces want to spoil the peace in our country. A big conspiracy is being hatched to spoil the environment of the country by misleading people. I want to tell all the Muslims, those political parties who have called to join the protest on 10th and the way they have called, these protests are being carried out against the government, I want to tell the Muslims that we are not something to be used. Till date we Muslims have been used to this only. This is a very wise time. Any decision taken out of emotion is not right. Act wisely and wise decisions are very good." (Source: Third Party) (Full video available on PTI Videos – https://t.co/bIyFWTfmBd)
— Press Trust of India (@PTI_News) October 9, 2026
इमाम उमेर इलियासी की अपील पर सवाल
ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. इमाम उमेर अहमद इलियासी ने मुस्लिम समुदाय, विशेषकर मस्जिदों के इमामों से अपील की है कि वे जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल न हों। उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों को संवेदनशील बताते हुए आशंका जताई कि कुछ ताकतें लोगों को गुमराह कर सकती हैं और प्रदर्शन से देश के अमन तथा सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंच सकता है।
उन्होंने मुस्लिम युवाओं को पिछले प्रदर्शनों का हवाला देते हुए आगाह किया कि विरोध के दौरान गिरफ्तारी होने पर उन्हें और उनके परिवारों को कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने अभिभावकों से भी अपने बच्चों को ऐसे प्रदर्शनों से दूर रखने की अपील की। साथ ही सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश साझा नहीं करने और शांति बनाए रखने पर जोर दिया।
शांति की अपील करना अपने आप में गलत नहीं है। किसी भी प्रदर्शन में हिंसा, उकसावे और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का समर्थन नहीं किया जा सकता। युवाओं को कानूनी जोखिमों के बारे में जानकारी देना भी जरूरी है।
लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी उठता है। क्या संभावित गिरफ्तारी का डर दिखाकर किसी पूरे समुदाय को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने से रोक देना उचित है? क्या धार्मिक नेताओं की जिम्मेदारी केवल लोगों को खतरे गिनाना है, या उन्हें संवैधानिक अधिकारों और शांतिपूर्ण विरोध के तरीकों के बारे में बताना भी है?
यदि किसी प्रदर्शन के आयोजन, अनुमति या कानूनी स्थिति को लेकर कोई समस्या है, तो उसे स्पष्ट रूप से सामने रखा जाना चाहिए। लोगों को सही जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वे तथ्यों के आधार पर फैसला कर सकें। केवल आशंकाओं के आधार पर सभी को पीछे हटने की सलाह देना समुदाय के भीतर असंतोष पैदा कर सकता है।
#बरेली मौलाना शहाबुद्दीन की मुस्लिम युवाओं से अपील ⏩️ मौलाना ने 10 अक्टूबर के दिल्ली धरने से दूर रहने को कहा ⏩️ जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में शामिल न होने की अपील ⏩️ बोले- विरोध करना अधिकार, लेकिन हिंसा की इजाजत नहीं ⏩️ पिछले प्रदर्शन में हिंसा का हवाला देकर जताई चिंता ⏩️ युवाओं से शांति और सुरक्षा का ध्यान रखने की अपील ⏩️ शांतिपूर्ण प्रदर्शन को ही बताया सही तरीका @dmbareilly @bareillypolice @adgzonebareilly @igrangebareilly @Cockroachisback #bareilly #jantarmantar #shahabuddinrazvi #mahuakhabar
— Mahua Khabar (@MahuaKhabarr) October 9, 2026
मुफ्ती शहाबुद्दीन बरेलवी की सलाह भी चर्चा में
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने भी मुस्लिम युवाओं से जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से दूर रहने की अपील की है।
उनका कहना है कि शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन नागरिकों का कानूनी अधिकार है, लेकिन किसी भी आंदोलन में हिंसा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने दिल्ली और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में रहने वाले मुस्लिम युवाओं को प्रस्तावित धरने में शामिल न होने की सलाह दी। उनके बयान में पहले के कुछ प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसक घटनाओं और प्रदर्शनकारियों को बाद में झेलनी पड़ी परेशानियों का भी उल्लेख किया गया है।
यह बात सही है कि किसी भी आंदोलन में भाग लेने से पहले उसकी प्रकृति, आयोजन की शर्तों और कानूनी स्थिति को समझना चाहिए। मगर लोकतंत्र में यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी नागरिक को अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने से हतोत्साहित न किया जाए।
अगर मुसलमानों को मतदाता सूची, शिक्षा, रोजगार, धार्मिक स्थलों, संपत्ति या नागरिक अधिकारों से संबंधित कोई शिकायत है, तो उन शिकायतों को दूर करने के लिए प्रभावी और लोकतांत्रिक प्रयास होने चाहिए। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि किसी राजनीतिक दल के बहकावे में न आएं। यह भी बताया जाना चाहिए कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए समुदाय को कौन-से वैधानिक रास्ते अपनाने चाहिए।
आजादी के आंदोलन से लेकर छात्र आंदोलनों तक युवाओं की भूमिका
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि युवाओं ने देश की राजनीतिक और सामाजिक दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम में उलेमा, मदरसों से जुड़े लोगों और आम नागरिकों ने भी अलग-अलग रूपों में योगदान दिया। अनेक धार्मिक नेताओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया और जेल की यातनाएं सहीं।
आजादी के बाद भी छात्र आंदोलनों ने देश की राजनीति को प्रभावित किया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन में युवाओं की बड़ी भागीदारी रही। इन आंदोलनों से यह सीख मिलती है कि जब व्यवस्था में बदलाव की मांग उठती है, तो युवाओं की भूमिका अक्सर निर्णायक हो सकती है।
हालांकि, हर आंदोलन की परिस्थितियां अलग होती हैं। किसी आंदोलन की सफलता या औचित्य का आकलन उसके उद्देश्यों, तरीकों और परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। लेकिन केवल इस वजह से युवाओं को पीछे हटने के लिए कहना कि आंदोलन में जोखिम हो सकता है, लोकतांत्रिक भागीदारी की भावना को कमजोर कर सकता है।
इसीलिए मुस्लिम समुदाय के कई लोग पूछ रहे हैं कि जब अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का समय आता है, तो युवाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने के बजाय उन्हें पीछे रहने की सलाह क्यों दी जाती है?
मस्जिदों और मदरसों से जुड़े सवाल
पिछले वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में अवैध निर्माण के आरोपों के तहत मस्जिदों, मकबरों और मदरसों पर कार्रवाई की खबरें सामने आती रही हैं। कई मामलों में प्रभावित पक्षों ने कार्रवाई की वैधता, प्रक्रिया और निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।
इन घटनाओं को लेकर मुस्लिम समुदाय के भीतर यह सवाल भी उठता रहा है कि धार्मिक नेतृत्व ने प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए कितनी प्रभावी आवाज उठाई। क्या संबंधित धर्मगुरुओं ने कानूनी सहायता उपलब्ध कराने, प्रशासन से जवाब मांगने और निष्पक्ष जांच की मांग करने में सक्रिय भूमिका निभाई?
यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर कार्रवाई की परिस्थितियां अलग होती हैं। किसी निर्माण को अवैध घोषित किए जाने का मामला अदालत, प्रशासनिक प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर तय होना चाहिए। लेकिन यदि किसी कार्रवाई में कानून का उल्लंघन हुआ है, तो उसके खिलाफ आवाज उठाना और न्याय की मांग करना हर नागरिक का अधिकार है।
यही बात तीन तलाक कानून, समान नागरिक संहिता, वक्फ संपत्तियों से संबंधित कानूनों, अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे जैसे मुद्दों पर भी लागू होती है। इन विषयों पर अलग-अलग लोगों और संगठनों के विचार भिन्न हो सकते हैं। किसी कानून का समर्थन करना या विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। सवाल यह है कि इन मुद्दों पर धार्मिक नेताओं ने समुदाय के बीच कितनी गंभीर बहस कराई, लोगों को उनके कानूनी अधिकारों से कितना परिचित कराया और जरूरत पड़ने पर लोकतांत्रिक मंचों पर कितनी सक्रियता दिखाई?
मुस्लिम समुदाय के लोगों को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि उनके धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व की प्राथमिकताएं क्या हैं। आखिर धार्मिक नेतृत्व का मूल्यांकन केवल भाषणों से नहीं, बल्कि उसके काम और जवाबदेही से भी होना चाहिए।
राम मंदिर समारोह में शामिल होने पर भी उठे सवाल
डॉ. इमाम उमेर इलियासी के राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल होने को लेकर भी मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों ने असहमति जताई थी। यह एक संवेदनशील धार्मिक और राजनीतिक विषय है, जिस पर अलग-अलग मुसलमानों के विचार अलग हो सकते हैं।
किसी समारोह में शामिल होने के निर्णय को अपने आप में किसी व्यक्ति की पूरी नीयत का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि कोई धार्मिक नेता ऐसे मुद्दे पर अपनी व्यक्तिगत राय रखता है, तो समुदाय को यह पूछने का अधिकार भी है कि वह दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दों पर क्या रुख अपनाता है।
धार्मिक नेतृत्व का अर्थ केवल धार्मिक प्रतीकों के साथ दिखाई देना नहीं है। उसका अर्थ समाज की चिंताओं को समझना, कमजोर और प्रभावित लोगों की मदद करना, न्याय के पक्ष में खड़ा होना और अपने फैसलों के बारे में समुदाय को जवाब देना भी है।
ओवैसी का अलग रुख और राजनीतिक जवाबदेही
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को लेकर भी बहस तेज है। उनके आलोचकों का कहना है कि वे अपने भाषणों में मुस्लिम समुदाय के मुद्दे उठाते हैं, लेकिन हर आंदोलन में उनकी भागीदारी या समर्थन दिखाई नहीं देता।
प्रस्तावित प्रदर्शन से दूरी बनाने के संदर्भ में उनके कथित बयान, ‘बिन बुलाए दूल्हा कहीं जाता है क्या?’ को लेकर भी आलोचना की जा रही है। यदि यह बयान उसी संदर्भ में दिया गया है, तो सवाल उठता है कि क्या किसी आंदोलन में भागीदारी का फैसला केवल औपचारिक निमंत्रण के आधार पर होना चाहिए, या मुद्दे की गंभीरता भी मायने रखती है?
हालांकि, किसी राजनीतिक नेता की भूमिका का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए उसके पूरे राजनीतिक रिकॉर्ड, संसद में उठाए गए सवालों, कानूनी प्रयासों और सार्वजनिक गतिविधियों को भी देखना चाहिए। केवल किसी एक आंदोलन में शामिल न होने के आधार पर उसके पूरे काम को खारिज करना उचित नहीं होगा।
लेकिन यह सवाल बिल्कुल जायज है कि जब किसी समुदाय के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा सामने आता है, तो उसके राजनीतिक प्रतिनिधियों को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि वे किसी आंदोलन का समर्थन क्यों करते हैं या उससे दूरी क्यों बनाते हैं।
मुसलमानों को डर नहीं, सही जानकारी और नेतृत्व चाहिए
आज मुस्लिम समुदाय के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि 10 अक्टूबर को कौन जंतर-मंतर जाएगा और कौन नहीं। असल सवाल यह है कि समुदाय अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कैसे करेगा और उसके धार्मिक तथा राजनीतिक नेतृत्व की इसमें क्या भूमिका होगी।
शांति और भाईचारा जरूरी हैं। कानून का सम्मान भी जरूरी है। लेकिन शांति का अर्थ अन्याय पर खामोशी नहीं होना चाहिए। सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल मुसलमानों की नहीं, बल्कि सरकार, प्रशासन, राजनीतिक दलों और समाज के सभी वर्गों की है।
अगर किसी आंदोलन से हिंसा का वास्तविक खतरा है, तो आयोजकों और प्रशासन को उसके बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। प्रदर्शनकारियों को भी शांतिपूर्ण तरीके अपनाने चाहिए और कानून का पालन करना चाहिए। लेकिन किसी भी समुदाय को केवल आशंकाओं के आधार पर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से विमुख नहीं किया जाना चाहिए।
मुस्लिम युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि अधिकारों की रक्षा के लिए भावनात्मक नारों से अधिक जरूरी है तथ्य, संगठन, कानूनी समझ और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक भागीदारी। उन्हें किसी नेता या धर्मगुरु की बात आंख बंद करके मानने के बजाय हर दावे की जांच करनी चाहिए।
इसी तरह धार्मिक नेताओं को भी समझना होगा कि समुदाय उनसे केवल अमन की अपील नहीं, बल्कि मुश्किल समय में मार्गदर्शन और सक्रिय भूमिका की अपेक्षा करता है। यदि वे युवाओं को आंदोलन से दूर रहने की सलाह देते हैं, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि संबंधित मुद्दे का समाधान किस रास्ते से निकलेगा।
आखिरकार, मुसलमानों को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो उन्हें नफरत और हिंसा से दूर रखे, लेकिन अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी बनाए। जो उन्हें कानून का सम्मान करना सिखाए, लेकिन कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों से पीछे हटने के लिए मजबूर न करे।
कौम के हित में सबसे जरूरी सवाल यही है: जब मुसलमानों के अधिकारों पर बहस हो रही हो, तब उनका नेतृत्व केवल खतरे गिनाएगा या न्याय पाने का रास्ता भी दिखाएगा?

